अकेला पन

Akela Pan

रात के नौ बजे थे इला काम निपटा कर अपनी मां मधुरिमा के साथ टीवी देखने बैठी ही थी कि तभी फोन की घंटी बजने लगी। वैसे तो कोई फोन करता नहीं और इतनी रात गए , मधुरिमा को थोड़ी घबराहट सी हुई लेकिन अपनी बड़ी बहन निरंजना की आवाज सुनकर तसल्ली हुई। निरंजना ने सूचना देने के लिए फोन किया था कि उसने अपनी इकलौती बेटी काम्या का विवाह निश्चित कर दिया है और शादी की तारीख दो महीने बाद की निकली है।वह चाहती है कि मधुरिमा इला के साथ शादी से एक महिने पहले उसके घर आ जाएं और शादी की तैयारी में उसकी मदद करें।

फोन पर बात करके मधुरिमा का दिल भारी हो गया, शादी की उम्र तो इला की भी हो रही है।काम्या से एक साल बड़ी है लेकिन ऐसा वर उसे कहां मिलेगा जो बिना दान दहेज़ के उसकी लड़की को ब्याह कर लें जाएं। इला के लिए एक महीने की छुट्टियां लेकर निरंजना के घर जाकर रहना भी मुश्किल काम था , मना करने पर बिगड़ने का अंदेशा था। इला ने सुना तो भड़क गई ,” मासी अपने आप को समझती क्या है, उन्होंने एक आवाज लगाई और हम अपने सब काम छोड़कर उनकी जी हजूरी में लग जाएं। खुद तो बैठी रहेंगी और आप को काम में पेले रखेंगी, ताने मारती रहेंगी।”

मधुरिमा जानती थी इला जो कह रही है वह सही है लेकिन बहन को मना करने का साहस उसमें नहीं था इसलिए बेटी और बहन के मध्य अपने आप को फंसा हुआ महसूस कर रही थी। बचपन से ही निरंजना को अपनी छोटी बहन से ईर्ष्या थी रूप लावण्य की स्वामिनी मधुरिमा सब की प्रिया थी।

निरंजना कितने भी महंगे कपड़े और प्रसाधन इस्तेमाल करतीं लेकिन बहन के आगे अपने आप को कमतर पाती जिसके परिणामस्वरूप चिड़चिड़ेपन का ऐसा जाल अपने चारों तरफ बुन लिया कि कभी उसमें से निकल नहीं पाई।

मामाजी जब निरंजना के लिए आकाश का रिश्ता लाएं तो वह बहुत खुश थी , किसी प्रायवेट कंपनी में इंजीनियर था और देखने में भी बड़ा शानदार। निरंजना ने फोटो के आधार पर ही सपनों का महल खड़ा कर लिया लेकिन जब आकाश ने मधुरिमा को देखा तो उससे विवाह करने की इच्छा प्रकट कर दी। मनोहर लाल को एक दिल का दौरा पड़ चुका था , जीवन की अनिश्चिंतता से घबराया पिता बस दोनों लड़कियों के हाथ पीले करना चाहता था। बड़ी बेटी के सीने पर लौटते सांपों को अनदेखा करते हुए उसने छोटी बेटी की डोली विदा कर दी। सामान्य रंग रूप की निरंजना के लिए रिश्ते ढूंढना और भी मुश्किल हो गया,हर किसी को लगता छोटी को पहले ब्याह दिया जरूर दाल में कुछ काला है। लड़की की उम्र बढ़ती जा रही थी ,मनोहर लड़का ढूंढते ढूंढते जब थक गया तो उसने अपनी फेहरिस्त में तलाकशुदा और विधूर भी सम्मिलित कर लिए। मुकेश कुमार की पत्नी का शादी के दो साल बाद ही एक कार दुर्घटना में देहांत हो गया था। मनोहर लाल को अपनी पुत्री के लिए यह वर ठीक लगा, देखने में अति साधारण, उम्र का फासला भी कुछ अधिक लेकिन अच्छा खासा दौलतमंद। मुकेश से निरंजना का विवाह बिना उसकी इच्छा जाने मनोहर ने कर दिया। निरंजना इस रिश्ते से बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं थी और सारा दोष उसकी नज़रों में मधुरिमा का था। वह अपने पैसे के बल से और तानों से मधुरिमा को नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ती। मधुरिमा वैसे तो आकाश के साथ बहुत खुश थी लेकिन बहन की बदसलूकी उसे उदास कर देती। वह बहन का विरोध इसलिए नहीं करती ,एक तो लिहाज करती थी उसका बड़ी होने के कारण दूसरा उसे लगता जब वह जानती थी बहन की चाहत के बारे में तो उसे विवाह का विरोध करना चाहिए था। वो अलग बात थी कि पिता के आगे किसी की चलती नही लेकिन बहन की नजरों में शायद इतनी बड़ी गुनहगार नहीं बनती। मधुरिमा ने अपनी बहन के यहां आना-जाना बहुत कम कर दिया था,इला का जन्म हो गया था, वह अपने छोटे से संसार में बहुत खुश थी।

नियति ने कुछ और ही सोच रखा था , मधुरिमा के लिए ।जब इला तेरह चौदह साल की थी आकाश की एक लंबी बिमारी के बाद मृत्यु हो गई। बिमारी में इतना पैसा लग गया कि सारी जमा-पूंजी खत्म हो गई और आकाश के जाने के बाद आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो गई। निरंजना थी तो बड़ी बहन , मधुरिमा की हालात पर बहुत दुखी हुईं,उसे अपने साथ अपने घर ले आयी। पांच छः कमरों की कोठी,तीन प्राणियों के लिए बहुत बड़ी थी इसलिए एक कमरा मधुरिमा को देने में उसे कोई परेशानी नहीं हुई। लेकिन मधुरिमा का आत्मसम्मान उसे कचोट रहा था,इस तरह बड़ी बहन पर आश्रित होकर जीना उसे कुछ ठीक नहीं लग रहा था। धीरे धीरे उसने घर के  काम  करने शुरू कर दिये और जल्दी ही सारे कामों की जिम्मेदारी अपने ऊपर ओढ़ ली ‌।अब निरंजना सेठानी की तरह बैठी अपनी बेटी काम्या में लगी रहती और मधुरिमा घर सम्भालने में। काम्या इला से उम्र में एक  दो साल छोटी थी लेकिन कद काठी में इक्कीस, उसके जो भी कपड़े छोटे हो जाते निरंजना इला को पहनने के लिए दें देती। इला का सौंदर्य उन पुराने कपड़ों में भी खिल कर आता, पढ़ने में भी वह बहुत होशियार थी। धीरे धीरे निरंजना के मस्तिष्क में ईर्ष्या ने अपना फन फिर फैलाना शुरू कर दिया। अपनी पुत्री पर लाड़ प्यार न्यौछावर करती और इला को नज़रंदाज़ करती। जिस दिन परिक्षाफल निकलने वाला होता उसके तनबदन में आग लग जाती।काम्या को दो दो ट्यूशन में पढ़ने के बाद भी कुछ खास अंक नहीं प्राप्त होते और इला कक्षा में अव्वल आती। इला को धुन सवार हो गईं थीं पढ़ लिख कर अपने पैरों पर खड़ा होना है और अपनी मां को यहां से निकालना है, जहां रात दिन काम करके भी उसकी कोई इज्जत नहीं थी। अपनी मां की स्थिति से वह इतना आहत थी कि उसने पढ़ाई को अपना लक्ष्य बना लिया था।

पढ़ाई पूरी होते ही उसने नौकरी के लिए आवेदन करना शुरू कर दिया लेकिन दूसरे शहर में। इस शहर में नौकरी करने का मतलब है मासी के घर में ही रहना पड़ेगा जिससे मां की स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ेगा। थोड़ी बहुत कोशिश के बाद उसे मनचाही नौकरी मिल गई। जब उसने निरंजना को अवगत कराया तो उसने बवाल मचा दिया,,वह मधुरिमा के कारण बेफिक्र जिंदगी जीने की आदी हो चुकी थी। मधुरिमा को भी दहशत हो रही थी इतने साल सुरक्षित माहौल में रहते हुए, एकदम से नये शहर में जवान लड़की के साथ जाने के नाम पर। लेकिन इला ने दृढ़ निश्चय कर लिया था वह अब और मासी पर आश्रित होकर जीवन नहीं काटेंगी इसलिए मां को लेकर नये शहर में आ गई। कोशिश करके दो कमरों का मकान किराए पर लिया और अपनी मां के साथ वहां रहने लगी।

सुबह जल्दी उठकर वह घर का सारा काम करती,अपना टिफिन तैयार करती और मां के लिए भी खाना बनाकर जाती। मां का सिर अपनी गोद में रखकर बड़े लाड़ से कहती ,” अब तुम कोई काम नहीं करोगी,बस अपने ठाकुर जी की सेवा करो मंदिर में जाकर भजन कीर्तन सुनो,सत्संग में जाओं और बहुत खुश रहो।” मधुरिमा का मन धर्म में बहुत लगता था लेकिन निरंजना के घर में काम से फुर्सत नहीं मिलती थी। अब वह लग्न से मंदिर जाती , काफी समय पूजा पाठ में लगाती , लेकिन बेटी के भविष्य की चिंता उसे परेशान करती थी। निरंजना के फोन ने उसकी चिंता को और बढ़ा दिया था ।

पन्द्रह दिन बाद निरंजना का फिर फोन आया,उसका होने वाला दामाद मनन मधुरिमा के शहर में एक हफ्ते के लिए किसी कांफ्रेंस में भाग लेने के लिए आ रहा था। निरंजना चाहती थी वह मधुरिमा के घर आकर ठहरे।

उसने मधुरिमा को सख्त निर्देश दिए कि वह मनन की आवभगत में कोई कसर न छोड़ें,उसको एक से एक पकवान बनाकर खिलाएं। इला ने सुना तो उसे चिंता हुई ,वह बहुत सोच समझ कर खर्च करती थी, जिससे कुछ बचत कर सकें। अभी नौकरी की शुरुआत थी उसकी तनख्वाह बहुत अधिक नहीं थी। अब मासी के दामाद की आवभगत का मतलब है दूध पनीर फल सब्जी का अतिरिक्त खर्चा और फिर भी मासी को संतुष्टि नहीं मिलेगी कोई न कोई शिकवा अवश्य रहेगा। वह इस उधेड़बुन में लगी थी कि मासी को कैसे समझाए कि मनन का उनके घर में रुकना ठीक नहीं होगा।जरा भी तुनकमिजाज हुआ और कोई बात खटक गई तो मासी को एक मुद्दा और मिल जाएगा शिकायत करने का। जब से इस शहर में आएं हैं मासी ने बात करना बहुत कम कर दिया था। वह सोचती रह गई,मना नहीं कर सकीं और नियत समय पर मनन उसके घर के बाहर खड़ा घंटी बजा रहा था। जब उसने दरवाजा खोला तो सामने एक हैण्डसम स्मार्ट बंदा लंबी सी मुस्कराहट के साथ खड़ा था।उसको देखते ही इला के दिल में अलग किस्म के अहसास ने जन्म लिया।वह उसे चुप खड़ा देखकर बोला :” साली साहिबा बंदे को मनन कहते हैं और अपनी तारीफ में क्या कहूं जो देखता है बस देखता ही रह जाता है , जैसे इस समय आप देखें जा रही हैं।”

और वह खिलखिलाकर हंस दिया। इला एकदम से झेंप गई और सम्भलते हुए बोली :” आइए मनन जी आपका बहुत स्वागत है हमारे घर में।” मधुरिमा ने उसके लिए कटलेट और पौहे का नाश्ता बनाया था जिसको उसने पेट भर कर खाया और दिल खोलकर तारीफ की। वह हंसने बोलने वाला मस्तमौला बंदा था और दो दिन में ही उसने अपनी बातों , किस्सों और चुटकुलों से मां बेटी का मन जीत लिया। दिन भर तो वह अपने काम से बाहर रहता लेकिन सुबह शाम उसके कारण घर का माहौल बहुत खुशनुमा हो जाता , मां बेटी की नीरस जिंदगी में जैसे बहार आ गई हो। निरंजना पूरा ब्योरा लेती क्या बनाया और क्या बनेगा उसके होने वाले दामाद के लिए।

तीसरे दिन मनन ने आफिस जाने से पहले ही कह दिया कि उस दिन शाम को खाना न बनाएं, वह दोनों को लेकर बाहर किसी रेस्टोरेंट में जाएगा और वही खाना खायेंगे। मधुरिमा ने बहुत इंकार किया कि उसे बाहर का खाना खाने में कोई दिलचस्पी नहीं है लेकिन वह नहीं माना ‌। रेस्टोरेंट में हल्की रोशनी और संगीतमय माहौल में इला को बहुत शांति और प्रसन्नता महसूस हो रही थी। उसे अफसोस हो रहा था पैसे बचाने के चक्कर में वह मां को कभी ऐसे खाना खिलाने बाहर नहीं लेकर आईं। मासी मौसाजी और काम्या तो अक्सर बाहर जाते रहते थे,उन दोनों को केवल काम्या के जन्मदिन पर ही बाहर खाना खिलाने ले जाते थे। फिर उसने सोचा इस समय इस तरह की बातें दिमाग़ में नहीं लानी चाहिए बस इस पल के अहसास को जीना चाहिए। उसे लग रहा था मनन बातें तो मधुरिमा से कर रहा है लेकिन उसकी नजरें उस पर हैं। इला की हिम्मत नहीं हो रही थी  नज़र उठा कर मनन की तरफ देखने की, उसे पक्का यकीन था वह उसे ही ताक रहा है। इस विचार से ही उसकी देह के रोम रोम में लहर सी दौड़ रही थी।

मनन की दिलचस्पी इला में बढ़ती जा रही थी ,वह उसे पहेली सी लगी। प्राकृतिक सौंदर्य से लबालब वह खामोश सी लड़की कभी खाली नहीं बैठती,लगन से घर के काम फटाफट निबटा कर आफिस के लिए ऐसे भागती कि बाल तक बनाने का समय नहीं होता उसके पास ।हल्की सी मुस्कान हर समय चेहरे पर रहती और अपनी मां के प्रति् इतना स्नेह रखती मानो मां नहीं उसकी बेटी हो। शाम को उनका सर गोदी में रखकर कर होले होले दबा रही होती या पैरों की बड़ी आहिस्ता से मालिश कर रही होती।मनन को उससे बात करके बड़ा अच्छा लगता , उसे एक खिंचाव सा महसूस होता उसके प्रति। वह बार बार भूल जाता कि उसकी सगाई हो गई है। काम्या का रिश्ता उसके मौसा लाएं थे जो मुकेश कुमार के अच्छे दोस्त थे।

मनन के दिमाग़ में अपनी भावी पत्नी की ऐसी कोई छवी नहीं थी , इसलिए जब काम्या से मिला और सब ठीक लगा तो उसने रिश्ते के लिए हां कर दी। लेकिन बाद में उससे जब दो तीन बार मिला और उससे बातें हुई तो लगा काम्या की सोच बहुत सतही है, वह ऊपरी दिखावे में विश्वास करती है और लक्ष्यहीन जीवन व्यतीत करती है। लेकिन उसे लगा वह ठीक से शायद काम्या को समझ नहीं पा रहा है या काम्या संकोच के कारण खुल कर उससे बात नहीं कर रहीं हैं। अब इला से बात करके उसे लगने लगा कि जिस सहजता से इला उसके दिल में बसती जा रही है,काम्या तो वहां प्रवेश ही नहीं कर सकीं । वह जब इला के आसपास होता  तो उसे एक संपूर्णता का अहसास होता  शांति का अनुभव होता । गलती से उसका हाथ भी छू जाए तो रोम रोम पुलकित हो जाता । उसे यकीन हो गया कि अगर इला के साथ वह अपना जीवन व्यतीत करेगा तो जीवन का हर लम्हा आनंदमय हो जाएगा। लेकिन समस्या यह थी कि इस शर्मिली लड़की के भाव समझना कठीन हो रहा था ,वह दूरी बनाए रखती , नजरें मिलाती नहीं और बस उसकी बातों पर मंद मंद मुस्कुरा देती। इधर उधर की बातें तो कर लेती लेकिन अब वह बैचेन हो रहा था उसके मन की बात जानने के लिए, जिससे वह अपनी आगे की जिंदगी का फैसला ले सकें।

पांचवें दिन जब मनन आफिस से आया तो इला रसोई में खाना बना रही थी और मधुरिमा मंदिर से आईं नहीं थी। मनन ने सोचा यह अच्छा मौका है अपने मन की बात कहने का इसलिए वह रसोई में ही खड़ा हो गया। इला से बोला :” आप इतनी खामोश रहती है कुछ बोलती नहीं है और मैं सारा दिन बिना रुके बोलता रहता हूं, आपको अजीब लगता होगा?”

इला :” नहीं ऐसी कोई बात नहीं है, मां तो आपके हंसमुख स्वभाव की बहुत तारीफ करतीं हैं ‌। आपके कारण चार पांच दिन से घर में बहुत रौनक लगी हुई है। ”

मनन :” वैसे मैं जानना चाहता हूं आपको मैं कैसा लगता हूं?”

इला आश्चर्य से :” अच्छे लगते हैं ,आप शीघ्र ही इस परिवार के सदस्य होने वाले हैं, निरंजना मासी बहुत भाग्यशाली हैं जो उन्हें आप जैसा दामाद मिल रहा है।”

मनन:” मैं अब काम्या से नहीं आप से शादी करना चाहता हूं, मुझे आपके बहुत से गुणों ने बहुत प्रभावित किया है । मुझे लगता है आपसे शादी करके मेरी जिन्दगी बेहतरीन हो जाएगी इसलिए इस बारे में मैं आपके विचार जानना चाहता हूं। ”

इला को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ वह अवाक मनन के मुख को देखती रह गई। उसे लगा मनन को ज्ञात नहीं या वह समझ नहीं रहा उसकी इन बातों का क्या जटील परीणाम निकलेगा,क्या भयंकर स्थिति हो जाएगी। मनन ने जब इला को इस तरह चुपचाप परेशान खड़े देखा तो बोला,” आप प्लीज परेशान मत हो , तुरंत उत्तर देने की आवश्यकता नहीं है। मैं अभी दो दिन और हूं यहां  आप सोच समझ कर निर्णय  लीजिए।” कहकर वह अपने कमरे में चला गया।

इला के हाथ पैर ठंडे हो गये थे , उसे मनन अच्छा लगने लगा था,यह बात वह कभी भी किसी को पता नहीं लगने देती। लेकिन मनन के दिल में उसके लिए चाहत पैदा होने लगी थी यह सोचकर उसका दिल जोर से धड़कने लगा था। इन बातों का परिणाम क्या होगा सोच कर उसे पसीना आ रहा था। फिर उसे लगा जब मनन स्वंय प्रस्ताव रख रहा है तो मना करना बेवकूफी होगी। वह उलझन में थी उसे क्या करना चाहिए। किसी तरह उसने खाना बनाया और मधुरिमा के आते ही परोस दिया। खाने की मेज पर इतनी चुप्पी देखकर मधुरिमा को अजीब लगा , दोनों बेमन से खाना खा रहे थे और न जाने किन विचारों में खोये हुए थे।

अचानक खाना खाते हुए मधुरिमा के मन में विचार आया कहीं पच्चीस साल पुरानी कहानी की पुनरावृत्ति तो नहीं हो रही। सोचकर ही उसका कलेजा कांप गया। खाने के बाद दोनों बैठक में टीवी देखने के लिए भी नहीं बैठे, सीधे अपने अपने कमरों में सोने चले गए। घर में दो शयनकक्ष थे तो मधुरिमा ने अपना एक हफ्ते के लिए मनन को दे दिया था और स्वंय इला के साथ सोती थी। जब कमरे में पहुंची तो इला अगले दिन के लिए आफिस में पहनने के लिए कपड़े स्त्रि कर रही थी।जब काम ख़त्म करके इला पलंग पर बैठी तो मधुरिमा उसका हाथ पकड़ कर उसकी आंखों में आंखें डालकर बोली,” बता बात क्या है इतनी चुप और परेशान क्यों हैं ?”

इला :” ऐसी कोई बात नहीं है।” लेकिन जब मधुरिमा ने हाथ नहीं छोड़ा और एकटक इला को देखती रही तब इला झूठ नहीं बोल सकीं” मनन जी मुझसे शादी करना चाहते हैं।”

मधुरिमा को जिस बात का डर था वह बात सच हो गयी। बहुत संयम के साथ उसने पूछा :” उसने स्वंय ऐसा कहा या तू अंदाजा लगा रही है?”

इला :” उन्होंने स्वंय कहा, वो मुझे चाहने लगे हैं।”

मधुरिमा उदासी भरे स्वर में बोली :” देख बेटा तुझे इस रिश्ते को आगे बढ़ाने से रोकना होगा। नियति ने मुझे दुबारा पच्चीस साल पहले वाली स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है। तब अपनी नासमझी के कारण जो किया ,ज़मीर पर उस बोझ को ढोते हुए जीवन बहुत भारी लगता था। मैं मानती हूं मनन जैसा इंसान जीवन साथी के रुप में दूसरा कभी नहीं मिलेगा और तू उसके साथ खुश भी बहुत रहेगी लेकिन अपराध बोध तूझे कचोटता रहेगा। ”

इला यह समझती थी की मां अपने आप को हमेशा निरंजना मासी का गुनहगार मानती रही जबकि जो हुआ था उसमें उनकी कोई गलती नहीं थी। एक तरफ उसको लग रहा था मासी के अपमान जनक तानों का बदला लेने का का यह अच्छा अवसर उसके हाथ लग गया है दूसरा उसका मनन से सचमुच दिल जुड़ गया था। वह उसको इंकार करके अपने जीवन से खुशियों को ठोकर मार देगी।

उसने अपने मन की बात मधुरिमा के सामने रखी” मां निरंजना मासी ने हमारे साथ जो व्यवहार किया उसके बाद भी हम उनके हितों के बारे में सोचें यह कहां तक उचित है। नियति बार बार हमारे सामने ही ऐसी चुनौती क्यो रख रही है।”

मधुरिमा :” दीदी ने हमें उस समय सहारा और आश्रय दिया जब हमें सहायता की इतनी आवश्यकता थी। तू पढ़ लिख कर अपने पैरों पर खड़ी है इसका श्रेय भी उनको जाता है। मैं कितना पढ़ा पाती तूझे मैं नहीं जानती हूं। नियति हमारा इम्तिहान ले रही है कि इस बार भी हम वही आसान रास्ता अपना लेते हैं या कुछ और निर्णय लेते हैं। बेटा मैं अपना निर्णय तुम पर थोपना नहीं चाहती हूं, लेकिन मन से मैं इस रिश्ते को कभी आशिर्वाद नहीं दूंगी।

दीदी स्वयं तेरा रिश्ता मनन से करें तो ही मुझे यह स्विकार्य होगा।”

इला को लग रहा था शायद वह काम्या की खुशी और मासी की नाराज़गी को नज़रंदाज़ करके इस  सम्बन्ध के लिए हां कर देती परन्तु मां की इच्छा को अनदेखा करना या उनको दुख पहुंचाने की बात वह सपने में भी नहीं सोच सकती थी।

मन को कठोर कर उसने इंकार करने का निर्णय तो ले लिया लेकिन नियति से दो दिन की मोहलत मांगी। वह अगले दिन मनन को अपना निर्णय सुना देती लेकिन वह तुरंत होटल में रहने चला जाता ‌। इसलिए उसने सोचा मनन को जाते समय बताएगी जिससे दो दिन का उसके सानिध्य का सुख प्राप्त  कर सकें। उसे मालूम था आगे की जिंदगी अब उसे उसकी यादों के सहारे काटनी पड़ेगी।

मनन के समझ नहीं आ रहा था कि आखिर इला के दिमाग़ में चल क्या रहा है, बोलती तो वह पहले से ही कम थी लेकिन अब उसकी मुस्कराहट भी गायब हो गई थी। दो दिन पहाड़ से कटे , उसके जाने का समय आ गया था। वह अपना सामान बांध रहा था तभी इला ने प्रवेश किया। उसके मुर्झाए हुए चेहरे को देखकर वह समझ गया वह क्या कहने वाली है लेकिन वह फिर भी उसके मुख से सुनना चाहता था।

इला :” उस दिन अपने जो  प्रस्ताव रखा था मैं उसके लिए इंकार करने आयी हूं। मेरे मन में आपके लिए ऐसी कोई भावना नहीं है कि मैं आपसे विवाह के लिए सहमति दूं।”

मनन :” मैं जानता हूं आप यह इंकार इस अपराधबोध से बचने के लिए कर रही हैं कि आपके कारण काम्या की सगाई टूट जाएगी। आप हां करें या ना करें , मैं अब काम्या से शादी नहीं करूंगा ,अगर करता हूं तो कभी उसके साथ न्याय नहीं कर पाऊंगा। मैं आपका इंतजार करूंगा ।”

इला :” वह आपकी इच्छा है आप किस से शादी करें लेकिन अब आप आगे मुझसे संपर्क करने की कोशिश न करे।”

इला को लगा अब एक पल भी रुकी या एक शब्द भी और बोला तो वह वहीं रो पड़ेगी, इसलिए तुरंत कमरे से बाहर चली गयी । मनन बोझिल मन से वापस अपने घर चला गया।

मनन समझ गया था इला और मधुरिमा  अहसान तलें दबे होने के कारण इस रिश्ते को कभी स्विकार नहीं करेंगे लेकिन वह अपने दिल के हाथों मजबूर था। उसने अपने माता-पिता के सामने शादी के लिए इंकार कर दिया और स्वयं दो महीने बाद कंपनी की तरफ से दो साल के लिए विदेश चला गया।

निरंजना को जब पता चला मनन ने शादी से इंकार कर दिया है तो उसके गुस्से की कोई सीमा नहीं रही। उसे यकीन था कि मधुरिमा ने कोई ऐसी चाल चली कि मनन का मन बदल गया। यह तो वह सोच ही नहीं सकती कि कोई उसकी काम्या जैसी स्मार्ट , आधुनिक लड़की को ठुकरा सकता है इला जैसे सीधी सरल साधारण सी लड़की के लिए। उसने फोन करके मधुरिमा को बहुत बुरा भला कहा , एहसान फरामोश, चालबाज और न जाने क्या क्या। मधुरिमा को बहुत ठेस पहुंची, बेटी का दिल दुखाया और बहन की नजरों में भी गिर गई। उसने इला को कुछ नहीं बताया लेकिन अंदर ही अंदर घुटने लगी। बेटी की चिंता अलग खा रही थी , कैसे अकेले जिंदगी का लंबा सफर तय करेगी।

धीरे धीरे उसका स्वास्थ्य गिरने लगा और एक साल में वह परलोक सिधार गई।

उधर मुकेश कुमार ने काम्या के लिए दुसरा वर तलाश लिया, विवाह के बाद काम्या विदेश में जाकर बस गयी। निरंजना ने मधुरिमा से कोई संपर्क नहीं रखा उसे शादी में भी नहीं बुलाया था। लेकिन इला ने मां की मृत्यु का समाचार निरंजना को अवश्य दिया, निरंजना आयी, अफसोस जाहिर किया और अपने घर चली गई।

इला मां के जाने के बाद बहुत अकेली रह गई।जीवन पहाड़ सा भारी और घोंघे की धीमी गति से बीतता महसूस होने लगा। कुछ सहेलियां बनीं लेकिन सबके अपने-अपने परिवार , जिनमें वो व्यस्त रहती ‌| एक साल बीत गया था मधुरिमा को गुजरें,इला गुमसुम बैठी थी। निरंजना का फोन आया बहुत द्रवित स्वर में बोल रही थी,बार बार एक ही आग्रह कर रही थी कि इला चार पांच दिन के लिए उसके पास आ जाएं।इला का मन नहीं  था , कहीं न कहीं अपनी मां की असमय मृत्यु के लिए उसे मासी जिम्मेदार लगती थी। लेकिन एक हफ्ते बाद दिवाली थी और अकेले दिवाली पर घर में रहने के नाम से उसे घबराहट हो रही थी। निरंजना फिर बहुत विनम्रता से बोली :” बस एक बार आजा बेटा फिर कभी नहीं कहुंगीं।” इला राज़ी हो गई अगले हफ्ते दिवाली के कारण चार पांच दिन की छुट्टियां पड़ रही थी ,वह निरंजना के घर चली गई।

निरंजना बहुत थकी हुई और कमजोर लग रही थी। मुकेश कुमार को छः महीने पहले लकवा मार गया था, आमदनी के स्त्रोत खत्म हो गये थे। बिमारी पर बहुत खर्च हो रहा था इसलिए आर्थिक स्थिति डांवाडोल हो रही थी। काम्या विदेशी रंग ढंग में रंग गयी थी, वहां की जीवन शैली में मस्त हो गई थी। अब निरंजना  अकेली और दुखी थी इला को देखकर बहुत खुश हूई।

फुर्सत के समय उसके पास बैठते हुए बोली :” मुझे लगा तू नहीं आएगी। एक बार तुझसे मिलकर माफी मांगना चाहती थी। आज अपने पापो की सज़ा भुगत रही हूं। तो महसूस हो रहा है मैं ने मधुरिमा और तेरे साथ कितनी ज्यादती की है। ”

इला :” अब इन बातों से क्या फायदा , भूल जाओ जो हुआ सो हुआ।”

निरंजना :” नहीं बेटा अपने दिल पर हाथ रखकर कह दो तूने मुझे माफ़ कर दिया है।”

इला उदासी भरे स्वर में बोली:” मेरे माफ़ करने से क्या फर्क पड़ेगा, मां तो आपके स्नेह की चाहत में ही चलीं गईं। जीवन भर अपने आप को आपका दोषी मानती रही,न जाने आत्मा पर कितना बोझ लेकर गयी है।”

मां को याद कर इला फूट-फूटकर रोने लगी, निरंजना भी रोने लगी फिर बोली :” तू ठीक कह रही है अब अपनी गलती मान भी लूं तो क्या फायदा। वह बिचारी तो चली गयी ,न जाने क्यों अपनी हर परेशानी और दुर्भाग्य का दोष उस पर मढ़ कर उसे उल्टा सीधा बोल देती थी। भगवान भी मुझे कभी माफ नहीं करेगा,अब पछतावा कर भी लूं तो क्या।उसको तो मानसिक रूप से प्रताड़ित किया मैंने। ”

वैसे तो निरंजना के पास समय नहीं होता था ,पति के काम में बहुत समय लग जाता, बुढ़ापे और कमजोरी के कारण धीरे-धीरे काम करतीं। लेकिन जब भी समय मिलता इला के सामने मधुरिमा को याद करके रोती और पश्चाताप करती।

अब तो इला को मासी के लिए दुख होने लगा , उसने कईं बार समझाया कि मधुरिमा के मन में उनके लिए कोई शिकवा नहीं था।

निरंजना बोली :” जब मैंने आखिरी बार उससे बात की थी तो बहुत भला बुरा कहा था, अपनी सफाई देने का उसे मौका भी नहीं दिया था। बहुत बुरी हूं मैं, गुस्सा में आकर मुझे होश नहीं रहता है मैं क्या कर रही हूं।”

इला आश्चर्य से ,” आप ने आखिरी बार कब बात की थी?”

निरंजना :” जब मनन ने शादी से इंकार कर दिया था, मैं ने सोचा मधुरिमा ने उसे हमारे बारे में उल्टे-सीधे इल्जाम लगा कर कान भरे हैं।”

इला को समझ आया मां क्यों इतना दुखी रहने लगी थी, मनन के जाने के बाद। इला समझ रही थी कि उनको ग्लानी रहने लगी थी कि उन्होंने अपनी बेटी का घर नहीं बसने दिया , इसलिए वे दुखी रहती थी। एक कारण यह भी था तो एक कारण मासी का व्यवहार भी था। वह फिर रोने लगी अपनी मां के कष्टों को याद करके।

निरंजना बोली :” आखिर बात क्या थी जो मनन ने मना कर दिया था?”

इला :” वे मुझसे शादी करना चाहते थे लेकिन मां ने इजाजत नहीं दी।”इला चाहती थी कि मासी समझे जिस बहन को वह हमेशा ग़लत समझती थी वह कितने साफ दिल की थी।

निरंजना बोली :” तुझे अकेला और कुआंरी देखकर मधुरिमा की आत्मा को कितना कष्ट होता होगा। मुझे प्रायश्चित करने का एक मौका दे दे। मैं आज ही मनन के घर तेरा रिश्ता लेकर जाती हूं ,तेरा कन्यादान करके शायद मेरे पाप कुछ कम हो जाएं।” इला सोचने लगी अब काम्या की शादी हो गई है और मासी स्वयं रिश्ता पक्का करना चाहतीं हैं तो मां को कोई आपत्ती नही होगी। इस दिवाली पर जगमगाते दीपक उसकी जिंदगी में भी रोशनी भर देंगे उसका अकेलापन दूर कर देंगे। मनन ने कहा था वह शादी करेगा तो उससे वरना इंतजार में जिंदगी काट देगा। उसे पूर्ण विश्वास हो गया था नियती ने मनन को उसके लिए ही चुना था इसलिए देर सवेर उनका मिलन होना ही था।

3 thoughts on “अकेला पन

  1. आप लिखती बहुत अच्छा हो लेकिन आपकी शैली थोड़ी पुरानी सी लगती है जो आज के समय से मेल नहीं खाती । आपकी सिर्फ यही कहानी पढ़ी है ऐसा लगता है जैसे कहानी आज की ना होकर बहुत पुरानी हो ।

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