अमानत

Amaanat
केतकी की तीन चार दिन से तबीयत ठीक नहीं थी, सुबह उठते ही ऊबकाई आती और सारा दिन चक्कर से आते रहते। पहले उसे लगा खाने में बदपरहेजी हो गई होगी लेकिन ऐसा कुछ नहीं था। खाया ही नहीं जा रहा था कुछ, देखते ही जी खराब हो जाता।
भोली थी लेकिन जीवन की रीत समझती थी, इसलिए घबराहट के कारण जान निकल रही थी।निश्चय किया उसी रात छोटे मालिक से बात करेंगी,इस समस्या का क्या हल निकालना है वो ही बता सकते हैं। जब से यह बात दिमाग में आयी थी बैचेनी बढ़ती जा रही थी ,रात के दस बज गए थे बापू भी अभी तक नहीं आये थे। पहले उन्हें ढूंढ़ कर लाएगी फिर जाएगी छोटे मालिक से मिलने। ठेके से घर तक के दो चक्कर लगा लिए लेकिन बापू कहीं नजर नहीं आये, हमेशा तो रास्ते में कहीं न कहीं पड़े मिल जाते थे।
केतकी की मां को गुजरें दस साल हो गए थे, पहले तो बद्रीनाथ बिल्कुल ही नहीं पीता था लेकिन छः सात साल से रोज़ शाम को पीकर धुत्त हो जाता था। सिसोदिया मेंशन की इस बड़ी कोठी में माली का काम करता था , पीछे की तरफ दो कोठरी के एक छोटे से मकान में वह शुरू से रहता था। पहले चौकीदार और माली दोनों का काम करता था ,अब केवल पेड़ पौधों की देखभाल ही करता है। दरवाजे पर अब गार्ड़ की ड्यूटी रहती जो आने जाने वालों पर सख्त निगाहें रखता। कोठी के मालिक जगतपाल की शहर के रईसों में गिनती आतीं थी,वह कठोर और क्रोधित स्वभाव का इंसान था। बद्रिनाथ को पीने के कारण कब का निकाल देता लेकिन बद्रिनाथ को पेड़ पौधों का अदभुत ज्ञान था और उसके कारण कोठी के बगीचे की सुंदरता की शहर में कोई बराबरी नहीं कर सकता था।
तीसरे चक्कर में केतकी को झाड़ियों में बद्रिनाथ बेसुध पड़ा मिला, किसी तरह सहारा देकर घर तक लेकर आई । गेट पर खड़ा गार्ड खींसे निपोर रहा था,जब देखो तब उसे ललचाई नज़रों से देखता रहता था। यौवन की दहलीज पर खड़ी केतकी में सौंदर्य कूट कूट कर भरा था ,वो तो एक महीने से चेहरा पीला और देह कुछ कमजोर हो गयी थी। पिता को पलंग पर लिटाया, दरवाजा बंद करने ही वाली थी कि सामने से हांफते हुए राधारानी आती दिखाई दी।भारी बदन की राधारानी झुंझलाती हुई बोली ,” पहले भी आयी थी तुम्हारी कोठरी में, कहां चली गई थी? बड़े मालिक के दस पंद्रह दोस्त आयें है , अभी तक रसोई का काम नहीं निपटा है।यह भारी सा लिफाफा छोटे मालिक ने तुम्हें देने के लिए दिया है ।कह रहे थे ग्यारह बजे के बाद ही देना और आज ही देना , नहीं तो हम कल देते।” और राधारानी बिना रूके कोठी की तरफ भाग गयी।
राधारानी कोठी में रसोईघर का काम संभालती थी और केतकी का बहुत ध्यान रखती थी। कोठरी में गर्मी अधिक थी , केतकी ने बाहर निकल कर दरवाजे की कुण्डी लगाई और बगीचे में लगे बल्ब की रोशनी में लिफाफे में रखे कागज़ को पढ़ने लगी। उसे जिज्ञासा हो रही थी , छोटे मालिक ने पहले कभी उसे इस तरह से कोई पत्र नहीं भेजा था।
केतकी यह पत्र पढ़ते ही तुम तुरंत अपने कुछ कपड़े और लिफाफे में रखे पैसे लेकर यहां से निकल जाना। मैं शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर होता जा रहा हूं और डैड की ज्यादती सहन करना मेरे बस में नहीं रहा। उन्होंने कल मेरी सगाई अनुराधा से करने का निश्चय कर लिया है।आज उसके पिता से व्यापार में कोई डील की है और रात को दोस्तों के साथ जश्न मना रहे हैं। केतकी तुम मेरी जिन्दगी हो , जीवन में मैंने केवल तुम्हें अपना माना है।यह बात मुझे आखिर में  डैड को बतानी पड़ी कि मैं क्यों अनुराधा से शादी नहीं कर सकता। लेकिन उन्होंने धमकी दी है अगर मैं ने शादी नहीं की तो वो तुम्हें जिंदा नहीं रहने देंगे। मुझ में इतनी ताकत नहीं है कि मैं तुम्हारी सुरक्षा कर सकूं इसलिए दूर एक छोटे-से गांव में मेरे दोस्त का पता तुम्हें दे रहा हूं , वहां चली जाओं वह तुम्हारी हर तरह से मदद व सुरक्षा करेगा। मुझे माफ़ कर दो मैं तुम्हारा आगे साथ नहीं दे रहा हूं, मैं यह दुनिया छोड़ कर जा रहा हूं।
केतकी को एक दम से समझ नहीं आया कि यह सब क्या लिखा है और छोटे मालिक माफी क्यों मांग रहे हैं उसने तो उनसे कोई उम्मीद या वादा कभी किया नहीं था। लेकिन जब पत्र की बातें दिमाग़ में बैठने लगी तो उसे दहशत हुईं ,न जाने क्या होने वाला है। दुनिया छोड़ कर जा रहे हैं, कहीं कुछ कर तो नहीं लिया है। वह बदहवास सी उनके कमरे की उस खिड़की की ओर भागी जो बगीचे में खुलती थी।वह उस खिड़की से ही उस कमरे में आती जाती थी। खिड़की का कांच का दरवाजा अंदर से बंद था अक्सर वह खुला होता था। केतकी ने अपना चेहरा कांच के पास ले जाकर अंदर झांका तो उसकी रूह कांप गयी। मुख से चीख निकलती उससे पहले ही उसने अपना हाथ अपने मुंह में ठूंस लिया। छोटे मालिक पंखे से लटके हुए थे, उसकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया। राधारानी पहले भी उसको पत्र पकड़ाने आयी थी,इसका मतलब बहुत देर हो गई थी, देह से प्राण निकल चुके थे। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे,वह वहीं दिवार का सहारा लेकर बैठ गई। कितनी तकलीफ़ में होंगे बिचारे जो यह कदम उठाया।
केतकी की समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करें,अगर कोठी में जाकर स्थिती की सूचना देती है तो वह संदेह के घेरे में आ जाएगी। छोटे मालिक ने पत्र में लिखा है उसकी जान को खतरा हो सकता है। अगर उसकी कोख में छोटे मालिक की निशानी नहीं होती तो वह अपनी जान की चिंता नहीं करती और शोर मचा देती। लेकिन इस अंश की रक्षा के लिए उसे तुरंत पत्र के अनुसार यहां से निकालना पड़ेगा। वह लड़खड़ाते हुए अपने घर पहुंची और जल्दी से एक छोटे से बैग में चार पांच जोड़ी कपड़े रखे। बाहर बहुत शोर हो रहा था लगता है बड़े मालिक की दावत खत्म हो गई और लोग विदा ले रहे हैं। क्या विडंबना थी पिता दोस्तों के साथ दावत उड़ा रहा था और पुत्र इतना अकेला,बेबस महसूस कर रहा था कि उसने अपना जीवन ही समाप्त कर लिया। केतकी का दिल बहुत भारी हो रहा था। बाहर चहल-पहल थी , मुख्य द्वार गार्ड ने खोल रखा था, गाडियां बेरोकटोक बाहर जा रही थी। वह भी चुप चाप इस गहमागहमी में निकल गई किसी का ध्यान उस पर नहीं गया। बाहर निकलते ही थोड़ी दूर चलने पर एक ओटो नजर आया, तुरंत बैठ गई और बस अड्डे चलने को कहा।डर तो बहुत लग रहा था कभी घर से बहुत दूर नहीं गयी थी और अब तो शहर छोड़ कर जा रही थी। रास्ते भर हनुमान चालीसा पढ़ती रही मन ही मन।बस अड्डे पर पता किया तो एक बस तैयार खड़ी थी आधे पौने घंटे में गोरखपुर निकलने के लिए।एक टिकट लेकर कोने की सीट पर बैठ गई,दुबक कर , अपने को अच्छी तरह दुपट्टे से ढक लिया। बड़े मालिक का इतना खौफ था कि बार बार पलट कर इधर-उधर देखती, कहीं कोई उनका आदमी तो नहीं आ गया उसे ले जाने के लिए। आंखें बंद करती तो पंखे से लटकी छोटे मालिक की देह आंखों के आगे घूम जाती।दुख और डर के कारण आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।
बारह तेरह साल की थी, बापू को ढूंढने निकली तो कोठी की खिड़की के पास से गुजरते हुए उसे अंदर से बड़ी अजीब तरह की आवाज सुनाई दी। जैसे किसी का दम घुट रहा हो और खांस भी रहा हो, खिड़की खुली थी अंदर झांका तो देखा छोटे मालिक जमीन पर कुछ ढूंढ रहे थे।एक हाथ मुंह पर रखा था और दूसरे से कुछ टटोल रहे थे। इससे पहले उसने छोटे मालिक को दो तीन बार तैयार हो कर गाड़ी में बैठ कर कहीं आते जाते ही देखा था। वह तुरंत खिड़की से कमरे में कूद गयी और   पलंग के नीचे खिसक गया इन्हेलर उठा कर छोटे मालिक को दे दिया।
पांच मिनट अपने आप को संयत कर उसकी तरफ देखते हुए बोला :” धन्यवाद।”
फिर मुस्करा कर बोला :” पीछे उस छोटे से मकान में रहती होना।क्या नाम है तुम्हारा?”
केतकी :” केतकी ।”
वह आगे बोला :” अक्सर देखता हूं तुम्हें, कभी स्कूल जाते हुए तो कभी अपने पिता की बगीचे में मदद करते हुए। तुम्हारा जब मन करे इस कमरे में आ जाया करो ,कोई नहीं होता मेरे अलावा यहां।”
केतकी जाने के लिए खिड़की से कूद ही रही थी कि छोटे मालिक की यह बात सुनकर उसे हंसी आ गई। हैसियत और उम्र का फासला कितना था दोनों के बीच।वह छटी में पढ़ रही थी और छोटे मालिक ग्यारहवीं में। लेकिन शारिरिक दृष्टि से देखा जाए तो छोटे मालिक की लम्बाई केतकी से एक डेढ़ इंच ही ज्यादा होगी और दुबले-पतले बिमार से लगते थे जबकि केतकी खुलें आसमान के नीचे उछल-कूद करने वाली , तंदुरुस्ती से खिलखिलाती लगती थी। अगली रात को केतकी ने देखा छोटे मालिक खिड़की पर खड़े उसका इंतजार कर रहे थे, उसे देखते ही इधर उधर देखा कोई देख तो नहीं रहा और फिर इशारे से उसे बुलाया। चाकलेट देते हुए बोले :” यह तुम्हारे लिए लाया था, खा लेना बहुत स्वादिष्ट हैं।कल तुम ने मुझ पर बहुत उपकार किया था।
अब वह अक्सर रात को उसे कोई न कोई ऐसा स्वादिष्ट पदार्थ खाने को देता और वह प्रसन्नता से ले लेती। एक रात वह बोला :” अगर फिल्म देखनी है तो अंदर आ जाओ , बहुत मजेदार फिल्म है, देखने में मज़ा आएगा।” बापू घर में धुत्त पड़ा था केतकी मान गई।कोमेडी फिल्म थी दोनों बहुत हंसे ,बड़ा आनन्द आया फिल्म देखकर। जब केतकी ने कहा :” अच्छा छोटे मालिक चलती हूं।”
तब वह बोला :” केतकी तुम मुझे अनंत बोला करो , अब हम दोस्त हैं।”
लेकिन केतकी ऐसा कोई जोखिम नहीं उठाना चाहतीं थीं , जानती थी किसी के भी सामने छोटे मालिक का नाम मुंह से निकल गया तो उसकी धुनाई हो जाएगी। हैसियत के कारण जो संकोच की दीवार थी दोनों के बीच वह तोड़ना नहीं चाहतीं थीं। अब अक्सर टीवी देखने या बोर्ड गेम्स खेलने के लिए अनंत उसे कमरे में बुला लेता था। महिने के आखिरी हफ्ते तो केतकी रोज ही अनंत के कमरे में चली जाती , उसके घर में तो खानें के लिए उन दिनों कुछ होता नहीं था। बापू शराब में सारा वेतन उड़ा चुका होता था। अनंत राधारानी से कहकर चार परांठे बनवाकर कमरे में रखवा लेता था।दो केतकी खा लेती थी और दो अपने बापू के लिए लें जाती थी, उसे जब होश आता था भूख लगती खाना खा लेता।
राधारानी ने उन दोनों की दोस्ती और मुलाकातों को राज़ ही रखा । जानती थी दोनों बच्चे अपने अपने जीवन के किसी अधूरे पन को बांट रहे थे। उसके मन में अनंत के लिए बहुत सहानुभूति थी, पिता की महत्वकांक्षा और तिरस्कार उस भोलें बच्चे को पनपने नहीं दे रहा था। जगतपाल जब भी नशे में होता पहले अपनी पत्नी को ताने मारकर बेहाल कर देता कि उसने एक ही औलाद दी वह भी शारीरिक दृष्टि से कमजोर। उसे लगता था उसकी इतनी बड़ी जायदाद को संभालने और बढ़ाने का अनंत में दमखम ही नहीं था।
फिर जगतपाल अनंत पर चिल्लाता और कोसता कि अनंत कितना असक्षम है जब देखो तब बिमार रहता है, किसी भी तरह का मानसिक और शारीरिक तनाव झेल नहीं सकता। मां ने कभी पति के आगे मुंह नहीं खोला तो अनंत भी चुपचाप सुनता रहता , जानता था कुछ बोला या रोया तो जगतपाल और बेकाबू हो जाएगा, और जोर से चिल्लाएगा या थप्पड़ मारेगा। कमरे में आकर अनंत अकेले में अपनी और मां की बेबसी पर आंसू बहाता। कईं बार उसके बाद उसकी तबीयत इतनी खराब हो जाती ,सारी रात मां उसे थामें बैठी रहती। लेकिन जब से केतकी से दोस्ती हुई थी ,पिता से डांट खाने के बाद वह कमरे में आकर रोता नहीं था । केतकी को बुलाकर किसी बोर्ड गेम में या बातों में लग जाता और पिता की अपमान जनक बातें भूल जाता। पुत्र की इस खुशी में मां ने भी बाधा नहीं डालीं जैसा चल रहा है भगवान की मर्जी समझ कर ख़ामोश रहीं।
पिता के प्यार से वंचित अनंत में आत्मविश्वास नहीं जन्मा और स्कूल में सहपाठियों के साथ कदम से कदम मिलाकर न चलने के कारण मज़ाक का विषय बना रहा। लेकिन केतकी की नजरों में वह बहुत ऊंचे स्थान पर था।वह केतकी को अपने स्कूल और बाद में कालेज की बातें बताता,वह पैसे वालों की इस अनजान दुनिया की बातें बड़ी कौतुक से सुनती।वह अपने मन की बातें, सपने और डर, चिंता सब उसे बताता । केतकी उम्र में छोटी , खामोश और शर्मिली लड़की थी,समझ आएं न आएं अनंन की सब बातें बहुत ध्यान से सुनतीं थी। अनंत की अंग्रेजी अच्छी थी, उसके द्वारा प्रयोग किए गए भारी भारी शब्द उसे समझ नहीं आतें थे तो अनंत ने उसे अंग्रेजी सिखानी शुरू कर दी।
राधारानी को केतकी की काया के उभार देखकर ऊंच नीच की चिंता होने लगी थी तो यदा कदा स्त्रि के मान सम्मान की बातें उसे समझा देती थी। केतकी की बढ़ती उम्र के साथ सोच भी परिपक्व होती जा रही थी । अनंत के पास अंग्रेजी किताबों और उपन्यासों का ढेर था,वे उसकी साथी थी। केतकी अब अनंत से लेकर उन्हें पढ़ने लगी थी और प्रेम कहानियां पढ़ कर उसके मन में एक सपना पलने लगा था। एक ऐसे जीवन साथी की कल्पना करती जिसके प्रति आकर्षित होकर ,तन मन से उसको समर्पित होकर जीवन व्यतीत करें। अनंत से बात करना उसे अच्छा लगता था , उसके साथ समय बिताना अच्छा लगता था ,वह एक दोस्ती का रिश्ता था, जिसमें कुछ सहानुभूति भी थी, लेकिन वह प्रेम और आकर्षकण नहीं था जो जीवन साथ बिताने के लिए चाहिए। यह बात वह समझ गई थी लेकिन अनंत के दिल की बात एक दिन सुनकर वह घबरा गई।
अनंत स्नातक की आखिरी परीक्षा देकर आया था और बहुत खुश था। उसने केतकी का हाथ अपने हाथ में लेते हुए उसकी आंखों में आंखें डालकर बड़े प्रेम से कहा :” जानती हो मैं क्या सपना देखता हूं? हम दोनों कहीं दूर प्रकृति की गोद में में एक छोटा सा घर लेकर रहें और हमारे पास जितना हो हम उसी में प्रसन्नता और संतुष्टि से रहें। कहीं किसी का दबाव या कहा सुनी न हो।”
केतकी ने हंसते हुए कहा :” छोटे मालिक मैं तो किसी भी परिस्थिति में न्यूनतम साधनों के साथ आराम से रह सकतीं हूं लेकिन आप ( कमरे के चारों तरफ नजर डालते हुए) इन सब वस्तुओं के बिना कैसे रह सकोगे?”
अनंत मुस्कराते हुए ” तुम्हारा साथ होगा तो मैं किसी भी परिस्थिति में सुख से रह सकता हूं ।”
केतकी ने तब तो बात आगे बढ़ाई नहीं लेकिन उसको चिंता रहने लगीं। कुछ समय से उसको अनंत की आंखों में अपने लिए चाहत नजर आने लगी थी लेकिन उस दिन तो अनंत ने अपने मन की बात बेबाकी से कह दी थी। वह जानती थी इस रिश्ते का कोई भविष्य नहीं था , जगतपाल को भनक भी लग गई तो अनंत को प्रताड़ित करने का एक और मुद्दा मिल जाएगा । उसके बापू की नौकरी भी जाएगी ,इस उम्र में वो कहां जाएंगे और स्वयं उस पर क्या गाज गिरेगी कह नहीं सकते। अभी वह बालिग भी नहीं थी , दसवीं की परीक्षा दी थी, अनंत अपने पिता से बचकर कहां जाकर रहेंगे और बाहरी दुनिया का सामना करने में कितना सक्षम है क्या कह सकते हैं। केतकी के दिल में अनंत के लिए इतना स्नेह था वह नहीं चाहती थी कि उसके कारण वह किसी मुसीबत में पड़े या उसके दिल को आघात पहुंचें। उसने अनंत के पास जाना कुछ कम कर दिया। धीरे धीरे वह मिलना  बिल्कुल बंद कर देना चाहतीं थीं।
जगतपाल चाहता था अनंत अब उसके कारोबार में हाथ बंटाना   प्रारंभ कर दे । लेकिन अनंत की ऐसी कोई मंशा नहीं थी,वह जानता था पिता के साथ काम करने का मतलब है बात बात पर सबके सामने अपमानित होना । पहली बार उसने अपने मन की बात पिता के सामने रखी कि वह दो साल आगे और पढ़ना चाहता है । जगतपाल को बात जमीं तो नहीं लेकिन वह जानता था उसको अपना पुत्र बोझ लगता है और उसकी कमियों को झेलने का धैर्य उसमें नहीं था ,तो मान गया। अनंत अब बहुत खुश था,दो साल में केतकी भी बालिग हो जाएगी, बारहवीं भी उत्तीर्ण कर लेगी ।वह उसको लेकर अपने दोस्त भास्कर के पास चला जाएगा, जहां उसके साथ आराम से रहेगा।
केतकी ने आना कम कर दिया था , इससे अनंत का मन उचाट रहने लगा। फिर उसे लगा सही है। अब केतकी के समीप आने पर उसके लिए अपने आप पर नियंत्रण रखना थोड़ा मुश्किल हो जाता था। जब भी केतकी से मिलता भविष्य की बातें करता,उसको सलाह देता बारहवीं करके वह अंग्रेजी  में बीए करें फिर बीएड करके किसी स्कूल  में अंग्रेजी की शिक्षिका बन जाएं। समय बीत रहा था , शारीरिक परिवर्तनों के कारण केतकी में संकोच और लज्जा बढ़ती जा रही थी। दूसरे उसकी जिम्मेदारी भी बढ़ रही थी। पिता का स्वास्थ गिरता जा रहा था इसलिए उनकी नौकरी बनाए रखने के लिए बगीचे में वह अधिक समय लगाने लगी थी। कईं बार अनंत आर्थिक सहायता करने के उद्देश्य से कुछ रुपए केतकी को देने की कोशिश करता तो वह स्वीकार नहीं करती । खाने की वस्तुएं वह लें लेती थी लेकिन पैसे लेना उसे गवारा नहीं था।वह यह लांछन बर्दाश्त नहीं कर सकती थी कि दोस्ती की आड़ में उसने अनंत से अवांछनीय लाभ लेने की कोशिश की।
केतकी बारहवीं की अंतिम परीक्षा देकर घर आयी थी ,सोच रही थी रात को अवश्य अनंत से मिलने जाएगी ,दो महीने से उसकी शक्ल नहीं देखी थी। रात को जब वह खिड़की के पास पहुंचीं तो देखा अनंत खिड़की खोले उसके इंतजार में खड़ा हैं।
उसको देखते ही मुस्कुराते हुए खिड़की के आगे से हटते हुए बोला :” बहुत देर से तुम्हारा इंतज़ार कर रहा था ,अगर और दस मिनट नहीं आती तो राधारानी को भेजने वाला था तुम्हें बुलाने के लिए। “
कमरे की रोशनी में अनंत को देख कर केतकी सकते में आ गई, चिंतित स्वर में बोली :” आपको क्या हुआ छोटे मालिक ,इतने कमजोर कैसे हो गये , बिमार हो क्या?”
अनंत कुर्सी पर बैठते हुए उदास स्वर में बोला :” एक महीने से तबीयत बहुत खराब चल रही है ,दो बार अस्पताल भी रहकर आया हूं।”
केतकी ने अनंत का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा :” मुझे राधा आंटी से कहकर पहले क्यों नहीं बुलवाया, अकेले इतना दर्द सहन करते रहे ‌।ऐसी दोस्ती भी किस काम की जब परेशानी में बुलाने का हक भी नहीं रखा।” अनंत ने दूसरे हाथ से केतकी के गाल को सहलाते हुए कहा :” तुम्हारी बारहवीं की परीक्षा चल रही थी , तुम्हें डिस्टर्ब नहीं करना चाहता था।”
केतकी :” अच्छा बताओ हुआ क्या था ?”
अनंत गहरी सांस लेते हुए बोला :” डैड मेरी शादी अनुराधा से करना चाहते हैं,वो स्कूल में मेरे साथ पढ़ती थी और घर पर भी आना जाना है। वह शुरू से ही मुझे नापसंद करती थी और मेरा मज़ाक उड़ाती थी। डैड की देखा-देखी वह भी मुझे मरीयल कीड़ा बुलाती है। डैड ने जब एक महीने पहले अपना निर्णय सुनाया तो मैं ने इंकार कर दिया और उन्होंने हमेशा की तरह मुझे बहुत बुरा भला कहा। इस तरह के भावनात्मक दबाव मेरे अस्थमा को ट्रिगर कर देता है । सारी रात मेरी तबियत खराब रही। मैं ने अनुराधा से बात की और पूछा की वह मुझ से शादी क्यों कर रही है? उसने कहा पहले तो नहीं करना चाहती थी लेकिन उसके पिता ने दबाव डाला तो वह मान गई। फिर हंसते हुए बोली ‘ तुम तो बिमार रहते हो होने वाले पति देव, तुम आराम करना और मैं तुम्हारी दौलत से ऐश करूंगी’ ।”
बोलते-बोलते अनंत हांफने लगा तो केतकी ने उसको खामोश रहने को कहा। अनंत पलंग पर लेट गया और केतकी उसके पास बैठ गई । उसकी बातें और हालत देखकर केतकी का मन बड़ा द्रवित हो रहा था । अनंत :” एक दिन दोनों परिवार होटल में खाना खाने गए, मैं वैसे ही बहुत टेंशन में था ‌। वहां भीड़ थी इसलिए घुटन महसूस हो रही थी, मुझे सांस लेने में तकलीफ़ होने लगी। मैं बीच में उठ कर बाहर जाने लगा तो डैड इस बात से इतना नाराज़ हो गये कि सबके सामने चीखना शुरू कर दिया। मुझे वहीं अटैक पड़ गया ,अस्पताल में कईं दिन रहा। डाक्टर कहते हैं मेरे फेफड़े कमजोर हो गए है, मुझे आराम की जरूरत है। दो तीन दिन से फिर इसी बात के पीछे पड़े हैं, वो समझ नहीं रहे हैं अनुराधा से शादी करके मैं घुट घुट कर मर जाऊंगा। “
अनंत की बातें सुनकर वह भी रो पड़ी, उसने अनंत का सिर अपनी गोद में रख लिया और धीरे धीरे सहलाने लगी।
अनंत :” मैं अगर खुश और जिंदा रह सकता हूं तो बस तुम्हारे साथ । लेकिन डैड को यह बात पता चलेगी तो वह तुम्हें घर से निकाल देंगे। मेरी समझ नहीं आ रहा मैं कैसे अनुराधा से अपनी शादी न होने दूं।”
केतकी के पास इस समस्या का कोई समाधान नहीं था। वह जानती थी बड़े मालिक की ताकत के आगे कोई नहीं टिक सकता। सिर सहलाते हुए केतकी का हाथ अनंत की पीठ पर चला गया तो वह कराह उठा। उसने जरा शर्ट उठा कर देखा तो चोट के निशान थे।
अनंत :” एक दिन अपनी बेल्ट से भी मारा था अपनी बात मनवाने के लिए।”
केतकी का दिल चित्कार उठा, कोई बाप ऐसा कैसे हो सकता है। उसने अनंत की शर्ट उतार कर देखी , चार पांच लम्बाई में निशान थे जो अब भरने शुरू हो गए थे। उसने पास में रखी मरहम लेकर हल्के हाथों से अनंत की पीठ पर लगा दी। अनंत दुखी स्वर में बोला :” एक तुम्हीं हो जो मेरी मजबूरी समझती हों फिर भी मुझसे इतना स्नेह करती हों। माॅम भी डैड के डर से खुल कर मेरा साथ नही देती है । बहुत अकेला महसूस करता हूं।” और उसके आंसू निकल पड़े। केतकी उसकी दशा देखकर फफक पड़ी, अपनी बाहों में भरकर उसे बैंठी रहीं।उसका मन कर रहा था कहीं दूर लेजाकर अनंत को इतना स्नेह दे कि उसके जीवन की सब कमी को भर दें। दोनों एक दूसरे की बाहों में निंद्रा मग्न हो गये ।
केतकी को कुछ असहज लगा तो उसकी आंख खुल गईं, देखा अनंत उसके गालों होंठ और आंखों को किस कर रहा था। वह हड़बड़ा कर उसे अलग करने ही वाली थी कि उसकी आंखों में असीम दर्द और अपने लिए प्रेम देखा तो ठिठक गई। वह कह रहा था :” जानती हो जब से मुझे अहसास हुआ हैं कि मैं तुम से प्रेम करता हूं ,हर रात कल्पना करता हूं कि तुम मेरी बांहों में इस तरह लेटी हो और मैं तुम्हें अपने प्रेम से सरोबार कर रहा हूं,सब कुछ भुला कर तुम में समा गया हूं।”
केतकी को कोई उत्तेजना महसूस नहीं हो रही थी लेकिन उसने अनंत की उत्तेजना में कोई बाधा नहीं डालीं ‌,खामोश पड़ी रही।जब अनंत थक कर सो गया तो चुपचाप उसको एक तरफ करके ,दोहर उढा कर वह अपने घर चली गई। उसे समझ नहीं आ रहा था जो हुआ सही हुआ या ग़लत , राधारानी ने यह सब न करने की हिदायत दी थी। वह तीन चार दिन तक चुपचाप अपने कमरे में पड़ी रही , उसे घबराहट हो रही थी जो भी उसे देखेगा समझ जाएंगा उसने क्या किया था। धीरे धीरे वह सामान्य हुई उसे समझ आया ऐसा कुछ नहीं है और उसने बगीचे में काम करना शुरू कर दिया। स्कूल से छुट्टी हो गई थी , आगे की पढ़ाई का पता नहीं था क्या करना है। उसे राधारानी ने बताया अनंत की फिर तबीयत खराब हो गई है और उसे दिल्ली ले जाया जा रहा है बड़े अस्पताल में इलाज के लिए। बीस दिन बाद वह वापस तो आ गया लेकिन अब कमरे में उसकी मॉम हर समय उसके साथ रहती थी। राधारानी वैसे कह रही थी अब कुछ ठीक महसूस कर रहा था। डेढ़ महीने हो गए थे और केतकी अनंत से मिल न सकी,अब उसको स्वयं को उल्टी और चक्कर की समस्या हो गई थी।
केतकी को पता नहीं चला कब आंख लग गई, जब कंडक्टर ने आवाज़ लगाई तब देखा पौ फट गई थी और मुसाफिर बस से उतर रहें थे। वह उतर कर गांव जाने के लिए एक टेम्पो में बैठ गई। टेम्पो ने जहां उतारा वहां से पूछती हुईं वह भास्कर टैक्सटाइल मिल तक पहुंच गई। लोहे के बड़े से गेट के बाहर खड़ी उसने घंटी बजाई,न जाने कौन दरवाजा खोलेगा। पांच मिनट बाद जब दरवाजा खुला तो सामने एक तेईस चौबीस  साल का हृष्ट-पुष्ट नौजवान खड़ा था, केतकी ने घबराते हुए कहा :” भास्करजी से मिलना है।”
नौजवान ने उसे आश्चर्य से देखते हुए कहा :” तुम? मैं ही भास्कर हूं।”
वह उसे अंदर ले गया और बोला :” मैं तुम्हें पहचान गया हूं, तुम केतकी हों। अनंत तुम्हारी बहुत बातें करता था।”
केतकी को आश्चर्य हुआ अनंत ने उसे भास्कर के बारे में कभी कुछ नहीं बताया। उसने भास्कर को अब तक की सब आपबीती सुनाई तो वह उदास होते हुए बोला :” मैं अनंत के साथ स्नातक तक पढ़ा हूं,तब शहर में अपने पापा के साथ रहता था।उसका और कोई दोस्त नहीं था वह अपने दुख सुख मेरे साथ बांटता था। वह तुम्हारे बारे में इतना बोलता था कि मेरे दिमाग में एक तस्वीर खिंच गई थी तुम्हारी। वैसे एक बार उसने मुझे तुम्हारी कुछ तस्वीरें दिखाई भी थीं।”
केतकी को याद जब अनंत को उसके जन्मदिन पर नया कैमरा मिला था तब उसने उसकी कुछ तस्वीरें खींची थी।
भास्कर :” तुम्हें लगता है अब अनंत इस दुनिया में नहीं रहा तो उसके पिता को तुम्हारे जिंदा रहने से कोई फर्क पड़ेगा?”
केतकी :” निश्चित तौर पर मैं नहीं जानती अनंत के साथ आख़री समय पर क्या हुआ जो उन्होंने आत्महत्या की। उनके पिता जी मेरे बारे में कितना जानते हैं और क्या सोचते हैं। लेकिन मैं अनंत की आख़री निशानी को इस दुनिया में लाकर बहुत प्यार से पालना चाहतीं हूं,उसको वह सब देना चाहती हूं जिससे अनंत वंचित रहे।”
भास्कर :” मैं जानता हूं वह जितना प्यारा इंसान था उतना प्यार उसे मिला नहीं । उसकी माता जी के अलावा बस मैं और तुम ही थे जो उसे दिल से चाहते थे। जब मेरे पिताजी की मृत्यु हुई मैं बिल्कुल अकेला रह गया था, मां पहले ही नहीं रहीं थीं। अनंत ने तब मुझे बड़ा हौसला दिया था, आख़री साल था, किसी तरह पढ़ाई पूरी कर यहां दादाजी के पास आ गया था ।अब तो वो भी नहीं रहे , मैं उनके  इस उद्योग को संभाल रहा हूं। अनंत कहता था कि बस केतकी बालिग हो जाएं फिर मैं उससे विवाह करके यहां आ जाऊंगा और हम अपने अपने परिवार के साथ आराम से रहेंगे।बस कुछ समय और झेल लेता तो शायद उसका यह सपना पूरा हो जाता।” भास्कर की आंखों में आंसू थे,” तुम ठीक कहती हो हम दोनों उसकी इस अमानत की देखभाल करेंगे।”
तभी घंटी की आवाज़ सुनाई दी, भास्कर बोला ,” कमला ताई होंगी ,इस समय आकर घर के सारे काम कर जाती है , खाना भी बनातीं है। उन्होंने तुम्हें देख लिया तो आधे घंटे में गांव में सब को पता चल जाएगा। वैसे आज टैक्सटाइल मिल की छुट्टी हैं, कारीगर तो कोई आएगा नहीं। मैं उनको कहता हूं मुझे शहर जाना है इसलिए उनकी छुट्टी है।दस मिनट बाद जब भास्कर वापस आया तो केतकी वहीं बैठी थी जहां छोड़ गया था ।वह रसोई में गया और दोनों के लिए चाय ब्रेड़ लेकर आया।
भास्कर :” आगे क्या करना है यह सोचना होगा।अगर तुम गर्भवती नहीं होती तो तुम्हें गांव में कहीं भी ठहरा देता अपनी दूर की रिश्तेदार बता कर ‌। लेकिन अब लोग बात बनाएंगे।शहर जाकर किसी मंदिर में शादी कर लेते हैं , जिससे बच्चे को पिता का नाम भी मिल जाएगा। “
केतकी आंखें फाड़े भास्कर को देख रही थी,” नहीं नहीं मैं आप को इस तरह से किसी जबरदस्ती के बंधन में नहीं बांध सकती।आप अपनी मर्जी से अपनी पसंद की लड़की से शादी करने ।”
भास्कर :” अकेले बच्चे की जिम्मेदारी लेने के लिए तुम्हारी उम्र अभी बहुत कम है । बच्चें को सुरक्षात्मक और खुशनुमा माहौल देने के लिए यह कदम उठाना आवश्यक है।”
केतकी इतनी थकी हुई थी कि उसमें विद्रोह करने की शक्ति नहीं थी।सारा दिन भास्कर जैसा कहता रहा वह यंत्र चलित सी निर्देशों का पालन करती रही।शहर जाकर आर्य समाज मंदिर में फेरे भी ले लिए और लेडी डॉक्टर से चेकअप भी करा लिया।  डाक्टर के अनुसार केतकी में खून की कमी थी ,खाने पीने का खास ध्यान रखना होगा। लौटते वक्त भास्कर ने फल और अन्य खाद्य पदार्थ जिनसे ताकत मिलती है खरीद ली।
भास्कर के घर में तीन कमरे थे , उसने एक कमरा अलग से केतकी को दे दिया। रात को केतकी को लेटते ही नींद आ गई लेकिन आधी रात के बाद उसे बैचेनी होने लगी, कभी पिता की फ़िक्र होती तो कभी अनंत के लिए मन रोता। अगले दिन सारे गांव में भास्कर के विवाह की बात फैल गई, किसी न किसी बहाने गांव वाले केतकी को देखने आने लगें। लेकिन भास्कर उसके खाने पीने को लेकर बड़ा सतर्क रहा । धीरे धीरे सबका उत्साह ठंडा हुआ तो केतकी की दिनचर्या निर्धारित हो गई। वह कमला के साथ मिलकर घर के काम करती, घर और मिल के बीच में पड़ी खाली जमीन पर उसने फूल और सब्जियों के पौधे लगाए। शाम को अकेले खाना बनाती, भास्कर के आने के बाद खाना खाकर कुछ देर टीवी देखती फिर सोने चली जाती। भास्कर को उसका घर में रहना बहुत अच्छा लगने लगा, पहले जब शाम को घर आता था तो स्वयं रोशनी जलाता,कुछ खाने को बनाता,कुछ सुबह का कमरा का बनाया हुआ रखा होता वह खा लेता। वैसे तो केतकी बिल्कुल खामोश रहती थी लेकिन भास्कर को उसकी उपस्थिति खाली घर में बहुत सुकून देती। वह उसको सारे दिन मिल में जो घटित होता उसके बारे में बताता रहता।मिल की खिड़की में से वह जब तब झांक कर देखता रहता।
केतकी बगीचे में काम करती दिखती तो उसकी आंखें तृप्त हो जाती। वह कहीं बार सोचता केतकी को अपने दिल का हाल बता दें लेकिन उसकी मनोस्थिति देखकर ठिठक जाता।आधा प्रेम तो वह केतकी को बिना देखे ही करने लगा था,जब अनंत केतकी के बारे में बात करता रहता था। अब तो वह साक्षात उसके सामने थी , उसकी कल्पना को मूर्त रूप मिल गया था। केतकी उसकी सोच से अधिक सुंदर थी तो उसका दिवाना होना लाजिमी था। केतकी जब भी भास्कर की तरफ देखती वह उसे निहार रहा होता। वह उसकी उपस्थिति में बहुत असहज महसूस करती थी इसलिए बिल्कुल चुप रहती। उसे भास्कर की बातें सुनना अच्छा लगता ,वह उसका इतना ध्यान रखता इससे उसका मन प्रफुल्लित हो जाता था। लेकिन उसे ग्लानी अनुभव होने लगी कि उसकी कोख में अनंत का बच्चा है और वह भास्कर के बारे में ऐसे विचार अपने मन में पनपने दें रहीं हैं। सात महीने हो गए थे और उसने अपने दिल में इस तरह की बातों का ऐसा जाल बुन लिया था कि वह रात को ठीक से हो भी नहीं पातीं थी। भास्कर को उसकी चिंता होती लेकिन उसकी परेशानी का कारण वह समझ नहीं पाता।
एक रात भास्कर पानी पीने उठा तो केतकी के कमरे में से उसे सिसकने की आवाज आई। दरवाजे को खटखटाने के लिए हाथ लगाया तो वह खुल गया, अंदर केतकी नींद में रो रही थी। भास्कर ने उसे झिंझोडा तो वह घबरा कर उठ गई और भास्कर को देख उससे लिपट कर रोने लगी। भास्कर उसे काफी देर तक सहलाता रहा फिर कारण पूछा तो वह बोली :” अनंत सपने में दिखते है रात को , बहुत दुखी लगते हैं , कभी बचाओ बचाओ चिल्लाते हैं तो कभी रोते रहते हैं। “
भास्कर समझ गया केतकी अभी पुरानी यादों से निकली नहीं है। वह बोला :” केतकी अगर तुम भूत काल से बाहर नहीं निकलोगी तो जीवन बहुत मुश्किल हो जाएगा। तुम्हें अफसोस है कि आख़िरी समय तुम अनंत की मन की स्थिति समझ नहीं पायी अगर समझ जाती तो अनंत को बचा लेती । अपने आप को दोषी मानती रहोगी तो इस तरह के सपने आते रहेंगे। तुम अनंत के लिए जो कर सकतीं थीं किया ,हम सब की सीमाएं होती है जिसके आगे हम चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते। तुम उसका भाग्य नहीं बदल सकती थी,नियति में उसके जो लिखा था वह तुम मिटा नहीं सकती थी। तुम अपना और बच्चे का ध्यान रखो ,इस तरह तुम दोनों को नुक्सान पहुंचा रही हों।
केतकी को भास्कर की बात समझ आ रही थी उसने अपने दिमाग पर नियंत्रण रखने का निश्चय किया। भास्कर उसकी समस्या समझ गया था ,अब उसकी  खुराक के अलावा खुश रहने की हिदायत देता रहता। नियत समय पर केतकी ने एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया। दोनों ने आपसी सहमति से उसका नाम अनंत रखा। बच्चें के साथ दोनों बड़े खुश थे। भास्कर को लगता था उसका परिवार पूरा हो गया है बस केतकी उसके मन की बात समझ जाती तो और अच्छा होता। केतकी भी इस अहसास से अनभिज्ञ नहीं थी लेकिन अपनी ओर से कोई संकेत देने में संकोच महसूस कर रही थी। अनंत सवा महीने का हो गया था ,गांव की औरतों ने मिलकर केतकी की सारी रस्में पूरी कर दी थी।
शाम हो गई थी भास्कर खुश था ,आज केतकी से मन की बात करेगा और फिर एक हफ्ते के लिए उसके साथ कहीं बाहर घूमने जाएगा। कारीगरों ने काम बंद करके निकलना शुरू कर दिया था तभी एक कारीगर दौड़ता हुआ आया और बोला :” भास्कर भैया कोई बड़ी गाड़ी में शहर से सेठ आया है केतकी भौजाई के लिए पूछ रहा है।” भास्कर सब काम छोड़कर तुरंत भागा ,घर के बाहर देखा अनंत के पिता थे केतकी से रौबदार आवाज में बात कर रहे थे।
जगतपाल :” तो तुम यहां छुप कर बैठी हो,नौ महीने से तुम्हे कहां कहां नहीं ढूंढा। तुम्हारे पिता को बिना कुछ कहे जाने दिया कि उसे पता होगा तुम कहां हो , सीधे तुम्हारे पास जाएगा।वह अपने गांव चला गया, वहां तुम्हारा कोई अता-पता नहीं चला। तुम्हारे और अनंत के सब सहपाठियों और जानकारों को खंगाला तब यहां पहुंचे हैं। तुमने अनंत को अपने रूपजाल में फंसाया था तभी वह अनुराधा से शादी नहीं करना चाहता था। बेहोशी में भी जब वह तुम्हारा नाम ले रहा था तब हमने समझा जवानी का जोश ठंडा करने के लिए तुम्हारा इस्तेमाल कर रहा है। लेकिन तुम ने उसे ऐसे वश में कर रखा था कि उसे किसी और से शादी करने के स्थान पर मरना स्वीकार्य था। खैर यह बच्चा उसका हैं इसे हम पालेंगे और अपना वारिस बनाएंगे।”
केतकी :” नहीं यह मेरा पुत्र हैं , आपने अपने पुत्र का जो हश्र किया वह मैं इसका किसी भी हालत में नहीं होने दूंगी।”
जगतपाल के इशारे पर उसके साथ आए बोड़ी गार्ड्स में से एक बढ़ा बच्चें को झपटने के लिए , तभी भास्कर बीच में आ गया। दूसरे गार्ड ने इतने में गोली चला दी ,यह देखते ही कारीगरों की भीड़ बेकाबू हो गई। कुछ गार्ड्स की तरह भागें, उनकी बंदुकें छीन कर उनको पीटने लगे। दो तीन भास्कर को लेकर अस्पताल चले गए। कारीगरों में भास्कर के कारण गुस्सा बढ़ता जा रहा था वो सब जगतपाल की तरफ बढ़ने लगे। बेकाबू भीड़ को अपनी तरफ बढ़ता देख जगतपाल ऐसा घबरा गया कि उसको दिल का दौरा पड़ गया।
उसको गिरता देख केतकी बच्चा किसी और को पकड़ा जगतपाल की तरफ लपकी ।भीड़ को समझा-बुझाकर शांत किया और जगतपाल को भी अस्पताल भिजवाने का प्रबन्ध किया। भास्कर की उसे बहुत चिंता हो रही थी ,गांव में कोई अच्छा अस्पताल था नहीं इसलिए शहर ले जाना पड़ा और उसमें एक घंटा बर्बाद हो गया।
अस्पताल में बैठी केतकी का बुरा हाल था, न जाने क्या होगा, कैसे रहेंगी भास्कर के बिना। भास्कर का ओप्रेशन हो रहा था गोली कंधे में लगी थी। डाक्टर ने जब बताया ओप्रेशन सफल रहा तो उसने राहत की सांस ली। जगतपाल को डाक्टर नहीं बचा पाए। भास्कर को देख कर केतकी के आंसू आ गए, उसके पास बैठते हुए बोली :” बहुत डर गई थी आपको कुछ हो जाता तो मेरा क्या होता?”
भास्कर :” जानता हूं , मुझे भी यह अहसास हो गया है कि मैं भी तुम्हारे बिना जीवन नहीं काट सकता हूं। ” एक हाथ से केतकी के हाथ को अपने होंठों के पास ले जाते हुए बोला:” यह पंगा नहीं पड़ा होता तो तो मैं तुम्हें शादी के नौ महीने बाद हनीमून पर ले जाने की सोच रहा था। कोई बात नहीं ठीक होते ही चलेंगे तब तक बोल कर बताऊंगा तुम्हें कितना प्यार करता हूं और कब से।”
केतकी लजाते हुए :” नहीं इसकी आवश्यकता नहीं है , मुझे आपकी आंखों में दिख रहा है। जो गोली मुझे लगती वह आपने अपने ऊपर ले ली यह इस बात का प्रमाण है कि आप का प्रेम कितना गहरा है।”
भास्कर :” अनंत कहां है?”
केतकी :” अपनी दादी के पास, बड़े मालिक की तबीयत के बारे में जब बड़ी मालकिन को पता चला तो वे तुरंत आ गई। पति के देहांत के कारण दुखी हैं लेकिन अनंत को गोद में लेकर संतुष्ट हैं।”
भास्कर चिंतित स्वर में :” अगर वो उस पर अपना अधिकार जमाने लगीं तो ?”
केतकी :” वो कह रही थी अब शहर में अकेले उनका मन नहीं लगेगा,वो गांव में आकर रहेंगी। अनंत के लालन-पालन में मदद करेंगी। इतनी जायदाद का वो अकेली  क्या करेंगी इसलिए गांव में अच्छा अस्पताल और स्कूल बनवाने में उसका उपयोग करना चाहती है।इस तरह उनको लगता है पति के पापों का प्रायश्चित हो जाएगा और उनके बेटे की आत्मा को शांति मिल जाएगी | ‌”

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