अनकहा प्रेम

Anakaha Prem

मेरा अट्ठारहवा जन्मदिन था , डैड ने बहुत बड़ी पार्टी का आयोजन किया था। सब मेहमान आ गये थे बस डैड नज़र नहीं आ रहे थे,घर में स्थित अपने आफिस में बैठे काम कर रहे होंगे।मैं ने मॉम का गाऊन पहना था और उनकी तरह बाल बनाएं थे इसलिए बिल्कुल उनका प्रतिबिंब लग रही थी। आदमकद शीशे में अपने आप को निहारते हुए सोच रही थी काश इस समय वह भी मेरे साथ खड़ी होती तो हम दो बहनें लगती, लेकिन दो साल पहले एक सड़क  हादसे के कारण वो मुझे और डैड को छोड़ कर चलीं गईं थीं। इससे पहले मेरे आंसू बहने शुरू हो जाते मैं जल्दी से कमरे से बाहर आ गई।

सामने से अभिरथ अंकल आ रहें थे, मुझे देखते ही ठिठक गए,जिस हैरानी से वह मुझे देख रहे थे मैं समझ गयी ,एक पल को उन्हें लगा होगा मैं नहीं मॉम आ रही हैं।अभि अंकल मॉम-डैड के कॉलेज के समय से बहुत अच्छे दोस्त हैं और डैड के कुछ प्रोजेक्ट्स में बिजनेस पार्टनर। वो करीब आ गए थे और मुझे एकटक देखे जा रहे थे, उनकी चेहरे की व्याकुलता बता रही थी वो मॉम को कितना याद करते हैं। मॉम कहती थी वो किसी को बहुत प्रेम करते थें, परन्तु कभी मिलवाया नहीं उससे, उसकी याद में कभी शादी भी नहीं की। मैंने हंसते हुए कहा ,”हैरान हो गए हो ना आप, बिल्कुल मॉम लग रही हूं। डैड कहां है उनको बुला कर लाती हूं?” मैं लगभग भागती हुई डैड के आफिस की तरफ चली गई।

दरवाजा खोलती उससे पहले ही एक लम्बा चौड़ा बंदा बाहर निकला।एक पल को आंखें उससे टकराईं होंगी और मेरी संपूर्ण देह सिहर ‌ सी गई। मैं तुरंत आगे बढ़ गई लेकिन बहुत असहज महसूस कर रही थी, लगा जैसे किसी की निगाह मेरा पीछा कर रहीं हैं। मैंने इस अहसास को झटक कर डैड की तरफ देखा तो मन बड़ा दुखी हुआ। जब से मॉम गईं हैं डैड बिल्कुल अस्त व्यस्त रहते हैं न खाने का होश न कपड़ों का। अपने आप को सम्भालते हुए मैं ने कहा ,” डैड सब मेहमान आ गये हैं आप अभी तक कम कर रहे हो।” मुझे देखते ही उनकी आंखों में चमक आ गई और मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए तुरंत खड़े हो गए।

उस दिन पार्टी में मुझे बहुत आनन्द आया, अपने दोस्तों के साथ मैंने डांस और खूब मज़े किए। अखिल अपने मम्मी पापा के साथ आया था,वह मेरा बचपन का दोस्त है और अपने आप को मेरा बायफ्रेंड बताता फिरता है।आधी रात से अधिक समय बीत चुका था,सब मेहमान चले गए थे। डैड और मैं बहुत थके हुए थे पर डैड चिंतित और परेशान लग रहें थे। मेरे पास बैठते हुए मेरा हाथ अपने हाथ में लेते हुए बोले :” मेरी बिटिया की स्कूल की पढ़ाई खत्म हो गई है, आगे मैं चाहता हूं तू किसी दूसरे शहर में हास्टल में रहकर पढ़ाई कर। ”

मैं आश्चर्य से डैड का मुंह देखती रह गई,आज से पहले तो उन्होंने मुझे दूर भेजने की बात नहीं की थी अचानक ऐसा क्या हो गया। मुझे डैड की चिंता रहती थी उनका स्वास्थ्य गिरता जा रहा था, मैं किसी भी हालत में उनको अकेला छोड़कर नहीं जाना चाहतीं थीं। लेकिन उनकी आंखों में बेबसी थी,” मैं जो करने जा रहा हूं तेरी सुरक्षा और भलाई के लिए कर रहा हूं,मुझ पर विश्वास रख। मैं सब बंदोबस्त कर दूंगा बस तू किसी को नहीं बताना तू कहां पढ़ने जा रही हैं।” इतने कातर स्वर में बोल रहे थे कि तब मैंने बहस करना उचित नहीं समझा। इससे पहले मैं कुछ बोल पाती या विरोध करती ,एक हफ्ते से भी कम समय में डैड के साथ हवाई जहाज में बैठी चिन्नई की यात्रा कर रहीं थी ‌ उन्होंने मेरी स्नातक की पढ़ाई की व्यवस्था वहां के जाने माने, प्राईवेट कालेज में कर दी थी।

मुझे हास्टल में सामंजस्य बैठाने में  कुछ समय लगा , डैड की याद भी बहुत आती थी लेकिन जल्दी ही अपनी हमउम्र लड़कियों के साथ मस्त हो गई। मेरी कविता से अच्छी दोस्ती हो गई थी ,हम दोनो एक दूसरे से घंटों बातें करते। डैड का व्यवहार अजीब हो गया था ,वो मुझे अपने पास नहीं बुलाते जब भी छुट्टियां होती स्वयं मिलने चले आते। दो साल हो गए थे मैं एक बार भी घर नहीं गई थी। जून में एक महीने की छुट्टियों में डैड ने बीस दिन विदेश घूमने का कार्यक्रम बनाया, मुझे तो बहुत अच्छा लगा इतना समय उनके साथ बिताकर लेकिन वो बहुत खोये हुए से रहें।उनको वापस गये हुए तीन महीने हो गए , शुरू में एक दो बार फोन पर बात हुई फिर न जाने क्यों फोन मिला ही नहीं ‌। पहले मुझे लगा व्यस्त होंगे लेकिन कितने भी व्यस्त हो हफ्ते में एक फोन तो अवश्य करते थे। कुछ समझ नहीं आ रहा था और आज मैंने एक पोशाक ख़रीदीं तो मेरा क्रेडिट कार्ड नहीं चला मुझे पोशाक छोड़नी पड़ी। अगले दिन एकाउंट आफिस से बुलावा आया तो पता चला इस सिमेस्टर की फीस का चेक नहीं आया था,दो महीने से ऊपर हो गये थे। अब आगे पढ़ाई की इजाजत नहीं थी जब तक हिसाब नहीं हो जाता। ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ, मुझे चिंता होने लगी थी। कमरे में आकर कविता को जब सब बातें बताई तो उसे भी लगा कुछ गड़बड़ी है। मैं ने उससे पैसे उधार लिए और घर वापस आने की तैयारी कर ली।

मैं घर पहुंची तो बिल्कुल सन्नाटा था,न घर के बाहर कोई गाड़ी खड़ी थी न कोई गार्ड़। बगीचा जंगल की तरह लग रहा था, दरवाजे को हाथ लगाया तो खुल गया। अंदर कमरे खाली से पड़े थे,एक से एक महंगे फर्नीचर पेंटिंग और साज-सज्जा का सामन अधिकतर सब गायब थे। मुझे घबराहट हो रही थी,  कुन्ति आंटी अंदर से आ रही थी, उनके हाथ में सूटकेस था। मुझे देखते ही सूटकेस पटक कर मुझे गले लगा कर फूट-फूट कर रोने लगी।

कुंती आंटी ने मॉम को बचपन से पाला था,नानी की तबीयत ठीक नहीं रहती थी। शादी के बाद वो मॉम के साथ आ गई थी और घर की सारी जिम्मेदारी उन पर थी। कुंती आंटी ने जो कुछ बताया सुनकर मेरे होश उड़ गए। बहुत विस्तार से नहीं जानती थी लेकिन सारांश यह था कि डैड को मॉम के जाने के बाद से लगातार घाटा हो रहा था। जब कर्ज़ अधिक हो गया तो उन्होंने अपनी सबसे अधिक आधुनिक और लाभकारी फैक्ट्री उज्यंत खन्ना को बेच दी। उसमें महंगी विदेशी मशीनें थी जिसके उसने अच्छी कीमत दी थी। लेकिन उज्यंत ने जब फैक्ट्री का अधिकार लिया तब उन आधुनिक मशीनों के स्थान पर पुरानी, घटिया मशीनें उसे मिली। कुंती आंटी के अनुसार वह शहर का सबसे दबंग ,शातिर बिजनेस मैन है, कोई उसको धोखा देकर बच नहीं सकता है। उसने अपने तरीके से डैड से अपने सारे नुकसान की भरपाई कर ली,डरा धमकाकर उनके दूसरे बिजनेस अपने नाम कर लिये। खैर अब डैड कहां है? मैं ने आंटी से जानना चाह तो आंटी बोली ,” उस उज्यंत निकम्मे को सब लेकर भी तसल्ली नहीं हुई,एक हफ्ते पहले तेरे पिता को इतना मरवाया अपने गुंडे भेजकर कि अधमरी हालत में अस्पताल में पड़े हैं।”
सुनकर मुझे विश्वास नहीं हुआ।

मैं :” और मुझे किसी ने बताने की आवश्यकता भी नहीं समझी।”
कुंती आंटी :” मुझे लगा था स्थिति काबू में आ जाएगी, इलाज से हर्ष बाबू ठीक हो जाएंगे और फिर सब संभाल लेंगे , लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।
मैं ने अभिरथ को भी कईं बार फोन किया लेकिन वह पता नहीं कहां है फोन तक नहीं उठाया। किसी तरह घर का सामान बेचकर मैं हर्ष बाबू का अब तक का अस्पताल का बिल भरा है, लेकिन उनकी तबीयत में सुधार नहीं हुआ है। दो दिन से मुझे भी धमकी भरे पत्र मिल रहें हैं कि अगर मैं यहां से नहीं गईं तो मुझे भी मार डालेंगे। मैं अपना सामान बांध कर जा रही थी सोचा था रास्ते में कहीं से तुम्हें फोन  कर  के सब  बता दूंगी ।अब तुम्हीं सम्भाल सकती हो यह सब ।”

यह सब सुनकर मुझे रोना आ गया, में अकेले कैसे यह सब सम्भाल सकती हूं। मैं डरपोक किस्म की लड़की हूं, मैंने आज तक कोई भी काम अपने आप निर्णय लेकर नहीं किया , हमेशा मॉम और डैड पर निर्भर रहीं हूं। मैं ने याचना भरे स्वर में कुंती आंटी से कहा,” अब तो मैं आ गई हूं,आप प्लीज मेरे साथ रहो अकेले तो मुझे बहुत डर लगता है। ” वो मान गई और अंदर रसोई में मेरे लिए कुछ खाना बनाने चली गई।
जब मैंने अस्पताल में डैड को देखा‌ तो बहुत रोना आया। बेसुध पड़े थे, दुनिया भर की ट्यूब लगी थी, मुझे पहचान भी नहीं रहे थे। अस्पताल बहुत निम्न स्तर का था ,कुछ खास सुविधाएं नहीं थी। उन्हें तुरंत अच्छे अस्पताल में स्थानांतरित करना पड़ेगा लेकिन इसके लिए पैसे चाहिए तो सबसे पहले पैसो का इंतजाम करना पड़ेगा।

मैं सीधे अखिल के घर गई, उसकी मॉम और वह घर पर ही थें। अखिल मुझे देखते ही खुशी से उछल पड़ा लेकिन उसकी मॉम मुझे टेढ़ी नजरों से देख रही थी। मैं ने डैड की हालत के बारे में बताया और कुछ सहायता करने की विनती की। उसकी मॉम तीखे स्वर में बोली ,” देखो मानसी,हर्ष भाई साहब ने उज्यंत जैसे प्रतिष्ठित उद्योगपति को धोखा देने का सोचा भी कैसे। एक झूठे धोखेबाज इंसान की हम कोई सहायता नहीं कर सकते।सच पूछो तो हम तुम जैसे परिवार से अब कोई रिश्ता नहीं रखना चाहते हैं।” मुझे सुनकर अच्छा नहीं लगा, मैं ने अखिल की तरफ देखा तो वह नजरें चुरा रहा था।यह तो मैं हमेशा से जानती थी कि अखिल  में अपने बलबूते पर कुछ करने की हिम्मत नहीं है, लेकिन अपनी दोस्त को बुरे समय में कुछ सहारा तो दे सकता था। मैं चुपचाप बाहर आ गई,वह तो अच्छा हुआ अॉटो को मैंने रोक कर रखा था।
वहां से मैं अभिरथ अंकल के घर गई,शायद वो घर पर मिल जाए, फोन तो उठा नहीं रहें थे। जैसे ही दरवाजे पर खड़े गार्ड ने अंदर सूचना दी कि मैं आईं हूं,वो दौड़ते हुए आए मुझ  से मिलने। बड़ी प्रसन्नता से अंदर ले जाते हुए बोले :” मानी कहां थी अब तक , जन्मदिन के बाद से तुझे देखा ही नहीं,तू तो और भी सुंदर लगने लगी है।”

इस समय इन बातों का कोई औचित्य नहीं था, मैं दुखी स्वर में बोली,” वो सब बातें छोड़ो, आपको पता है डैड अस्पताल में हैं और उनकी तबीयत चिंतनीय है। मुझे उनके इलाज के लिए पैसे चाहिए जिससे मैं उन्हें किसी अच्छे अस्पताल में स्थानांतरित कर सकूं। ”
अभि अंकल का लहजा बदल गया,बोले :” हर्ष का बरताव सुहासिनी के जाने के बाद कुछ अजीब सा हो गया था।
उज्यंत के साथ इतनी बड़ी डील की और मुझे बताया तक नहीं। अरे नुकसान हो रहा था तो मुझसे बात तो करता। और उज्यंत को धोखा देते हुए एक बार भी नहीं सोचा इसका क्या परिणाम होगा। मैं कल ही आया था विदेश से,हर्ष को देख कर बहुत दुख हुआ।इस समय तो पैसों का बंदोबस्त करना मेरे लिए बहुत मुश्किल है।”

मैं :” मैं चाहती हूं आप हमारे मकान के बदले लोन दिलवा दें या बेचकर पैसों का इंतजाम कर दें।”
अभिरथ :” उज्यंत के डर से उस मकान पर कोई हाथ नहीं रखेगा न आगे बढ़ कर सहायता करेगा। वह इतना पैसे वाला है कोई उसके खिलाफ जाना नहीं चाहता।एक तरीका है इस परेशानी से निकलने का, तुम मुझसे शादी कर लो। ऐसा करने से तुम्हें ट्रस्ट का पैसा मिल जाएगा जो तुम्हारे नाना ने तुम्हारी शादी के नाम का बनाया था।”

अभी अंकल की आंखों में अजीब तरह की चमक थी, पता नहीं मुझसे शादी के विचार के कारण थी या इस परेशानी से निकलने के लिए सोचे गए अजीब से आइडिया के कारण। खैर मुझे घिन सी आई, अपने डैड की उम्र के बंदे से शादी!एक बार को ट्रस्ट के पैसे प्राप्त करने के लिए अभी अंकल अगर अखिल से शादी करने का सुझाव देते तो शायद मैं पचा जाती लेकिन … छी! मुझे चुप और असमंजस में देखा तो वो मेरे करीब खिसकते हुए बोले :” मानी तू इतनी सुंदर और भोली है कि तुझे मुझ जैसा मैच्योर और ताकतवर इंसान ही सुरक्षा दे सकता है। तेरी सब परेशानी मैं संभाल लूंगा तू बस मज़े से रहना। अगर अखिल के बारे में सोच रही है तो वह तो खुद बच्चा है, तुझे क्या सहारा देगा ‌”
मैं एकदम से जाने के लिए उठ गई तो वो सख्त लहजे में बोले :” मानी तुम्हारे पास और कोई रास्ता नहीं है,कल तक सोच कर बता देना। अगर हर्ष को कुछ हो गया तो उसकी कसूरवार तुम होगी।”

मैंने रास्ते भर तो अपने आप पर नियंत्रण रखा लेकिन घर पहुंच कर जोर जोर से रोना शुरू कर दिया। कुंती आंटी ने जब सारी बातें सुनी तो गुस्से में बोली :” निगोड़े की जुबान में कीड़े नहीं पड़ गए बेटी की उम्र की लड़की से शादी करना चाहता है। जब समय खराब आता हैं सब स्थिति का लाभ उठाने की कोशिश करते हैं।”

दो चार निवाले किसी तरह गले से उतारे और सोने के लिए लेट गई। नींद नहीं आ रही थी और बत्ती चली गई। खिड़की से बाहर झांका तो एक बंदा खंबे से उतरता दिखाई दिया और दो सामने सड़क के पार एक गाड़ी के आगे खड़े थे। उज्यंत खन्ना आखिर क्या चाहता है ,क्यों इतना परेशान कर रहा है डरा रहा है।डर के कारण मैं सारी रात सो नहीं सकीं।अगर उन लोगों ने रात को घर में घुसने की कोशिश की तो हम क्या करेंगे।

सुबह तक मैं बहुत नर्वस हो चुकी थी,बस एक ही बात दिमाग में घूम रही थी कि सीधे उज्यंत खन्ना से बात करती हूं कि वह क्या चाहता है,क्यों पीछे पड़ा है? सब तो खत्म हो गया है बस यह मकान बचा है वह भी ले ले , डैड का इलाज करवा दे उन्हें लेकर दूसरे शहर चली जाऊंगी। इतना बड़ा आदमी है अच्छी उम्र का होगा,शायद मेरी कम उम्र देख कर पसीज़ जाए। कुंती आंटी को बस यह बोलकर कि मैं थोड़ी देर में आती हूं, मैं उज्यंत के घर पहुंच गई। बहुत ही बड़ा और आलीशान बंगला था,गार्ड ने तुरंत मुझे अंदर बैठक में ले जाकर बिठा दिया। जैसे जैसे समय बीत रहा था मेरी घबराहट बढ़ रही थी , मैं पसीना पसीना हो रही थी। मुझे लग रहा था कहीं मुझे नर्वसनेस का अटैक न पड़ जाए। मॉम के जाने के बाद मैं इतनी अकेली और दुखी रहने लगी थी कि मैं डिप्रेशन में चली गई थी। तब कुंती आंटी ने मुझे संभाला था,घर की सारी व्यवस्था, नौकरों को निर्देश देना, सामान की फेहरिस्त तैयार करना सब मुझसे करवाती थी। घर में तीज़ त्यौहार की छोटी सी पार्टियां डैड से कहकर जबरदस्ती रखवाती जैसे मॉम आयोजित करतीं थीं। इससे डैड अपने काम से थोड़ा अवकाश लेते और मुझे व्यस्त रखने का साधन मिल जाता। धीरे धीरे मैं अपने दुख से तो उबर गईं लेकिन अभी भी मैं जब  ज्यादा नर्वस होती हूं तो हकलाने लग जाती हूं और अपनी बात ठीक से नहीं कह पातीं हूं।

मुझे लग रहा था मैं दनदनाती हुई यहां आ तो गई हूं लेकिन उज्यंत जैसे अनजान और बुजुर्ग आदमी के सामने अपनी बात कैसे रख  पाऊंगी।
दस मिनट भी नहीं बीते होंगे लगा जैसे दस घंटे से बैठी हूं। मेरे सामने एक मजबूत कद-काठी वाला अट्ठाइस तीस साल का बंदा आकर खड़ा हो गया। लगता है उज्यंत खन्ना घर में नहीं है इसलिए उसका बेटा आया है। वो मुझे ऐसे घूर रहा था मानो मेरे शरीर में छेद कर देगा , उसके नयन नक्श में जरा सी भी कोमलता नहीं थी, वह रफ-टफ टाइप का बंदा था। मेरी तो उसको देखकर आवाज हलक में अटक गई, मैं ने अटक अटक कर कहा :” मैं . .. मुझे मिस्टर उज्यंत खन्ना जी से मिलना है”
उसने बिना पलक झपकाए कहा:” मैं ही उज्यंत खन्ना हूं ।” उसकी आवाज बहुत भारी थी सुनकर मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई।
मैं :” मैं मैं मानसी मल्हो….  वह बीच में टोकता हुआ बोला  ,” जानता हूं, यहां क्यों आई हो? तुम्हारे पिता से मेरा हिसाब पूरा हो गया है,अब मुझे तुमसे और तुम्हारे पिता से कोई लेना-देना नहीं है।”

मेरा डर गया तेल लेने, इतना भी धैर्य नहीं कि सामने वाले को अपनी बात कहने दें। और अगर लेना देना नहीं था तो डैड पर हमला क्यों करवाया और कल रात गुंडे क्यों भेजें, बिजली क्यों कटवायी ‌। मैं तन कर उसके सामने खड़ी हो गई, गुस्से से मेरी धड़कन तेज हो गई थी , चेहरे की नसें तन गई थी।
मैं :” जब हिसाब पूरा हो गया था तो अब क्यों पीछे पड़े हो ,क्या चाहते हो?”
उज्यंत :” मैं हर्ष मल्होत्रा की शक्ल भी नहीं देखना चाहता हूं नाही उसकी बिगड़ैल लड़की की जिसकी ख्वाइशें पूरी करने के चक्कर में उसने दूसरों का पैसा मारा।”

उसकी आंखों में मेरे लिए नफरत थी, अभी तक डैड ने क्या सचमुच धोखा दिया है इस बारे में मैंने कोई विचार नहीं किया था। मैं बस  उनके इलाज की चिंता में घुली जा रही थी। मैं ने तो डैड से कभी भी इतने महंगे कपड़े या विदेश जाने की इच्छा नहीं जताई थी ना ही होस्टल में रह कर इतने महंगे कालेज में पढ़ना चाहती थी। मैं तो बल्की चाहती थी वो काम का बोझ कम करके मेरे साथ अधिक समय बिताए ।‌कुछ समझ नहीं आ रहा था क्या से क्या हो गया था। मुझे खामोश खड़ा देख वह ताने मारता हुआ बोला ,” क्यों सच्चाई सुनकर राजकुमारी जी की जुबान पर लकवा मार गया।”
कितना बदतमीज इंसान हैं क्यों मुझे जलील कर रहा है , जबकि वह मेरे बारे में कुछ जानता भी नहीं है।
मैं ने उसकी तरफ हिकारत भरी नजरों से देखते हुए कहा :” आप जैसे नीच आदमी से बहस करके मैं अपनी जुबान गन्दी नहीं करना चाहती। शर्म तो आपको आनी चाहिए इतनी उम्र के निहत्थे लाचार आदमी पर हमला करवाया और रात भर मेरे घर के बाहर गुंडे खड़े किए।”
उसके चेहरे पर आश्चर्य का भाव था , मैं ने मन ही मन सोचा ,देखा अब चोरी पकड़ी गई तो आश्चर्य चकित होने का नाटक कर रहा है, सोचा भी नहीं होगा मैं सीधे उसके मुंह पर इल्ज़ाम लगाऊंगी।

मैं :” मैं ये सब बातें भुलाने को तैयार हूं,आप बस मेरे डैड का किसी अच्छे अस्पताल में इलाज करवाने का इंतजाम कर दें।”
वह कुछ सोचते हुए बोला ,” मैं तुम्हारे पिता का इलाज करवा सकता हूं लेकिन बदले में तुम्हें मेरे घर की व्यवस्था संभालनी होगी। जितने दिन वो अस्पताल में रहेंगे तुम यहां रहकर मेरी नौकरी करोगी।”

हे भगवान! यह आदमी कितना नीच हो सकता है , मैं सोच भी नहीं सकती। वो केवल मुझे बेइज्जत करने के तरीके ढूंढ रहा है, यहां रात दिन नौकरी पर रखकर मुझे ताने मारकर छलनी करना चाहता है। लेकिन मेरे पास विकल्प ही क्या है,या तो अभिरथ से शादी करके सारी जिंदगी दांव पर लगा दूं या यहां रहकर तीन चार महीने इसके ताने सुनती रहूं। अगर इसने कोई अश्लील हरकत की या मेरे अकेलेपन का फायदा उठाने की कोशिश की तो मैं क्या करूंगी। कुछ समझ नहीं आ रहा था क्या करूं, दोनों ही स्थिती में मेरी इज्ज़त दांव पर लगी थी ‌। मैं ने जब आंखें उठा कर उज्यंत का चेहरा देखा तो वह मुझे बेसब्री से ताक रहा था मेरे उत्तर के इंतजार में। उसकी आंखों में अभिरथ वाला वहशीपन नहीं था। मेरे दिल को लगा मैं शायद इस अजनबी के साथ अधिक सुरक्षित रहुंगी,बस कानों में थोड़ा उंगली डाल कर रहना होगा।

उज्यंत सूखी हंसी हंसते हुए बोला :” लगता है मल्लिका की काम करने के नाम पर जान सूख रहीं हैं,प्रिय डैडी के राज में तो एक गिलास पानी भी उठा कर नहीं पिया होगा।” डरपोक इंसान को इतना गुस्सा दिला दो कि वह ज्वालामुखी की तरह फट जाएं,अगर मैं इस समय इतनी बेबस नहीं होती तो आज उसका मुंह तोड देती। इस बेवकूफ को क्या पता कुंती आंटी ने दो साल मुझसे कितना काम करवाया था केवल व्यस्त रखने के लिए , खाली बैठती थी तो न जाने क्या क्या सोचने लगती थी। कईं बार मैं उन से लड़ पड़ती थी लेकिन फिर उनका प्रेम और चिंता देखकर चुपचाप जैसा कहती थी करती जाती थी। मैं फिर अकड़ कर अपनी पांच फुट दो इंच की लंबाई को और खींचते हुए उससे कड़क आवाज में बोली,” मुझे मंजूर है लेकिन आपको वादा करना होगा कि आप मेरे साथ कोई ओछी हरकत नहीं करेंगे।”

वह ठहाका मारकर ऐसे हंसा, जैसे मैंने कोई चुटकुला सुना दिया हों। फिर चिढ़ भरी आवाज में बोला :” तुम अपने आप को इतना सुन्दर समझती हों कि सोचती हो हर किसी के पास तुम्हें छेड़ने के अलावा और कोई काम नहीं है। अरे मैडम दुनिया में सब काम करते हैं दो वक्त की रोटी खाने के लिए, तुम्हारे डैड की तरह धोखा देकर नहीं कमाते और ना ही तुम्हारी तरह हर कोई बाप के पैसे पर गुलछर्रे उड़ाता है।”
हे भगवान! क्या इसी तरह ताने मारकर यह मेरा दिल छलनी करता रहेगा।अब मेरी आंखों में आंसू आ गए थे, मैं ने अपनी पलकें झुका कर चेहरा नीचे कर लिया , उसे इस जीत की खुशी नहीं देना चाहती थी कि वह अपनी जली कटी बातों से मुझे आहत करने में कामयाब हो गया था।

इससे पहले मुझे जीवन में प्यार और सुरक्षा मिली थी लेकिन दो दिन में मैं ने लोगों का असली रूप देख लिया था। कुछ पल शांत रहने के बाद वह संयत स्वर में बोला :” ड्राईवर और मिस्टर कासलीवाल को अपने साथ ले जाओ। वे तुम्हारी हर्ष मल्होत्रा को दूसरे अस्पताल में स्थानांतरित करने में मदद कर देंगे। फिर अपना सामान लेकर यहां आ जाना । हफ़्ते में एक बार आधे दिन के लिए अपने पिता से मिलने  जा सकती हो और बिना बताए इस घर से बाहर कदम रखा तो हमारी डील समाप्त।”
शाम को जब मैं सारा काम निपटा कर लौटी तो आठ बज रहे थे।

थकान के कारण मेरा बुरा हाल था , रामदीन ने जब मेरा सामान एक सुंदर से गेस्टरूम में रखा तो मेरी आंखें फटी रह गई। मुझे तो लगा था कोई दुछत्ती या स्टोर रूम मिलेगा रहने को ,हो सकता है उज्यंत को पता भी न हो उसका स्टाफ मुझे कहां ठहरा रहा है। जब चिल्लायेगा तब देखूंगी, अभी तो स्नान करके तरोताजा हो जाती हूं।नहाकर कमरे में आई तो रामदीन बोला,” खाना लग गया है आप डाइनिंग रूम में आ जाइए।” लगता है स्टाफ को पता नहीं है मैं किस हैसियत से इस घर में रहने आई हूं। उज्यंत खाने की टेबल पर बैठा था मैं एक तरफ खड़ी हो गई,पता नहीं क्या चाहता है , खाना मैं सर्व करूं क्या? वह मुझे देखते ही बोला,” मैं ने स्टाफ को कह दिया है कि तुम मेरे किसी दोस्त की बहन हो कुछ समय के लिए यहां रहोगी। तुम टेबल पर बैठ कर खाना खा सकतीं हों, लेकिन कल से काम पर लग जाना , उसमें कोई लापरवाही नहीं होनी चाहिए। मुझे एक एक चीज का हिसाब चाहिए जो इस घर के रखरखाव में खर्च हो रहा है वो उचित है या अधिक है। कौन सा स्टाफ ठीक से काम करता है या नहीं। मुझे विस्तार से हर बात की रिपोर्ट चाहिए।”

मैं उसकी बात सुन रही थी लेकिन मेरा ध्यान खानें की ओर था, मैं ने सुबह से कुछ नहीं खाया था। जैसे ही खाना परोसा गया मैं भुक्कड़ की तरह टूट पड़ी। जब मेरा आधे से अधिक पेट भर गया तो मैं कुछ पल के लिए रूकी और एक और रोटी लेने के लिए जैसे ही नजरें उठाई वह मुझे बड़े ध्यान से  देख रहा था। हे भगवान ! यह अब एक  और ताना मारेगा, लेकिन उसने एक व्यंग्यात्मक मुस्कान डाली और अपना खाना खाने लग गया। भाड़ में जा तू और तेरे ताने मैंने प्लेट में और खाना परोसा और भरपेट भोजन किया।

मैं छः बजे का अलार्म लगा कर सोई थी लेकिन मेरी आंख साढ़े सात बजे खुली ,दो दिन की थकान और टेंशन के बाद बहुत गहरी नींद आ गई थी। बाहर आकर देखा उज्यंत तैयार था और  टेबल पर बैठा नाश्ता कर रहा था। मैं शर्म से आंखें नहीं मिला पा रही थी और उसके चेहरे पर वही टेढ़ी मुस्कान थी जैसे कह रहा हो मैं तो पहले से ही जानता था तुम्हारे बस का कुछ नहीं। वह बिना कुछ बोले तेजी से बाहर चला गया , मैं वहीं पड़ी कुर्सी पर बैठ गई और गहरी गहरी सांसें लीं। कितनी ऊर्जा भरी है इस बंदे में आसपास सब को नर्वस कर देता है।
मैं ने सारे घर को घूम कर बहुत ध्यान से देखा, बहुत खूबसूरत बना था लेकिन साज-सज्जा बेतरतीब तरीके से की गई थी। किसी दिवार पर तीन चार तस्वीरें तो कोई कमरा बिल्कुल बेरंग। दीवारों के रंग , फर्नीचर्स परदे सब बेमेल लग रहें थे। लगता है कईं सालों से इसकी साज-सज्जा पर किसी ने ध्यान नहीं दिया, साफ दिख रहा था कोई परवाह करने वाला नहीं था।

दो कमरे बंद पड़े थे , खुलवाएं तो उनमें कीमती पेंटिंग, साज-सज्जा की वस्तुएं, फर्नीचर ढक कर रखें थे ,दो तीन सालों से खोले ही नहीं थे कमरे। रसोई में भी कोई हिसाब किताब नहीं था , आवश्यकता के अनुसार सामग्री नहीं आती थी । जितना किराना शुरू से आ रहा था बस हर महीने आ जाता ,जो नहीं प्रयोग में आता इधर उधर कर दिया जाता। काम करने वाले नौकर अधिक थे , जितना काम नहीं था। इसके कारण कोई भी काम सलीके से नहीं होता था ,सब एक दूसरे पर टाल देते और मोज मस्ती में लगे रहते। उज्यंत रोज़ सुबह आठ बजे चला जाता और रात आठ बजे तक आता , खाना खाता थोड़ी देर लैपटॉप पर काम करता और सो जाता। उसे घर के रखरखाव देखने का समय नहीं था और मुझे लगता है उसे इस विषय में कुछ समझ भी नहीं होगी। तीन दिन में मैं ने घर की सारी कीमती वस्तुओं की उनकी कीमत के अनुसार फेहरिस्त बनाईं। कहां फिजूलखर्ची हो रही थी और कहां खर्चें की आवश्यकता थी ,घर में कितने काम करने वालों की आवश्यकता थी और कौन कैसा काम कर रहा था ,यह बातें मैं ने क़रीने से लिख कर उज्यंत को रात के खाने के बाद दे दी।

अगले दिन नाश्ता करने के बाद वह बोला :” जहां जैसी आवश्यकता हो बदलाव कर लेना।” उसके चेहरे पर व्यंग्यात्मक मुस्कान नहीं थी,वह सहजता से बोल कर चला गया।उसको शायद मेरे सुझाव और काम अच्छा लगा होगा,यह सोचकर मन प्रसन्न हो गया। आश्चर्य है मैं उससे प्रशंशा पाने के लिए कितनी उतावली हो रही थी। मैं ने कुंती आंटी से फोन पर बात की, वो डैड के साथ अस्पताल में रह रही थी। बात तो मैं रोजाना करती थी लेकिन आज वह बहुत प्रसन्न लग रही थी, डैड ने रिस्पोंस देना शुरू कर दिया था।

सुनकर मन कुछ हल्का हो गया, आंसू भी झलक आएं। फोन बज रहा था देखा अभीरथ अंकल का है। वो गुस्से से बोल रहे थे :” कहां हो तुम ,चार दिन से पता नहीं बिना बताए कहां चली गई तुम? हर्ष को भी अस्पताल से छुट्टी दिलवा दी। आखिर चाहती क्या हो तुम?”
मैं ने फोन पर कहा :” अंकल आप परेशान मत हो मैं ने पैसों का इंतजाम कर लिया है ।” मैं ने फोन काट दिया और बंद कर दिया। अब मैं सारे दिन घर के कामों में उलझी रहती, बेकार का बहुत सारा सामान निकाल दिया। मुझे लगा था स्टाफ मेरी दखलअंदाजी नापसंद करेगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, उन्हें उचित मार्गदर्शन अच्छा लगा। मुझे इस काम में आंनद आता है मैं ने सोच रखा था  ग्रेजुएशन के बाद दो साल का इंटीरियर डिजाइनिंग का कोर्स करूंगी।अब तो पता नहीं जिंदगी आगे और क्या क्या दिखाएगी। मैं ने घर की सारी साज-सज्जा ही बदल दी, स्टोर में बंद सामान को भी साफ करके उचित स्थान पर रखवा दिया।

उज्यंत से बस खाने की मेज पर भेंट होती और वह कुछ अधिक नहीं बोलता। लेकिन हां मुझे लगता उसकी निगाहें मुझ पर होती है और मुझे अच्छा लगता ,सुखद सा महसूस होता। जब रविवार आया तो मुझे लगा उज्यंत सारा दिन घर में ही रहेगा, मैं कैसे सामना करूंगी उसका इतनी देर। सोचकर ही अजीब लग रहा था, फिर डैड से भी मिलना था । मैं आधे दिन की छुट्टी ले कर अस्पताल चली गई।

डैड अब सब को पहचान रहे थे , मुझे देखते ही उनकी आंखों में आंसू आ गए। खाना अभी ट्यूब से दिया जा रहा था इसलिए बोल नहीं सकते थे। मैं उनके पास उनका हाथ पकड़ कर बैठी रही और इधर उधर की बातें करती रही। उनके सेहत में सुधार देख दिल को तसल्ली हुई। मन ही नही कर रहा था डैड को छोड़ कर जाने का ,जब साढ़े आठ बज गए तो उठना पड़ा। मैं सोच रही थी उज्यंत खाना खाकर अपने कमरे में चला गया होगा। लेकिन मैं ग़लत थी वह भोजन के लिए मेरे इंतजार में बैठा था। खाना खाते हुए बोला ,” तुम ने तो घर की काया ही पलट दी , बहुत सुंदर लग रहा है। तुम्हारे डैड कैसे हैं अब ?”
मैं :” धीरे धीरे उनकी सेहत में सुधार हो रहा है।”
उज्यंत :” कल मेरे कुछ विदेशी क्लाईंट्स खाने पर आएंगे। उन्हें भारतीय पारंपरिक माहौल और भोजन चाहिए। मैं चाहता हूं तुम घर में इस सब की व्यवस्था करो।”

अगले दिन मैं ने बहुत मेहनत से सारी व्यवस्था की। भारतीय भोजन तो बनवाया ही , फूलों की रांगोली और पारंम्परिक तरीके से बैठक और आंगन सजाया। स्टोर रूम में से पीतल के दिए और कुछ मूर्तियां निकाल कर इधर उधर रख दीं। आंगन में खुले में लालटेन की रोशनी में खाने की व्यवस्था की। स्वयं मॉम की हाथ के काम की सूती साड़ी पहनी। जब उज्यंत की आंखों में प्रशंसा देखी तो मन पुलकित हो गया , मेहमानों ने भी प्रशंसा करने में कोई कमी नहीं छोड़ी। उज्यंत आगे बढ़ कर सब कामों में सहयोग दें रहा था ऐसा लग रहा था मानो हम दोनों कपल्स है।
अगले दिन थकान महसूस हो रही थी और मन बहुत उदास था। पांच साल हो गए थे आज ही के दिन मॉम मुझे छोड़ कर चलीं गईं थीं। मेरे लिए इस बात को स्वीकार करना आज भी मुश्किल है कि मॉम अब कभी मुझे नहीं दिखेंगी। मैं सारे दिन बहुत अनमनी रही , डैड अस्पताल में अकेले अपनी सेहत के लिए लड़ रहे हैं, कितना अकेला महसूस कर रहें होंगे। उन्हें कुछ हो गया तो मैं तो बिल्कुल अकेली रह जाऊंगी।

रात को खाने पर उज्यंत बहुत उत्साहित था,कल की पार्टी की सफलता के कारण मेहमानों की प्रतिक्रिया और उससे प्रभावित होकर मिले लाभ की चर्चा कर रहा था। मैं बुझे मन से उसकी बातों में शामिल हो रही थी, दिन में थोड़ी देर रोई भी थी जिसके कारण सिर भारी हो गया था और आंखों में जलन हो रही थी। थोड़ी देर बाद वह भी खामोश हो गया और खाना खाकर अपने कमरे में चला गया। मेरा मन अपने कमरे में जाने का नहीं था,बंद कमरे में अकेला पन और कचोटता है। मैं थोड़ी देर के लिए बरामदे में सीढ़ियों पर बैठ गई। ठंडी हवा थी लेकिन मैं अपने दिमाग को बंद करके बैठी थी, कुछ महसूस नहीं करना चाहती थी। थोड़ी देर बाद हल्की सी गर्माहट महसूस हुई, मेरे कंधे पर शाल डालकर उज्यंत भी मेरे करीब सीढ़ियों पर बैठ गया।” क्या हुआ इतनी चुप और उदास क्यों हो? तुम्हारे डैड तो ठीक है न वैसे मैं ने सुबह ही डाक्टर से बात की थी।”उसके स्वर में अब उलाहना नहीं होती है बल्कि कोमलता होती है, जिसके कारण मेरे आंसू निकल पड़े। उसने हौले से मेरा सिर अपने कंधों पर टिका दिया और मुझे अपनी बाहों के घेरे में ले लिया।

मैं ने बस इतना कहा :” मॉम की बहुत याद आ रही हैं।” हम काफी देर बिना कुछ बोले ऐसे ही बैठे रहे , मुझे उसकी नजदिकियां बहुत सुकून दे रही थी। जब रात गहरी हो गई तो हम दोनों अपने अपने कमरों में सोने चले गए।
अगले दिन मैं तैयार हो रही थी कि उज्यंत के चिल्लाने की आवाज आई। बाहर गईं तो उज्यंत तौलिया लपेटे रामदीन पर चिल्ला रहा था। मैं अवाक उसके मांसपेशियों से मजबूत शरीर को देखती रह गई , मेरा मुंह खुला था , मैं आंखें झपकाना तक भूल गई थी। मुझे इस तरह घूरते देख वह मुझ पर गुर्राया :” ऐसे क्या देख रही हो ,क्या तौलिया लपेट कर नहीं घूम सकता कोई?”

मैं घबरा कर बोली :” नहीं जी आपका घर है आप जो चाहें लपेट कर घूम सकते हैं।” और मैं भागकर अपने कमरे में घुस गई।
रात को जब उसके करीब बैठी थी तो लगा था हमारी दिल की धड़कनें एक हो गई है। लेकिन इस समय ऐसा लगा जैसे मेरा तन एक चुम्बकीय आकर्षण से उसकी ओर खींचा जा रहा था। एक एक पोर मेरे शरीर का सजग और सचेत हो गया था। अगर वह चिल्लाता नहीं तो मैं शायद उससे लिपट ही जाती। मैं कमरे से बाहर उसके जाने के बाद ही निकली।
रामदीन से पूछा कि वह क्यों गुस्सा हो रहा था ।

उसने बताया उज्यंत को जब अपने मनपसंद कपड़े नहीं दिखते तो वह ऐसे ही शोर मचाता है , उसने दो दिन पहले ही कपड़े धोने डालें थें। अभी तक मैं उसके कमरे में नहीं गईं थीं , मैं ने निश्चय किया उसका कमरा ठीक करूंगी। मैं उसके बारे में जानना चाहती थी , उसकी वस्तुएं देखना चाहती थी।

एक बहुत बड़े कोलाज पर उसकी खतरनाक खेलों, पहाड़ों और समुद्र पर खींची तस्वीरें लगी हुई थी। मैं और वह एक दूसरे के बिल्कुल विपरीत स्वभाव के हैं , मुझे इन तस्वीरों को देखकर ही चक्कर आ रहे हैं और इसे इन रोमांचित खेलों में कितना आनन्द आता है। एक दो फोटो में लगता है वह अपने परिवार के साथ है । उसके परिवार के बारे में जानने की उत्सुकता मुझे बगीचे में ले आईं। माली ही एक ऐसा इंसान हैं इस घर में जो बिना निर्देशों के अपना काम पूरी मेहनत और ईमानदारी से करता है। बुजुर्ग है पूछने पर उसने बताया वह इस परिवार के साथ पिछले बीस साल से हैं।

उसने बताया :” पहले छोटा सा घर था , फिर साहिब ने कारोबार में अच्छी तरक्की कर ली और यह आलीशान बंगला बनावाया। साहिब और मेम साहिब में शुरू से कम बनती थी लेकिन समय के साथ दोनों में झगड़े बढ़ते चले गए। भईया जी और दीदी जी स्कूल की पढ़ाई खत्म करके आगे पढ़ने विदेश चले गए। चार साल पहले जब साहिब को दिल का दौरा पड़ा तब भईया जी यहां आएं और धीरे धीरे सारा कारोबार संभाल लिया। साहिब अपने पुश्तैनी घर में रहने लगे उन्हें वहां की आबोहवा माफिक आतीं हैं। मैम साहिब दीदी जी के साथ विदेश रहती है जब पढ़ाई पूरी हो जाएगी तब दोनों आएंगी। ” उज्यंत की एक छोटी बहन है जो उससे पांच साल छोटी है।

मैं सारा दिन उसके कमरे में उसकी व्यक्तिगत वस्तुओं को छूकर उसकी निकटता का अहसास करती रही । एक मदहोश करने वाली अनुभूति महसूस हो रही थी। शाम तक बैचेनी बढ़ गई थी, छः ही बजें थे और मुझे लग रहा था वह क्यों नहीं आया अब तक। कुछ अलग अंदाज में तैयार हो कर मैं बगीचे में टहलने लगी। शायद उज्यंत भी कुछ महसूस कर रहा होगा तभी एक घंटे पहले आ गया। मेरे साथ बगीचे में टहलने लगा और इधर उधर की बातें करने लगा। मैं उसकी बातों और नजदीकियों के अहसास में डूब रही थी और उसने पूछा ,” तुम्हारा कोई बायफ्रेंड नहीं है जो तुम्हें मिस कर रहा होगा , तुम इतने दिन से यहां रह रही हों। अखिल को मैंने कभी भी दोस्त से अधिक कुछ नहीं माना समझा था वह भले ही कुछ भी कहता हों, इसलिए मैं ने बेझिझक कहा ” नहीं ऐसा कुछ नहीं है  ।” दस मिनट भी नहीं बीते होंगे कि गेट पर शोर सुनकर हम वहां पहुंचे। अखिल गार्ड से अंदर आने के लिए लड़ रहा था मुझे देखते ही  उत्साहित होकर बोला :” मानसी , इसको बोल ना मैं तुझे जानता हूं और तुझसे मिलने आया हूं।”

हे भगवान ! यह यहां क्या करने आया है? दो तीन दिन पहले इसका फोन आया था , मेरी सहायता करने में असमर्थ रहा था बड़ा अफसोस जता रहा था । बार बार माफी मांग रहा था। बहुत चिंतित हो रहा था मेरी सुरक्षा को लेकर तो मैंने उसे बता दिया था कि मैं उज्यंत खन्ना के घर में सुरक्षित हूं। मुझे क्या पता था यह यहां चला आएगा। वह अंदर आते हुए बोला ,” मैं दो बार पहले भी आया था लेकिन गार्ड ने तुझ से मिलने नहीं दिया। तू चल मेरे घर चल ,अब वहीं रहना। मैं अपनी मम्मी को समझाऊंगा ,वो अवश्य मान जाएंगी।”

मैं :” तुम अभी जाओ , तुम्हारी सहायता की अब कोई आवश्यकता नहीं है।”
मैं ने उज्यंत की तरफ देखा तो उसके चेहरे पर असमंजस के भाव थे, उसने मुझसे पूछा,” यह कौन है?”
इससे पहले मैं कुछ कह पातीं अखिल बंदरों की तरह बीच में उछल पड़ा ” मैं मानसी का बायफ्रेंड हूं और इसे लेने आया हूं। ”
उज्यंत के चेहरे के भाव बदलने में दस सेकेंड नहीं लगें,सारी कोमलता छूमंतर हो गई। गुस्से से तनी आंखों में क्रूरता और नफ़रत थी। ” दस मिनट पहले तुम्हारा कोई बायफ्रेंड नहीं था , धोखेबाज आदमी की औलाद को धोखा ही देना आता है।” और वह पैर पटकते हुए अंदर चला गया।

अखिल बत्तीसी दिखा रहा था” यह इतना गुस्सा क्यों हो रहा था ,चल छोड़ उसे तू मेरे साथ चल।” और मेरा हाथ पकड़ कर खींच ने लगा।
मैं ने गुस्से से उसका हाथ झटका और कहा:” तूने अपनी मम्मी से बात की नहीं और मुझे लेने आ गया।जब तुझसे सहायता मांगने आईं थीं तब तो तुझ से कुछ बोला नहीं गया। अब अगर तेरी मम्मी नहीं मानी तो क्या करेंगे?”
वह खिसयानी हंसी के साथ बोला :” तुझे फिर यहीं छोड़ जाऊंगा।”
समझ नहीं आ रहा था अपने बाल नोचूं या इस बेवकूफ का मुंह तोड दूं।
मैं ने उससे गुस्से से कहा :” तुझमें क्या बिल्कुल अक्ल नाम की कोई चीज नहीं है? मैं अपने तरीके से अपनी परेशानी का हल निकाल रही हूं और तू काम बिगाड़ने के अलावा कुछ मत कर। आज के बाद तूने किसी से कहा न कि तू मेरा बायफ्रेंड है तो तुझे इतना मारूंगी की अपना नाम भी भूल जायेगा। निकल यहां से।”

मैं अपने कमरे में चली गई, मैं ने खाना भी नहीं खाया। अपने आप पर बहुत गुस्सा आ रहा था। मैं कितनी गधी हूं, अच्छी तरह जानती थी उज्यंत मुझसे कितनी नफरत करता है , जलील करने के लिए घर में जगह दी और मैं उसके प्रेम में अंधी होती जा रही थी। अपने पिता की ऐसी हालत करने वाले से मैं दिल जोड़ने जा रही थी।एक बार नहीं सोचा इन सब के पीछे उसकी मंशा क्या है। डैड के इलाज पर रोज का तीस पैंतीस हजार रुपए का खर्चा आ रहा है,तो इसका मतलब मेरे यहां नौकरी करने के प्रति दिन वह मुझे इतना पैसा दे रहा है। मैं कोई ऐसा महान कार्य नहीं कर रही हूं, कोई भी पन्द्रह बीस हजार रुपए महीने में कर सकता है। उसकी आंखों में वही घृणा थी जो पहले दिन नजर आईं थीं। कमजोरी के किसी क्षण वह मुस्कुरा दिया और मैंने सपनों का महल खड़ा कर लिया। वह इतना एहसान तले दबा देगा कि फिर स्थिती का लाभ उठाएंगा, बूरी तरह जलील करेगा।

मैं ने रात को खाना नहीं खाया और सुबह भी बाहर नहीं निकली लेकिन वह एक बार भी बोलने नहीं आया।मेरा मन बहुत दुखी था  अब किसी भी रिश्ते पर विश्वास नहीं रहा था । हर कोई स्वार्थी और धोखेबाज नज़र आ रहा था। उज्यंत के मन में जरा सी भी भावना होती तो मुझे बोलने का मौका तो देता ,बाद में ही आ कर पूछ लेता हकीकत क्या है। बस अपने आप ही निष्कर्ष निकाल लिया। एक यह अखिल ऐसे बेवकूफ इंसान की दोस्ती नुकसान ही देती हैं और अभीरथ अंकल कितनी घटिया इंसान निकले । मुझे हिम्मत से काम लेना होगा और जो कुछ करना है स्वयं ही करना होगा।

मैं ने मन पक्का किया, तैयार हुई, और अपना सामान बांध लिया। टैक्सी बुलाकर चुपचाप अपने घर चली गई। उज्यंत से अब मेरा कोई वास्ता नहीं रहा, हमारे बीच की डील भी समाप्त। बिना सामान और बिजली के घर भी बेगाना सा लग रहा था, चारों तरफ धूल मिट्टी,लग ही नहीं रहा था बचपन से यहां रहती आईं हूं। सारा घर घूम लिया कोई कोना अपना सा नहीं लग रहा था।बस डैड के आफिस में नहीं गईं, ताला लगा था।इसकी चाबी कुंती आंटी के पास नहीं थी लेकिन मेरे गुच्छे में थी। मैं खोल कर अंदर गई तो एकदम से रोना आ गया। कितना समय डैड इस कुर्सी पर बैठे काम करते रहते थे और जब मुझे अकेले डर लगता था तो यहीं किताबें लाकर अपनी पढ़ाई करने लगती थी।

मैं ने डैड के कागजात देखें तो मुझे एक वकील का नंबर मिला। मैं ने फोन पर बात की तो उन्होंने बताया कि आज कल डैड का सब काम वो ही देखते हैं। मैं ने उन्हें सारी बातें बतायीं तो उन्होंने आश्वासन दिया कि वो मेरी हर संभव सहायता करेंगे। निश्चिंत होकर मैं अस्पताल जाने के लिए घर से निकली तो सामने से अभिरथ अंकल आते दिखाई दिये ।अस्त व्यस्त लड़खड़ाते हुए आ रहें थे , लगता है नशें में है पीने के लिए रात का भी इंतजार नहीं करते। मुझे देखते ही मेरे क़दमों में बैठ गये और रोने लगे। ” कहां गायब हो गई थी , ढूंढ ढूंढ कर पागल हो गया हूं, सुहासिनी अब तुम्हारे बिना नहीं जिंदा रह सकता मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं। ” मैं आश्चर्य से अंकल को देख रही थी वो मुझे मेरी मॉम समझ रहे थे।
” मैं तुम्हें रानी बना कर रखता लेकिन तुमने हर्ष से शादी क्यों की? मैं तुम्हें देख देख कर जी रहा था लेकिन तुम फिर गायब हो गई। तुम्हें पाने के लिए मैंने हर्ष की गाड़ी का ब्रेक फेल किया और तुम ही उस गाड़ी में बैठ गई। तुमने मुझे दुबारा धोखा दिया हर्ष को मरना चाहिए था।वह तुम्हारे लायक नहीं था तुम्हारी सुरक्षा भी नहीं कर सकता था। तुम कहां चली गई मैं ने तुम्हें हर जगह तलाशा। ” अभिरथ जोर जोर से रोने लगे। मैं दहशत से उनकी तरफ देख रही थी कि वो क्या बोल रहे हैं इसका मतलब मां की मृत्यु के लिए वो जिम्मेदार है।

मैं ने उन्हें झकझोरते हुए कहा :” आप क्या कह रहे हैं, आपको पता भी है? आपने मेरी मॉम को मारा है ।” वो जैसे होश में आएं हो, मुझे ध्यान से देखते हुए बोले,” मानी तुम, तुम कब आयी ,उस दिन जन्मदिन पर तुम बिल्कुल सुहासिनी लग रही थी, एकदम फरिश्ता सी। मैं बस तुम्हें देखता ही रह गया और सोचा अगर सुहासिनी नहीं , तो तुम मेरी बन कर रहोगी। लेकिन फिर हर्ष ने न जाने  तुम्हें कहां छुपा दिया, मैं ने उससे कितनी बार पूछा उसने नहीं बताया।वह बहुत बुरा इंसान हैं, हमेशा मेरे प्यार के बीच में आ जाता है। मैं ने उसके व्यापार में भी घोटाले किए,उसके मशीनें भी गायब करवा दी लेकिन उसने तुम्हें नहीं बुलवाया।” वो फिर रोने लगें,”तुम्हारी याद में पागल हो गया हूं, सुहासिनी क्यों चली गई मुझे छोड़ कर?” वो फिर आसमान की तरफ देख कर बोली रहें थे।

मैं :” जब डैड ने मुझे नहीं बुलाया तो आपने क्या किया?”
वो अपनी ही दुनिया में खोए हुए थे बोले :” मैं ने हर्ष को गुंडों से पिटवाया, उसके मरने पर तो तुम दुनिया के किसी भी कोने से अवश्य आती। और देखो तुम आयी ना,मानी अब तुम मेरी हो केवल मेरी।” उनकी आंखों में पागल पन झलक रहा था,वो अजीब तरीके से हंस रहे थे और उन्होंने मेरा हाथ कस कर पकड़ लिया।

अब तुम मेरे घर में  बंद रहोगी सुहासिनी , कहीं नहीं जाओगी, फिर गायब हो गई तो मैं तुम्हें कहां से लाऊंगा। मेरी प्यारी सुहासिनी मेरी आंखों के सामने रहेगी हमेशा।” उन्होंने मेरा हाथ इतनी जोर से पकड़ रखा था कि लग रहा था हड्डियों का चूरा हो जाएगा।
मुझे डर लग रहा था फिर भी अपनी आवाज को नियंत्रित करके बोली :” अंकल आप ग़लत समझ रहे हैं , मैं सुहासिनी नहीं मानसी हूं।” लेकिन वह अपनी धुन में बढ़े जा रहे थे ,अब मुझे अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता होने लगी थी।
तभी सामने से पुलिस आती दिखाई दी और उनके पीछे उज्यंत । पुलिस आफिसर ने जब अभिरथ से कहा :”आपको गिरफ्तार किया जाता है,हर्ष मल्होत्रा ने आपके खिलाफ रिपोर्ट लिखवाई है कि आपने उन पर जानलेवा हमला करवाया था और उनके साथ व्यापार में जालसाजी की है।”

अभिरथ अभी भी मेरा हाथ पकड़े हुए था और बोला :” यह सब झूठ है, मैं ने जो कुछ किया सुहासिनी की सुरक्षा के लिए किया,हर्ष को सज़ा देने के लिए…।” जैसे ही पुलिस ने उसके हाथ से मेरा हाथ छुड़ाया वह विलाप करने लगा ” नहीं मेरी सुहासिनी मुझे दे दो , मैं मर जाऊंगा उसके बिना …।”
हे भगवान! प्रेम का यह कैसा रूप , मेरी तो रुह कांप गयी अभिरथ की हालत देखकर। मुझे लगा मेरे अंदर ताकत नहीं बची है मैं वहीं गिरने ही वाली थी कि उज्यंत ने लपक कर मुझे बांहों में उठा लिया। डैड ने रिपोर्ट लिखवाई है इसका मतलब है वो अब बिल्कुल ठीक हो रहें हैं,दूसरा वो बेकसूर हैं। उन्होंने किसी को धोखा नहीं दिया , मुझे बड़ी सांत्वना मिली। मैं ने उज्यंत की तरफ गुस्से से देखते हुए कहा :” मेरे डैड ने आपको धोखा नहीं…।” वो मेरी बात बीच में काटते हुए बोला :” मुझे मालूम है,जब रामदीन ने फोन करके बताया तुम समान लेकर बिना बताए चली गई हों तो मैं तुरंत अस्पताल पहुंचा। वहां हर्ष अंकल पुलिस को अपना बयान लिखवा रहे थे। उन्हें तुम्हारी सुरक्षा की चिंता हो रही थी इसलिए पुलिस के साथ मैं तुम्हें ढूंढते हुए यहां घर तक आ गया। ”

मुझे उज्यंत के इतने करीब उसकी बाहों में बहुत अच्छा लग रहा था लेकिन उसको क्यों बताऊं। मैं ने तुनक कर कहा:” मुझे नीचे उतारो और यहां से जाओं। आप मुझे जितना उलटा सीधा बोल सकते थे बोल दिया,अब हमें एक दूसरे को बर्दाश्त करने की आवश्यकता नहीं है। ”
उज्यंत : ” मैं अपने व्यवहार के लिए तुमसे माफी मांगता हूं। ” कहते हुए उसने मुझे आहिस्ता से वहीं बगीचे में पड़ी बेंच पर बिठा दिया। फिर बोला :” मैं तुम से अपने दिल की बात करना चाहता हूं। ” मेरी बाईं तरफ बैठते हुए उसने मेरा बायां हाथ अपने हाथ में ले लिया और मेरी तरफ मुड़कर बोलता रहा :” मैं ने तुम्हें तुम्हारे जन्मदिन पर देखा था तभी प्यार हो गया था, पार्टी में शामिल नहीं हुआ था ।हर्ष अंकल नहीं चाहते थे अभिरथ को मेरे बारे में पता चले ।

बाद में जो गलतफहमी हुई मैं ने निश्चय कर लिया था मल्होत्रा परिवार से कोई मतलब नहीं रखूंगा। लेकिन उस दिन जब तुमने इल्ज़ाम लगाया कि हर्ष अंकल पर मैं ने हमला करवाया और रात भर तुम पर नजर रखवाईं तो मुझे तुम्हारी सुरक्षा की चिंता हो गई। न चाहते हुए भी नौकरी का बहाना बना कर तुम्हें अपने घर में रखा जिससे तुम मेरी नज़रों के सामने रहो। तुम मेरे दिलो-दिमाग पर छाती जा रही थी और मैं एक बार फिर तुमसे मुहब्बत करने लगा।” मेरा तन मन पिघलता जा रहा था लेकिन मैं फिर भी गुस्से का अभिनय करते हुए सीध में देख रही थी। उसने दूसरे हाथ से मेरा चेहरा अपनी तरफ मोड़ा और मेरी आंखों में देखते हुए अपना मुंह आगे बढ़ाने लगा। मैं घबरा कर बोली :” यह क्या करने की सोच रहे हो , मैं ने अभी हां नहीं किया है ?” उज्यंत हल्की सी झुंझलाहट के साथ बोला:” अब इसमें हां या ना वाली क्या बात है ,सब बातें साफ तो हो गई है। उस दिन जब मैं तौलिया लपेट कर घूम रहा था तब तो मुझसे लिपट ने लिए इतना आतुर हो रही थी।” हे भगवान! कुछ भी बोलता है, मैं शर्म से लाल हो गई और उसने अपने होंठ मेरे होंठो पर रख दिए। यह बंदा तो राकेट की गति से काम करता है अगर मैं इसके सामने सोचती रह जाऊंगी तो यह तो पता नहीं कहां से कहां निकल जाएगा।इस पल को महसूस करने के अलावा मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। मैं ने भी अपनी बाहें उसके गले में डाल दी और उसको अपने और नजदीक खींच लिया।

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