अनोखा अहसास

Anokha Ahasaas

अनुभा तेज कदमों से लगभग  भागते हुए प्रिंसिपल महोदया के कक्ष की ओर जा रही थी। संदेश तो आधे घंटे पहले मिल गया था , गिरिजा मैडम ने याद फ़रमाया है लेकिन अभिभावकों से घिरी वह एक दम सब कुछ छोड़कर कैसे आ जाती। वह आना भी नहीं चाहती थी , जानती थी फिर सोनल को लेकर कोई शिकायत होगी।दो साल से स्थिति बद से बद्तर होती जा रही थी लग रहा था सब कुछ बिखर रहा है, जिंदगी हाथ से फिसल रही हैं। वह शारीरिक से अधिक मानसिक थकान महसूस कर रही थी,मन नहीं कर रहा था अंदर जाकर गिरिजा की झूठी सहानुभूति से लिपटी पुत्री की शिकायत सुने। जब देखो तब सोनल की शिक्षिकाओं को भी उससे कोई न कोई शिकवा अवश्य रहता था।वह स्वयं इसी स्कूल में शिक्षिका थी इसलिए कोई सीधे तौर पर नही बोलता था लेकिन सांकेतिक भाषा में जता देते थे सोनम कितनी बदतमीज और लापरवाह लड़की है।

परीक्षा परिणाम घोषित हुए थे,हो सकता है सोनल के अंक कम आएं होंगे इसलिए उसे व्यक्तिगत तौर पर आगे के लिए सचेत करने को बुलाया हो। मन पक्का करके कक्ष में दाखिल हुईं तो देखा गिरिजा अकेली बैठी काम में व्यस्त थी। अनुभा ने हल्का सा सिर हिलाकर अभिवादन किया और एक तरफ पड़े सोफे पर बैठ गई। गिरिजा तुरंत अपना काम छोड़कर कुछ कागज पकड़े उसके पास सोफे पर आकर बैठ गई। बड़े गंभीर स्वर में बोली :”देख अनुभा इस बार तो सोनल ने हद ही कर दी क्या हो गया है इस बच्ची को । मुझे नहीं लगता था पढ़ने में इतनी कमजोर होगी की इस बार फेल ही हो गई।”अनुभा को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ,सोनल तो पढ़ने में हमेशा अव्वल आती थी,इस बार फेल कैसे हो गई। बहुत असहाय महसूस कर रही थी अचानक आंसुओं का सैलाब फुट पड़ा। अनुभा को रोते देख गिरिजा उसके करीब खिसकते हुए बड़े प्रेम से बोली:”अरे रोती क्यों है,सोनल अभी बच्ची है इस साल मेहनत करेगी,सब ठीक हो जाएगा। लेकिन असल मुद्दा यह कि तेरे घर में जो स्थिती है वह सोनल की मानसिक स्थिति के लिए ठीक नहीं है, तुझे स्थान परिवर्तन की आवश्यकता है।”

अनुभा के कान खड़े हो गए वह जानती थी गिरिजा उसके काम में कभी भी कोई गलती नहीं निकाल सकती ।वह प्रत्येक कार्य को बहुत ध्यान और लगन से करती थी, शिकायत का कोई मौका नहीं देती थी।

गिरिजा अनुभा की बड़ी बहन मोनिका के साथ पढ़ती थी , अध्ययन में कम रुचि होने के कारण कक्षा में कमजोर छात्राओं में से एक थी। अक्सर परीक्षा के निकट आने पर मोनिका और उनके अध्यापक पिता से सहायता लेने वह घर आती थी । वैसे तो पैसे का बहुत घमंड था , सीधे मुंह किसी से बात नहीं करती थी लेकिन आवश्यकता पड़ने पर चाशनी घोलकर बातें करना उसको आता था। इस एहसान तले दबें होने के कारण जब अनुभा को  आवश्यकता पड़ी तो मन न होते हुए भी गिरिजा ने अपने स्कूल में अनुभा को अध्यापिका की नौकरी दीं। गिरिजा आगे कहा रही थी:”देख जब तक सोनल तेरी सास के प्रभाव में रहेगी ,वह सही ग़लत में अंतर नहीं कर पाएंगी। उसके बिगड़ने की संभावना प्रबल रहेगी। ”

अनुभा स्वयं यही महसूस कर रही थी लेकिन सोनल को लेकर वह जाएं कहां। माता-पिता को गुज़रे कईं साल हो गए थे,भाई भाभी के पास कोई ठिकाना नहीं था उसके रहने का। गिरिजा की बात अभी खत्म नहीं हुई थी:”तू तो जानती है मेरे चाचा जी का सुहाना गढ़ में कितना बड़ा बोर्डिंग स्कूल है। ऐसा कर तू वहीं रहने चली जा और सोनल को दाखिला भी वही मिल जाएगा।स्टाफ के बच्चों को रियायत मिल जाती है ‌इतने बड़े और नामी स्कूल में पढ़ेगी तो इसकी तो क़िस्मत खुल जाएगी ‌तुम हां कर दो तो आगे का मैं संभाल लूंगी।”

अनुभा के पास हां करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था। गिरिजा सोनल को अपने स्कूल में आगे पढ़ने की इजाजत नहीं देगी,यह वह जानती थी। गिरिजा ने सोनल को एक साल पहले स्कूल में दाखिला लेते हुए यह शर्त रखी थी अगर सोनल का व्यवहार और अध्ययन संतोष जनक नहीं रहा तो वह स्कूल में अगले साल नहीं पढ़ेगी।

दुखी मन और बोझिल कदमों से जब अनुभा घर पहुंची तो सोनल दादी के साथ बैठ टीवी पर कोई कार्यक्रम देख हंस रही थी। अनुभा ने डांटते हुए सोनल से कहा :”तुम्हें शर्म नहीं आती ,सारा दिन टीवी देखती रहती हों,इस बार दो विषयों में फेल हो गई हो।”

सोनल सकते में आ गई, अंकों को लेकर वह काफी सतर्क रहती थी।

लेकिन तभी विमला देवी बीच में बोल पड़ी :”पहले तो इतने अच्छे अंक आतें थे मेरी बेबी के,इस स्कूल में शिक्षिकाओं को पढ़ाना ही नहीं आता तो इसमें बच्चों का क्या दोष ?”

दादी को अपना पक्ष लेते देख सोनल निश्चित होकर हंसते हुए बोली:” ठीक कह रही है दादी मां ,मैं तो पहले जितना ही पढ़ती हूं,वो तो मुझे टीचर यहां क्या पढ़ाते हैं समझ नहीं आता है।”

अनुभा को बहुत गुस्सा आया, लेकिन फिर भी संयत स्वर में बोली :” आप बच्ची के आगे इस तरह की बातें करेंगी तो वह शिक्षकों का आदर कैसे करेगी। और अगर शिक्षकों का आदर ही नहीं मन में तो विद्या कहां से आयेगी।”

फिर सोनल की तरफ देखते हुए बोली,”कमी शिक्षकों के पढ़ाने या समझाने में नहीं है,कमी तुम्हारी एकाग्रता में है ‌। पढ़ने से मन हटता जा रहा है और दोष शिक्षकों पर मढ़ रहीं हों।”

इतना कहकर अनुभा अपने कमरे में चली गई और कमरा बंद करके चुपचाप लेट गई।इस समय एकांत की बहुत आवश्यकता महसूस हो रही थी।

स्नातक करके बीएड किया हि था कि गिरिजा की शादी में हितेंद्र से टकरा गई ‌बहन मोनिका के साथ हर कार्यक्रम में बड़े उल्लास से भाग ले रही थी।बहन की शादी भी एक महीने पहले हुई थी। हितेंद्र को अनुभा की खुबसूरती और चंचलता ने आकर्षित किया और पहली और आखिरी बार मां के विरुद्ध जाकर अनुभा से विवाह कर लिया।

अनुभा की इच्छा का इस रिश्ते में कोई महत्व नहीं था। पैसे वाले घर से आएं पैगाम को पिता ने भाग्य का उदय समझ कर तुरंत लपक लिया।गिरती सेहत , बड़ी पुत्री के विवाह में होम सारी बचत और पुत्र के लापरवाह आचरण से परेशान बाप को मुफ्त में निपटती बेटी भाग्योदय का सूचक लगी। मजबूरी ने पिता की नजरों पर ऐसा पर्दा डाला कि वर की पन्द्रह साल की उम्र का फासला और पीने पिलाने का शौक सब नज़र अंदाज़ करवा दिया।

अनुभा के अरमानों के पंख अभी फड़फड़ाये भी नहीं थे कि रिश्ता पक्का होते ही कुतरे गये। उसकी समझ नहीं आ रहा था विवाह हो ही क्यों रहा था सांस की नाराज़गी साफ़ दिख रही थी। विवाह के उपलक्ष्य में एक भव्य समारोह आयोजित किया , उसमें वधु क्या पहनेगी, कहां से तैयार होगी,सब विमला देवी के हिसाब से हुआ। उन्हें वधु पक्ष की भावनाओं से अधिक अपने सामाजिक स्तर की चिंता थी।आयोजन में वधु पक्ष के बहुत कम लोग आमंत्रित थे और जो आएं थे उनकी पोशाकें भी विमला देवी की निगरानी में तैयार की गई थी। विवाह के बाद हितेंद्र ने तो ससुराल में कभी पैर रखा नहीं, अनुभा को भी बस बिमारी की खबर आने पर मां पिताजी से मिल आने की इजाजत थी। उनकी मृत्यु के बाद मायके से रिश्ता खत्म सा हो गया था बस बड़ी बहन से अवश्य फोन पर बात कर लेती थी।

हितेंद्र का अनुभा के प्रति आकर्षण दो चार महीनों में खत्म हो गया।इतने अल्प समय में अनुभा के चित्त में पति के प्रति प्रेम या कोई कोमल भावना अंकुरित भी नहीं हो पाई थी कि उसकी जिंदगी एक नीरस दिनचर्या में ढ़लती चली गई। हितेंद्र से  दो साल छोटे भाई ने उचित समय पर दस साल पहले विवाह कर लिया था। अनुभा के भाग्य में सास के साथ साथ देवरानी के इशारे पर भी दिन भर चक्री की तरह नाचना लिखा था। हितेंद्र रात को नशे में चूर आता था तो अनुभा फिर उसकी सेवा में लग जाती थी। वह परिवार में सब के निशाने पर रहती थी।देवर को जब भी हितेंद्र के शराब सेवन और अय्याश दोस्तों के ऊपर हो रहे खर्चों पर गुस्सा आता तो अनुभा को जी भर कर सुनाता। हितेंद्र के सामने तो उसकी जुबान पर ताला पड़ जाता था। देवरानी को इस शादी से यह फायदा हुआ कि उसे भरोसे वाली आया अपने बच्चों की देखभाल के लिए मिल गई।

सास ने सारा बीड़ा अपने ऊपर उठा लिया था कि अनुभा क्या खाएगी ,क्या पहनेगी, कहां जायेगी , किससे बोलेगी सब पर उसकी नज़र रहती। हितेंद्र के सामने दुबली-पतली अनुभा और कम उम्र की लगती थी इसलिए अनुभा के पहनने के लिए विमला देवी ने हल्के रंगों की साड़ियों का ढेर लगा दिया। ऐसे बेरंग लिबास पहनते हुए अनुभा कै बहुत कोफ्त होती लेकिन सास के आगे क्या बोले। उसकी परेशानी को सुनने और  समझने वाला कोई नहीं था बस बहन से ही छुप छुप कर फोन पर बात कर लेती अपना दुखड़ा रो लेती। मोनिका अपनी बहन की स्थिति से बहुत दुखी थी लेकिन कुछ भी करने में असमर्थ थी। कभी तीज त्यौहार पर मौका देखकर मिलने आती लेकिन बड़ा असहज महसूस करती।

एक साल में ही अनुभा गर्भवती हो गई और उसने एक पुत्री को जन्म दिया। उसकी जिंदगी में तो कोई अंतर नहीं आया लेकिन उसे मुस्कुराने और हंसने का कारण मिल गया। सोनल की बाल सुलभ हरकतें उस के दिल को प्रसन्न करती तो जब वह उसे छाती से लगाती तो उसे एक आंतरिक संतुष्टि मिलती। जैसे जैसे सोनल बड़ी होने लगी हितेंद्र का ध्यान भी आकर्षित करने लगी। वह पुत्री के मोह में बंधकर हफ़्ते में कईं शामें घर में गुजारने लगा। अनुभा ने तो अपने विवाहित जीवन को स्वीकार लिया था बिना किसी आस के वह समय काटती जा रही थी।

शादी के बारह  साल भी नहीं बीते थे कि एक सड़क दुघर्टना में हितेंद्र की मृत्यु हो गई। बहुत नशे में गाड़ी चला रहा , ड्राईवर उस दिन आया नहीं था ,बस अपनी लापरवाही के कारण जीवन गंवा बैठा । अनुभा दुखी थी लेकिन सोनल को मानसिक आघात लगा, पिता के बहुत करीब थी। हितेंद्र से अपनी बात मनवाती थी तो उसकी हर बात मानती थी। हितेंद्र का उस पर अच्छा खासा नियंत्रण था। उसके देहान्त के बाद वह दिशाहीन और बेलगाम सी हो गई। पति की मृत्यु के बाद अनुभा देवर देवरानी को अवांछनीय लगने लगी। देवर को भय था कि कहीं वह जायदाद का आधा हिस्सा न मांग लें, उसने भुमिका बांधनी शुरू कर दी। वह जब तब उसके और सोनल के  खर्चों को लेकर उलाहना देता रहता ।कहता भाई साहब ने अपने हिस्से का पैसा तो शराब में खत्म कर दिया ,अब उनके परिवार को पालने की जिम्मेदारी वह क्यों निभाएं। अनुभा बड़ी परेशान रहती,पति के सामने कम से कम किसी के आगे हाथ तो नहीं फैलाने पड़ते थे।

मोनिका ने बहन की यह परेशानी सुनी तो तुरंत गिरिजा से मिल कर हल निकाला। उसके पीछे पड़ कर उसके स्कूल में अनुभा की नौकरी का इंतजाम किया। अनुभा की सास और देवर पहले उसके बाहर काम करने के विरुद्ध थे अब तुरंत तैयार हो गए।देवर को अभी भी सोनल के महंगे स्कूल की फीस भरने में तकलीफ हो रही थी तो नये सत्र में अनुभा ने अपने स्कूल में ही सोनल का दाखिला करवा दिया। नये स्कूल के माहौल में ढलने और सहेलियां बनाने में उसे परेशानी हो रही थी जिस कारण वह चिड़चिड़ाहट महसूस करती थी। वह सामंजस्य नहीं बैठा पा रही थी , पिता का साथ तो छुटा ही पुराने दोस्त भी अलग हो गए। पुराने स्कूल की शिक्षिकाओं में वह लोकप्रिय छात्रा थी, उनके स्नेह से वंचित नये स्कूल में शिक्षिकाओं की बेरूखी से क्रोधित होकर वह बदतमीजी कर जाती थी। इन सब बातों से परेशान अनुभा की समझ नहीं आ रहा था वह करें तो क्या करें। अगर गिरिजा का प्रस्ताव स्वीकार करती है और किसी दूसरे स्थान पर जाकर रहती है तो सोनल के लिए इतना बड़ा परिवर्तन कहीं और कष्टदायक न हो जाएं।

इन विचारों में खोई कब आंख लग गई पता नहीं चला । दरवाजे पर जोर से दस्तक सुनकर आंख खुली देखा तो शाम हो गई थी। कुछ खाया भी नहीं था सुबह से उठते ही तेज सिर में दर्द महसूस हुआ। दरवाजा खोला तो सास सामने खड़ी थी। दनदनाते हुए कमरे में दाखिल हुई और तेज स्वर में बोली:” सोनल के सामने कोई तमाशा खड़ा करना नहीं चाहती थी इसलिए उस समय चुप रही। यह जरा सी नौकरी करके तुम अपने आप को कुछ ज्यादा ही समझने लगी हो । तुम्हारे तेवर ही बदल गये है । ”

अनुभा आश्चर्य से :” ऐसा क्या कह दिया मैंने मम्मी जी?”

विमला देवी:”आजकल बहुत जवाब देने लगी हों, मेरे बेटे ने तुमसे शादी की थी इसलिए बर्दाश्त कर रही हूं। वरना न तो तुम हमारे घर  के लायक हो न मेरे बेटे के। उस दिन अगर मेरे बेटे के साथ तुम होती तो शायद उस दुर्घटना का शिकार तुम होती और वह बच जाता। ” विमला देवी ने जिस नफरत और अफसोस के साथ यह बात कही थी अनुभा का दिल कांप गया ‌।उस दिन हितेंद्र के किसी दोस्त ने बड़ी पार्टी का आयोजन किया था ,अनुभा भी जाने वाली थी। तैयार हो कर जैसे ही वह बाहर आयी हितेंद्र ने उसको देखते ही मुंह बना लिया। जोर जोर से चिल्लाने लगा :” यह क्या पहन कर आई हों ,इतने हल्के रंग की साड़ी पहनी है , पार्टी में जा रही हों या किसी के यहां मातम मनाने।क्या दिखाना चाहती हों इस तरह बुड्ढो की तरह कपड़े पहन कर ।” और भी न जाने क्या क्या बोलता रहा ‌।

अनुभा को बहुत तेज गुस्सा आ रहा था, दोनों मां बेटे ने मिलकर उसका पागल बना रखा था ।अगर उसके पहनावे से इतनी तकलीफ़ हैं तो स्वयं अपनी मां के सामने खड़े होकर कहते क्यों नहीं , अपनी पसंद के कपड़े दिलवा कर लाते क्यों नहीं। वैसे तो जो मां कहती हैं वही सही है, मां के हिसाब से चलों और अब मां की पसंद पर इतना गुस्सा। वह पैर पटकती हुई अंदर चली गई लेकिन उसे बाद में बड़ा अफसोस हुआ। अगर वो साथ जाती तो शायद हितेंद्र को इतना नहीं पीने देती और नशें में गाड़ी तो बिल्कुल नहीं चलाने देती।

बीती बातों के बारे में सोचने से क्या लाभ लेकिन अभी जो विमला देवी कहकर गयी वह कैसे नज़र अंदाज़ कर दें। उसके जीवित रहने का अफसोस मना रहीं थीं,सब को खटकती थी वह । उसका मन खराब हो रहा था , ऐसे माहौल में रहने से क्या फायदा जहां उसके लिए इतनी नफ़रत है।बारह साल में भी इन लोगों ने उसे अपनाया नहीं तो आगे क्या उम्मीद करें वह ।सोनल के लिए भी यहां रहने से क्या फायदा , उसे भी शीघ्र हकीकत समझ आने लगेगी। उसके मन में जो संशय था वह समाप्त हो गया और उसने दृढ़ निश्चय कर लिया कि वह गिरिजा के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेंगी।

गिरिजा के दादा ने सुहाना गढ़ में कईं एकड़ जमीन पर नामी पब्लिक स्कूल स्थापित किया था। अपने दोनों पुत्रों के नाम बराबर हिस्सा कर दिया था। गिरिजा की मां का जब देहान्त हुआ तो उसके पिता का वहां से मन उखड़ गया।वो वैसे भी साहित्य में अधिक रुचि रखते थे वहां अमीरों की दिखावटी दुनिया और राजनीति से दूर रहना चाहते थे। अपने हिस्से की संपत्ति अपने छोटे भाई को बेचकर वह इस शहर में आकर बस गए। जो पैसा मिला था उससे एक छोटा सा स्कूल खोल लिया और गिरिजा प्रिंसिपल बन गई। स्वयं स्कूल की व्यवस्था देखते और बच्चों की साहित्य में रुचि बढ़ाने के लिए कार्य करते।

गिरिजा के मन में पिता के इस निर्णय से कड़वाहट भर गयी,वह पढ़ने में भले ही बहुत होशियार नहीं थी लेकिन महत्त्वकांक्षी थी।

वह स्वयं उस बड़े स्कूल सुहाना पब्लिक स्कूल की प्रिंसिपल बचपन से बनना चाहती थी लेकिन पिता ने उसकी इस इच्छा पर पानी फेर दिया । चाचा का कुछ साल पहले देहान्त हो गया था , वो उसे बहुत स्नेह करते थे और जीवित होते तो उसकी यह इच्छा अवश्य पूरी करते। लेकिन चाची उसको बहुत पसंद नहीं करतीं थीं । उससे दूर की दुआं सलाम में विश्वास रखतीं थी। मोनिका ने जब गिरिजा से अनुभा की नौकरी की बात की थी तब गिरिजा आदतवश नखरे कर रही थी। मोनिका ने हंसते हुए मजाक में कह दिया :”अरे चल इतना क्यों इतरा रही है? हमारे नोट्स पढ़ कर पास होती थी ।आज प्रिंसिपल बन गई तो ज़रा सा काम करते हुए नखरे दिखा रही है।”

गिरिजा को यह बात चुभ गयी, नौकरी को दें दी पर भय बना रहता । कहीं अनुभा सह शिक्षिकाओं के सामने मजाक में उसकी स्कूल के दिनों की बातें न बताने बैठ जाएं।

वह उसे निकालने के बहाने ढूंढती लेकिन अनुभा के काम वह कोई कमी नहीं निकाल सकीं।अब उसकी बेटी के रूप में उसे बहाना मिल गया था तो उसने अपनी चाची सुगंधा से बात की।

सुगंधा को गिरिजा की सिफारिश पर किसी को अपने स्कूल में काम या दाखिला लेना बिल्कुल पसंद नहीं था। लेकिन सामने से नाराजगी जताना भी उचित नहीं लगता था। उसने दोनों काम किए लेकिन बेमन से। जब अनुभा को पता चला कि उसकी नौकरी और सोनल का दाखिला पक्का हो गया है तो उसने यह समाचार घर में सब को दे दिया।देवर देवरानी प्रसन्न थे बिना कुछ कहे छुटकारा मिल रहा था। लेकिन सास को गुस्सा आया उसका रौब सहने वाली उसके हाथ से निकल रही थी। सोनल ने भी बहुत रोना-धोना मचाया। अनुभा ने मन पक्का बना लिया था तो वह तटस्थ अपने निर्णय पर अडिग रहीं।

अनुभा ने ले जाने के लिए केवल कपड़े पैक किए और तीन चार लगेज हो गये। सोनल अपनी प्रिय कोई भी वस्तु छोड़ने को तैयार नहीं थी। दरवाजे के बाहर कोई उसे छोड़ने भी नहीं आया उसका मन बहुत भारी हो गया। बहन बाहर गाड़ी लेकर आयी थी , अनुभा की आंखें नम हो गई। मोनिका स्टेशन तक छोड़ने आई थी और खानें पीने का सामान लेकर आयी थी। बोली :” जातें ही कुछ व्यवस्था हो न हो,दो तीन दिन का काम तो इससे चल ही जाएगा। कुछ कपड़े है मुझे अब नहीं आते इतनी मोटी हो गई हूं।तू पहन लेना।अब वहां अपने तरीके से रहना,अगली बार मिलूं तो मुझे अपनी पुरानी अनुभा चाहिए।”

अनुभा को घबराहट हो रही थी आने वाला समय उसकी झोली में क्या डालेगा। उसने जो निर्णय लिया वह सही है कि नहीं इसलिए बहन की बात सुनकर बस मुस्कुरा दी कुछ कहा नहीं।

सात आठ घंटे सफर करने के बाद   अनुभा और सोनल अपनी मंजिल पहुंचे लेकिन वहां जाकर पता चला स्कूल तीस किलोमीटर दूर एक पहाड़ी पर था। अनुभा ने जब टैक्सी चालकों से वहां चलने को कहा तो कोई तैयार नहीं हुआ।सब का एक ही बहाना था वहां से लौटने समय सवारी नहीं मिलती, इसलिए दुगुना किराया लगेगा।शाम हो रही थी अनजान जगह और सोनल कें लगातार बड़बड़ाने से अनुभा बहुत परेशान हो गई थी। तभी एक शानदार जैगुआर वहां आकर रूकी,उसको देखते ही स्थानीय लोग उसको घेरकर खड़े हो गए और उसमें बैठे  बंदे से बात करने लगे। उनमें से एक टैक्सी ड्राइवर बोला :”सर जी इन मैडम को आपके स्कूल में ही जाना है।”

यह बात सुनकर दरवाजा खोलकर जब वह बंदा बाहर निकला तो दोनों आश्चर्य से उसे देखती रह गई। ब्रांडेड जींस और टी-शर्ट में वह मजबूत कद-काठी का स्मार्ट शख्सियत का आदमी था।वह अनुभा के एकदम सामने आकर खड़ा हो गया, पहले उसको ऊपर से नीचे तक देखा फिर लापरवाही वाले अंदाज में पूछा:” क्यों जाना चाहतीं हों स्कूल में , दाखिले की प्रक्रिया सम्पन्न हो गई है।?”

अनुभा के पुरुषों से बात करने के मौके कम ही पड़ते थे इसलिए उसे पराये पुरुषों से बात करने में थोड़ा संकोच होता था। और यह बंदा तो आत्मविश्वास से भरा ऐसा व्यवहार कर रहा था जैसे सारी दुनिया पर इसका राज हो। वह कुछ बोल पाती उससे पहले सोनल बीच में उछल पड़ी:” मेरा एडमिशन तो हो गया है इस स्कूल में और मॉम तो टीचिंग करेगी यहां पर ।”

उस बंदे ने एक बार फिर अनुभा को ध्यान से देखा और बेबाकी से बोला :” हूं चेहरे से तो इतनी उम्र की नहीं लगती जितनी लिबास से। क्या नाम बताया तुमने?”

अनुभा को गुस्सा आ गया,वह गुर्राकर बोली :” मैं ने अभी अपना नाम नहीं बताया है न बताने की कोई आवश्यकता समझती हूं।आप अगर स्कूल तक छोड़ दें तो बहुत मेहरबानी होगी।”

वह जोर से हंसते हुए बोला :” ओहो तो बिल्ली के पंजे भी है ,चलो मोहतरमा बंदा आपकी सेवा में हाजिर है।”

अनुभा को सुहाना हिल्स पहुंचने का और कोई विकल्प नहीं दिखाई दिया तो उस अजनबी के पीछे चल दी। उसके एक इशारे पर चार बंदों ने उसका सामान गाड़ी में रख दिया।सोनल कूद कर गाड़ी की आगे वाली सीट पर बैठ गई और अनुभा पीछे वाली पर । गाड़ी की तेज गति ऐसी की ठंडी हवा और बाहर का खुबसूरत नजारा,अनुभा का मन स्थिर होने लगा। बोलने की कोई आवश्यकता नहीं थी ,वह मोर्चा सोनल ने संभाल रखा था।

लेकिन तभी उस अजनबी की आवाज से उसका ध्यान उन दोनों की बातों की तरफ गया। वह शीशे में पीछे की तरफ देखते हुए कहा रहा था:” एक बात समझ नहीं आयी , गिरिजा ने तुम्हारे आने की सूचना आफिस में क्यों नहीं दी । वहां से गाड़ी आ जाती, यहां से ऊपर जाने के लिए कोई बंदोबस्त  नहीं होता बड़ी मुश्किल हो जाती है।”

यह बात अनुभा को भी अजीब लग रही थी कि गिरिजा ने ठीक से निर्देश क्यों नहीं दिए कि कैसे पहुंचना है। फिर उसके मूंह से अचानक निकल गया:” आप गिरिजा को जानते हैं ?”

वह शीशे में से देखते हुए टेढ़ी मुस्कान के साथ बोला :” वैसे तुम परिचय लेने देने में विश्वास नहीं रखती हों ,फिर भी मैं बता दूं मैं गिरिजा के चाचाजी का बेटा अभिनंदन चौहान हूं। और तुम अनुभा शर्मा हो ,इस स्कूल की नयी टीचर।”

बात समझते ही अनुभा की आंखों में भय और फिर खीझ के भाव देखकर वह हंसते हुए बोला :” अब इतना बड़ा गुनाह भी नहीं हुआ कि अपने आप को कोसना शुरू कर दो। ”

अनुभा झेंपते हुए बोली,” लेकिन गलती तो हुईं है ना, मुझे आराम से बात करनी चाहिए थी।” वह हां में सिर हिलाते हुए बोला

” चलो माफ किया हमारा मूड बहुत अच्छा है बहुत दिनों बाद अपनी छबीली में घूमने निकले थे।”

इतने में बोर होकर सोनल ने गाड़ी में लगे स्टीरियो को  चालू कर दिया और संगीत बहने लगा। अनुभा फिर अपने ख्यालों में खो गई,अगर सोनल इतना चिक-चिक नहीं कर रही होती तो वह अभिनंदन से ऐसे अभद्र तरीके से व्यवहार नहीं करती। शुरुआत ही गलत हो गई आगे क्या उम्मीद की जा सकती है।

अभिनंदन दोनों को एक कॉटेज के आगे छोड़ कर चला गया। कॉटेज में जरूरत का सब फर्नीचर था लेकिन दोनों इतना थक गईं थीं कि खा-पीकर कपड़े बदल कर सो गई। अगले दिन दरवाजे की घंटी सुनकर अनुभा की आंख खुल गई,लग रहा था कोई बहुत देर से घंटी बजा रहा था । बीच-बीच में दरवाजा खटखटाने की भी आवाज आ रही थी। वह नाईटी में ही भागी ,न जाने कौन है। दरवाजा खोला तो अभिनंदन था , झुंझला कर बोला:” कान में रुई ठूंस कर सोते हो क्या इतनी देर से बजा रहा था ।वो तो गिरिजा की पहचान की हो इसलिए इतना कष्ट कर रहा हूं वरना मुझे क्या पड़ी।”

तभी उसकी नज़र अनुभा के कपड़ों पर पड़ी और वह सकपका गया। अनुभा जल्दबाजी में नाईटी में आ गई थी उसके उपर का श्रग नहीं पहना था। वह भी शर्म से लाल हो गई ,बाल बिखरे हुए आंखें अधखुली नींद से भरी हुई। वह जल्दी से बोला:” यह कुछ सामान तुम्हारा गाड़ी में रह गया था देने आया हूं। यहां से सीधे जाकर उल्टे हाथ पर मुड़ो तो कुछ दुकानें हैं जहां खाने पीने का सामान मिलता है। दिन में दो बार जीप नीचे शहर जाती है , बाजार से कुछ और सामान लाना हो तो उसमें जा सकती हों।” और वह तुरंत पलट कर चला गया।

अनुभा जल्दी से नहाने चली गई और साड़ी पहनकर उसे सुकून मिला। सोनल को उठाने की चेष्टा की पर वह सोती रही । खिड़की से बाहर देखा तो चारों ओर पेड़ ही पेड़ और उनके बीच झांकती कॉटेज। गाड़ियों का कोई कोलाहल नहीं और हवा में ऐसी शुद्धता कि मन तरोताजा हो गया। चाय की तलब हो रही थी रसोईघर में बनाने की व्यवस्था तो थी लेकिन सामग्री तो लानी पड़ेगी। सारा दिन सामान व्यवस्थित करने और खाना बनाने की सामग्री इकट्ठा करने में बीत गया। लेकिन वह खुश थी कोई टोका-टाकी नहीं कोई थकान नहीं।सोनल अवश्य मुंह फुलाकर बैठी रही।

अगले दिन सोमवार से उसने पढ़ाना और सोनल ने पढ़ना आरम्भ कर दिया ‌। अनुभा की मुलाकात सुगंधा चौहान से हुई, उसे वह तेज सख्त लेकिन सुलझी हुई औरत लगी। दो हफ़्ते में अनुभा और सोनम अपने नये माहौल में ढलने लगी और आसपास पहचान बढ़ी तो अच्छा लगने लगा। सोनम थोड़ी अनमनी रहती थी लेकिन अनुभा ने महसूस किया कि वह अब उससे अपने मन की बात करने लगी थी थोड़ा करीब आने लगी थी।इस बीच कई बार उसके मन में अभिनंदन का खयाल आया लेकिन उसने झटक दिया। उसे आश्चर्य भी हो रहा था इतने दिनों में वह उसके सामने आया क्यों नहीं फिर लगा उस दिन उसे भुतिया अवतार में देखकर घबरा गया होगा।

स्कूल की तरफ से काॅरनीवाल का आयोजन किया जा रहा था ,कईं तरह के झूले और स्टाल लगें थे ।सोनल बहुत उत्साहित थी ,अनुभा से बोली ,”माॅम हम एक एक झूल पर बैठेंगे और आप कुछ ऐसा पहनना प्लीज़ की आप भी मेरे साथ झूला झूल सकों। कोई बहाना नहीं चलेगा आपका , मुझे कुछ झूलों में अकेले डर लगता है। ”

अनुभा का मन दुखी हो गया, हितेंद्र  के सामने सोनल इस तरह के कामों के लिए उसको याद भी नहीं करतीं थीं। उसने निश्चय किया वह सोनल को मस्ती कराने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। वह क्या पहने इसी असमंजस में थी कि उसे बहन का दिया हुआ बैग याद आया। उसने उसे बिना खोले ही अलमारी में एक तरफ रख दिया था।खोला तो देखा तीन चार कुर्तियां पजामी के साथ और एक दो गाउन थे। उसको अपनी बहन की बहुत याद आती थी एक वही थी जो उसका इतना ध्यान रखती थी। वह जब कुर्ति पहन कर तैयार होकर कमरे से बाहर आयी तो सोनल खुश होते हुए बोली:” वाह मॉम आज आप मेरी मॉम लग रही हो , हमेशा तो लगता था मैं मॉम नहीं नानी के साथ घूम रही हूं ‌”

अनुभा आश्चर्य से बोली :” अच्छा तुम्हें ऐसा महसूस होता था तुमने पहले कभी नहीं कहा। ”

सोनल :”अब क्या कहती आप तो बड़ी उम्र का दिखने की कोशिश में लगी रहती थी। डैड को आप पर गुस्सा भी इसलिए आता था। अच्छा अब चलो न कितनी देर हो गई है।”

बेटी के उत्साह से प्रसन्न अनुभा को भी झूले झूलने में बड़ा मज़ा आ रहा था ‌जब झूले तेज गति से उड़ते हुए हवा से बात करते तो उसे लगता उसने आसमान छू लिया। ऐसे ही एक झूले से उतर कर हंसते हुए दोनों आइसक्रीम खाने जा रही थी कि सामने अभिनंदन पड़ गया। इसके पहले की वह संभल पाती और अभिवादन करती अभिनंदन की नजरों ने उसका गहन निरीक्षण कर लिया और बोला :” आज तो लगता है पंख लग गए हैं बड़ी खुश लग रही हो।”

अनुभा के मुंह से एकदम से निकल गया:” अच्छा बिल्ली के पंख होते हैं मुझे पता नहीं था।”

बोलते ही अनुभा के हाथ ने  स्वतः मुंह ढक लिया और आंखें चौड़ी हो गई।न जाने वह बार-बार कैसे भूल जाती है कि अभिनंदन उस संस्था का मालिक है जहां वह नौकरी करती है।

वह कुछ और कह पाती उससे पहले सोनल उसका हाथ छुड़ा कर दुसरे झूले पर चढ़ गयी। वह अभिनंदन से माफ करना कहकर सोनल के पीछे गयी तब तक झूला चालू हो चुका था ।झूला थोड़ा सा ऊपर ही गया था कि सोनल के आगे की राॅड खुल गई और सोनल आधी झूले से लटक गई।

एकदम से शोर मच गया,अनुभा ने देखा तो डर के कारण चीख निकल गई। तुरंत झूला प्रबंधक ने झूला रोका और धीरे धीरे उसे नीचे की ओर खींच ने लगा । अभिनंदन भी दौड़कर वहां पहुंचा और मदद करने लगा। सोनल ने कस कर झूला पकड़ रखा था और इतनी दहशत में थीं की बस रोती जा रही थी। अभिनंदन ने तुरंत डॉक्टर अमित को फोन किया जो स्कूल के प्रागंण में ही बने प्राथमिक चिकित्सालय में कार्यरत थे और उस समय मेले में घूम रहे थे।

सोनल को जैसे ही झूले से अलग कर बेंच पर लिटाया वह बेहोश हो गई। डाक्टर ने जांच करने के बाद कहा कि चोट कहीं नहीं लगी बस डर के कारण बेहोश हो गई है। अनुभा पुत्री का हाथ पकड़ कर रो रही थी और डाक्टर उसे होश में लाने की कोशिश कर रहा था। जैसे ही सोनल को होश आया वह अनुभा के गले लग कर फफक पड़ी। अनुभा उसे सांत्वना देने लगी , अभिनंदन ने भीड़ को तितर-बितर किया। दोनों को उस तरफ ले गया जहां खाने के स्टाल लगें थे। दोनों बिल्कुल खामोश बैठी रही अभिनंदन ने कोशिश की थोड़ा हंसी मजाक करने की। लेकिन दोनों ने कुछ खास प्रतिक्रिया नहीं दी और ज़रा सा खाकर अपने घर  चली गई। घर पहुंच कर सोनल एक बार फिर अनुभा से लिपट गई और रोने लगी।वह बोली :” आप ठीक कहती हो मैं अपने उतावलेपन के कारण किसी न किसी मुसीबत में पड़ जाती हूं। आगे से आपकी सब बातें मानूंगी।” अनुभा उसको बहुत देर तक सहलाती रही।

अगले दिन अभिनंदन ने सीधे आफिस  में जाकर अनुभा का रेज्यूमे निकाला, उसे उसके बारे में जानने की बहुत उत्सुकता हो रही थी। लेकिन कुछ खास ज्ञात नहीं हुआ उम्र पैंतीस लिखी थी लेकिन लगती तीस की थी। अनुभा कक्षा में पढ़ाने से पहले किसी काम से आफिस गई तो वहां अभिनंदन मिल गया। उसे देखते ही बोला :”कैसी है सोनल ,शॉक से बाहर आ गई है ना ?”

अनुभा :” जी हां वह अब ठीक है।”

अभिनंदन :” और तुम कैसी हो? जैसी तुम्हारी हालत हो गई थी लग रहा था डाक्टर से तुम्हारा ब्लड़ प्रेशर भी चैक करवाना पड़ेगा। ”

अनुभा कुछ नहीं बोली , सिर झुका कर खड़ी रही तो अभिनंदन तुरंत बोला :” नहीं नहीं इसमें कोई शर्मिंदगी वाली बात नहीं है, अपने बच्चे से प्रेम करना तो बहुत अच्छी बात है।”

अनुभा ने आंखें उठा कर उसके मुख की ओर देखा शायद मजाक बना रहा था उसका । लेकिन अभिनंदन बहुत गंभीरता से यह बात कह रहा था और उसके चेहरे पर दुख की लकीरें उभर आई थी। और कुछ बोले बिना वह अपने कमरे में चला गया।

अनुभा अपने कक्षा में पढा अवश्य रही थी लेकिन उस लग रहा था अभिनंदन की आंखें उसका पीछा कर रही है। हृदय में अब तक पड़ी सुप्त भावनाएं अंगड़ाई लेती लग रही थी,वह डर कर उन्हें सुलाने की कोशिश कर रही थी।

अभिनंदन को भी दिल में बैचेनी महसूस हो रही थी। पहली बार उसको देखा तो

उसकी सादगी इस बनावटी  दुनिया की भीड़ में अलग पहचान दे रही थी। इतनी परेशान और चिंतित थी जैसे सारे संसार का बोझ उसके कंधों पर रखा हुआ था। कुछ बोलो तो एकदम से चेहरे लाल हो जाता है और जब उकसाने पर गुस्से में जवाब देती तो आंखों में बिजली सी कौंध। अभिनंदन को उसे छेड़ने में बड़ा आनन्द आया था। अगले दिन सुबह , बिखरे बालों में से झांकता ताजगी और प्राकृतिक सौंदर्य से लबरेज चेहरा , आंखों में भरी नींद और तराशी हुई देह । उसके दिल की धड़कन बेकाबू हो रही थी,मन के किसी कोने में विचार आया रोज़ सुबह यह चेहरा देखने को मिल जाए तो जीवन से क्या शिकायत रह जाती है। लेकिन इस ख्याल को एक झटके से दिल से बाहर निकल वह वहां से चला गया था।दस दिन के लिए काम से बाहर गया था वरना उससे मिलने से अपने आप को कैसे रोक पाता। जब सोनल को झूले से लटके देखा तो उसके स्वयं का कलेजा मुंह को आ गया था और अनुभा के रोते देख मन व्यथित हो गया था। क्यों उसके बारे में इतना सोचता है वह ,वह स्वयं अपने मनोभावों को नहीं समझ पा रहा था। एक शादी शुदा औरत के बारे में इतना सोचना गलत है।

बहुत दिनों बाद सुगंधा अपने पुत्र अभिनंदन के साथ रात्रि भोजन कर रही थी। उसको गुमसुम और खामोशी से खाते देख उसने स्वयं ही बोलना आरंभ कर दिया :” कैसा रहा तुम्हारा ट्रिप कुछ काम हुआ?”

अभिनंदन :” हां।”

सुगंधा :” मोनाली का फोन आया था पूछ रही थी भैया कैसा है?”

अभिनंदन ने जब इस बात का कोई जवाब नहीं दिया तो उसने स्वयं ही बोलना जारी रखा।:” पहले मुझे गुस्सा आ रहा था गिरिजा पर कैसे किसी को हमारे ऊपर थोप सकती है। लेकिन अब आश्चर्य हो रहा है कि क्यों उसने इतनी मेहनती और सिन्सियर टीचर को अपने स्कूल से जाने दिया।”

इतनी देर में पहली बार अभिनंदन ने मां की बातों में दिलचस्पी दिखाते हुए बोला :” किसकी बात कर रहीं हों?”

सुगंधा :”अनुभा की,कल जिसकी लड़की के साथ झूले वाला हादसा हुआ था। विधवा है बिचारी पहले गिरिजा के स्कूल में पढ़ाती थी।”

अभिनंदन :” गिरिजा के दिमाग में कब क्या फितूर आ जाएं कुछ पता नहीं चलता है ‌।”

शाम को टहलता हुआ वह अनुभा के घर के सामने से गुजर रहा था देखा घर अंधेरे में डूबा हुआ था। आसपास घरों में रोशनी थी , उसने सोचा कहीं बाहर गई होगी। तभी सोनल के चीखने की आवाज आई:” माॅम जल्दी करो कितनी देर में लाइट आएगी।”

लगता है शाॅर्ट सर्किट हो गया है ,वह बगीचे का फाटक खोल कर अंदर गया तो देखा अनुभा बाहर ही बने बिजली के बोर्ड को खोले सर्किट देख रही थी। वह लपक कर उसके पास गया और बोला :”क्या हुआ?”

अनुभा उसको देख कर चौंकते हुए बोली :” कपड़े स्त्री  कर रही थी एकदम से बिजली चली गई। और सब जगह आ रही है तो मैंने सोचा हमारी ही गई है तो हो सकता है इस  बोर्ड में कोई दिक्कत होगी।”

अभिनंदन गुस्से से उसकी तरफ देखते हुए बोला :” बिजली के काम का कोई अंदाज़ा है तुमको या एक्सपेरिमेंट करने का बहुत शौक है। कोई बड़ा हादसा भी हो सकता था मदद मांगने में शर्म आती है। ”

अनुभा को भी गुस्सा आ गया,जब देखो तब या तो मजाक उड़ाता है या धौंस दिखाता है। वह भी चिल्ला कर बोली :” किस से मदद मांगती ,अभी किसी को अच्छी तरह जानती कहां हूं यहां?”

अभिनंदन शांत होते हुए बोला :” हां गलती मेरी हैं,दस दिन के लिए बाहर गया था नहीं तो पहले ही आकर तुम्हें सबके फोन नं दे-देता जिनकी जरूरत पड़ती रहती है। एक बार पूरा कैम्पस घूमा कर समझा देता कहां क्या काम होता है ।”

अनुभा :” नहीं गलती मेरी हैं ,यह सब जानकारी तो मुझे स्वयं एकत्रित करनी चाहिए थी। लेकिन घर व्यवस्थित करने में इतनी व्यस्त रही कि इस तरफ ध्यान नहीं गया।” इतने में अभिनंदन ने फोन पर बिजली ठीक करने वाले को बुला कर सर्किट ठीक करवा दिया। अभिनंदन :” लो बिजली ठीक हो गई ,इस खुशी में एक कप चाय तो पिला ही सकती हों।”

अनुभा :” जी आपका बहुत धन्यवाद, और प्लीज अंदर आ जाएं , मैं बनाती हूं।”

उसने अभिनंदन को अंदर तो बुला लिया था लेकिन उसकी जान सूख रही थी ।वह जब भी उसके आसपास होता उसको बैचेनी सी होती । अभिनंदन बड़े इत्मीनान से डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बैठ  उसको चाय बनाते हुए देख रहा था। अनुभा को महसूस हो रहा था उसकी नजरें उसकी पीठ पर है।

अभिनंदन को अनुभा का लयबद्ध तरीके से काम करना ,पीठ तक लहराते बाल, कमर में ठुंसा पल्ला ,छोटा सा घर एक सुखद अपने पन का एहसास करा रहा था। इतने में सोनल बाहर आ गई और उसे देखते ही खुशी से उछल पड़ी। दूसरी कुर्सी उसके नजदीक खींच कर उससे बात करने लगी। अनुभा को मन ही मन हंसी आ गई,दो तीन दिन पहले ही तो कह रही थी सोनम :” जानती हो माॅम कक्षा में सभी लड़कियां अभिनंदन सर की दिवानी है ,कितने हैंडसम है ,क्या बाड़ी है और कितने स्मार्ट कपड़े पहनते हैं कि बस देखते रहने का मन करता है। किसी कार्यक्रम में उनकी स्पीच हो तो कोई लड़की छुट्टी नहीं करती।मैडम किसी लड़की को आफिस काम से भेज दें तो वह दिन उस लड़की का सब से लकी दिन माना जाता है।”

अनुभा ने हंसते हुए जवाब दिया था :” पागल हो तुम सब लड़कियां, अभी बित्ती सी हो नहीं ऐसी बातें करती हों। तुम्हारी उम्र के तो उनके स्वयं के बच्चें होंगे।”

सोनल :” नहीं पायल कह रही थी सर की कोई फेमिली नहीं है कोई बच्चे नहीं हैं ।उनकी पत्नी की कईं साल पहले मृत्यु हो गई थी इसलिए वह बहुत चुप और उदास रहते हैं।उनकी मम्मी और एक छोटी बहन है ,बहन बाहर पढ़ने गयी है।”

अनुभा इन्हीं विचारों में खोई चाय और सेंडविच टेबल पर रख कर एक तरफ़ खड़ी हो गई। अभिनंदन उसकी तरफ देखते हुए बोला :” बैठ क्यों नहीं रही हों, आमंत्रण पत्र छपवाने पड़ेंगे क्या?”

वह झेंप गई और बैठते हुए सोचने लगी ,क्या है जाता है उसे अभिनंदन के सामने ऐसे मुर्खों की तरह व्यवहार कर जाती है।

उसका बैठने का मन नहीं था अभिनंदन के इतने नजदीक उसकी नज़रों के सामने लेकिन क्या करती बैठ गई।सोनल फिर शुरू हो गई और अभिनंदन को दूसरी तरफ बैठी सोनल की तरफ अपना चेहरा करना पड़ा। अनुभा को मौका मिल गया उसका निकट से निरीक्षण करने का। सोनल की सहेलियां सही कह रही थी वह देखने में बहुत अच्छा है ,उसकी आंखों में हल्का सा भूरापन है और उसके बाल उसकी उम्र के पुरुषों की तुलना में कुछ लम्बे थे। मजबूत कद-काठी है लगता है बहुत कसरत करता है। उसे समझ नहीं आ रहा था उसे क्या हो गया है कैसे एक अजनबी को वह इतने ध्यान से देख रही थी ,क्यों सोच रही थी उसके बारे में।

इस विचार से ही वह पसीना पसीना हो गई। अभिनंदन बात अवश्य सोनल से कर रहा था लेकिन ध्यान अनुभा की ओर था। वह अनजान नहीं था अनुभा उसे निहार रही थी। वह स्वयं उसकी देह से उठती महक से मदहोश हो रहा था। उसका दिमाग उसको आगाह कर रहा था,वह फिर उस खाई की ओर बढ़ रहा था जहां बर्बादी के अलावा और कुछ नहीं था। उसकी घबराहट बढ़ रही थी वह वहां से भागना चाहता था लेकिन उसका शरीर जड़ हो चुका था वहां से हिलना नहीं चाहता था।

सोनल किसी काम से उठ कर बाहर गयी तो उसने एकदम से चेहरा घुमाकर अनुभा की ओर देखा। उसे अपनी तरफ देखते हुए देखा तो एक शरारत भरी मुस्कान के साथ बोला :” उम्मीद है जो इतने ध्यान से देख रही हो पसंद आया होगा।” अनुभा ऐसे झेंप गई जैसे चोरी करते पकड़ी गई हो , चेहरा बिल्कुल लाल हो गया। अभिनंदन जोर से हंसता हुआ वहां से चलता बना।अनुभा भी जैसे उसके जाने के बाद होश में आयी हों, अपने आप से खिन्नता महसूस हो रही थी।इस उम्र में इन परिस्थितियों में कैसे एक पुरुष की तरफ वह खिंचाव महसूस कर सकती है। उसकी संस्था में काम करने वाले हर नये मुलाजिम का वह इसी तरह ध्यान रखता होगा।सोनल के साथ हुएं हादसे के कारण उसका हालचाल जानने के लिए एक दो बार बात क्या कर ली , उसने न जाने कैसे विचारों को अपने हृदय में स्थान दें दिया। उसने अपने कंधे झटके शायद इन विचारों से अपना पीछा छुड़ाने के लिए । उसे लगा और कुछ नहीं पति को गुज़रे दो साल हो गए थे ,थोड़ा अकेलापन महसूस होने लगा था,स्थान भी नया और अनजान इसलिए मन अस्थिर हो गया था।

अभिनंदन को सुगंधा ने कुछ लड़कियों की तस्वीरें दी। उसे पुत्र के अकेलेपन को देखकर दुख होता था और उसके विवाह की जी तोड कोशिश करती रहती थी।

लेकिन अभिनंदन को उसके इस प्रयास पर क्रोध आता था और अगले दिन आफिस में उसके पीछे से कर्मचारियों के काम में अनियमितता ने उसके क्रोध को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया।

उस दिन अनुभा जब आफिस किसी काम से पहुंची तो अभिनंदन के कमरे से उसके गुस्से में चीखने की आवाजें आ रही थी। तभी दो कर्मचारी बड़बड़ाते हुए उसके कमरे से बाहर निकले,” बहुत सनकी है, कैसे पागलों की तरह चीख़ता है ,न जाने अपने आप को करता समझता है।” रिसेप्शन पर बैठी महिला से अनुभा की अच्छी दोस्ती हो गई थी‌।अनुभा को हैरानी से अभिनंदन के कमरे की ओर देखते हुए देखा तो बोली :” सर के मूड़ का पता नहीं चलता है,जब उन्हें गुस्सा आता है तो कोई नहीं बच सकता। वैसे वो दोनों जो  अभी गये है बहुत लापरवाही से काम करते हैं, हमेशा डांट पड़ती रहती है दोनों को।”

यह सब सुनकर अनुभा की घबराहट बढ़ गई, उसे लगा अभिनंदन से अधिक मेलजोल बढ़ाना ठीक नहीं। किसी बात पर गुस्सा आ गया तो उसकी नौकरी पर बन आएगी और वह कहां जायेगी।

शाम को जब घंटी बजने पर अनुभा ने दरवाजा खोला और सामने अभिनंदन को खड़ा देखा तो वह दरवाजे पर अड़ कर खड़ी हो गई।फिर बोली :” हां बोलिए क्या कर सकतीं हूं मैं आपके लिए?”

अभिनंदन आश्चर्य से बोला :”तुम क्या कर सकतीं हों मेरे लिए ?”

अनुभा  झेंप गई और और एक दम से बोली :” नहीं मेरा मतलब है आपके यहां आने का कोई कारण तो अवश्य होगा।” अभिनंदन :” हां कारण तो अवश्य हैं।कल मॉम का जन्म दिन है , इसलिए आमंत्रित करने आया हूं ।”

अनुभा :” अलग से देने की क्या आवश्यकता थी।स्कूल के बोर्ड पर लगा था कार्ड ,चर्चा हो रही थी उसकी ,हम कल आजाएंगे। ”

अभिनंदन :” मुझे पता है अलग से तुम्हें आमंत्रण नहीं मिलेगा तो तुम नहीं आओगी। तुमने वह कार्ड वहां पर पढ़ा ही नहीं होगा, अच्छा बताओ पार्टी कहां है ?”

अपनी चोरी पकड़ी गई देख अनुभा का चेहरा लाल हो गया ,वह कुछ पल चुप रहने के बाद बोली :” वो तो जब जाती तब पता कर लेती।”

अभिनंदन ने एक दो बार अंदर आने की चेष्टा की लेकिन अनुभा ने रास्ता नहीं दिया। वो वहीं दिवार से टेक लगा कर आराम से खड़ा हो गया और शरारत भरी मुस्कान के साथ बोला :” अच्छा और आखिरी वक्त पर जाने का इंतजाम कैसे करती, पार्टी यहां स्कूल कैंपस में नहीं है बल्कि नीचे शहर में एक बड़े होटल में है।”

अनुभा बहुत असहज महसूस कर रही थी , आने जाने वाले देखेंगे तो न जाने क्या सोचेंगे अभिनंदन चौहान यहां खड़ा क्या कर रहा है।अनुभा को चुप देख अभिनंदन बोला :” कल तुम्हारे जाने का इंतजाम हो गया है,तुम तैयार रहना सात बजे तुम दोनों को लेकर मैं जाऊंगा।”

अनुभा :” नहीं बिल्कुल नहीं हम ऐसे कैसे चल सकतें हैं आपके साथ ?”

इतने में सोनल जो काफी देर से सोच रही थी मां किस से इतनी देर से दरवाजे पर खड़ी बात कर रहीं हैं, दरवाजे तक आ गई और बीच में बोल पड़ी :” क्यों नहीं चल सकते ,बल्कि यह ठीक रहेगा ,पार्टी ड्रेस पहनकर फंस फंस कर बैठ कर जाएंगे तो ड्रेस खराब हो जाएगी।”

अभिनंदन :” तो ठीक है कल सात बजे तक तैयार रहना ।” और वह चला गया।उसके जाने के बाद अनुभा ने राहत की सांस ली ,फिर सोनल को घूर कर देखा। वह बोली :” तुम्हें बीच में बोलने की क्या आवश्यकता थी, मैं

बात कर रहीं थीं न।इस तरह किसी का उपकार लेना क्या अच्छी बात है ?”

सोनल ने उसकी बात अनसुनी कर दी और बोली :”मॉम आपको पता नहीं पायल भी आएगी पार्टी में ,हम दोनों साथ साथ घूमेंगे कितना मज़ा आएगा। अगले दिन हम पूरी क्लास के सामने बताएंगे वहां क्या क्या हुआ।मैं तो वह पिंक फ्रोक पहनूंगी आप क्या पहनोगे? कुछ स्मार्ट सा पहनना,माॅम वह पीच कलर का गाउन पहनना जो मासी ने दिया था आपको।”

अनुभा ने महसूस किया सोनल उसके कितना करीब आती जा रही थी । अपनी हर बात उसे बताने लगी थी ,उसको राय भी देने लगी थी।

अगले दिन अनुभा ने गाउन पहन कर मेक अप किया ही था कि सोनल ने शोर मचा दिया।

“माॅम जल्दी करो अभि सर आने वाले होंगे,मेरा अच्छा सा हेयर स्टाइल बना दो‌‌।” अनुभा को उसका उतावलेपन पर हंसी आ रही थी और खुशी भी मिल रही थी। अनुभा ने जैसे ही सोनल के बाल बनाएं दरवाजे की घंटी बज उठी। अभिनंदन उसको देखते ही बोला :” बुरी नहीं लग रही हो।”

उसने सोचा ” मतलब अच्छी लग रही हूं।” लेकिन वह स्वयं सूट में किसी और जहां का लग रहा था,वह उसे बस देखती रह गई।फिर संभलते हुए बोली :” आप बैठो बस पांच मिनट लगेंगे,बाल बांध कर आती हूं।”

अभिनंदन ने उसका हाथ पकड़ लिया और बहुत धीरे से बोला :” रहने दो बालों को ऐसे ही , बहुत सुन्दर लग रही हो।” और वह उसके एकदम करीब आ गया। अनुभा ने उसकी आंखों में देखा तो उनकी गहराइयों में उतरती चली गई ‌। दोनों एक दूसरे की आंखों में आंखें डाल पता नहीं कब तक खड़े रहते अगर सोनल की आवाज नहीं आती :” माॅम मेरे पिंक शूज़ कहां है , कहीं हम पुराने घर से लाना तो नहीं भूल गए।”

अनुभा जल्दी से अभिनंदन के हाथ से अपना हाथ छुड़ा कर अंदर भागी। सोनम को जूते दिए और स्वयं आईने के सामने खड़े हो कर आदतवश बाल बांधने लगी। फिर अभिनंदन की बात ध्यान में आते ही ऐसे ही छोड़ दिए।सोनल पहले से ही गाड़ी की पिछली सीट पर जाकर बैठ गई।

अनुभा ने उससे इशारे से कहा आगे बैठने के लिए लेकिन उसने साफ इंकार में सिर हिला दिया , उसको ड्रेस का घेर फैला कर बैठना था। अनुभा को अभिनंदन के इतने समीप आगे बैठना सही नहीं लग रहा था , संकुचित हो कर बैठ अवश्य गई। अभिनंदन ने गाड़ी का एसी चालू किया और जैसे ही गियर बदले उसका हाथ अनुभा को स्पर्श हो गया ।वह सिहर गई और दरवाजे की ओर और खिसक गई। अभिनंदन का  ध्यान गाड़ी चलाने में था लेकिन अनुभा पर भी उसकी नजर थी। वह हल्की हंसी के साथ बोला :” कितना उधर खिसकोगी , दरवाजा तोड़ कर बाहर निकलने का इरादा है क्या?”

उसकी इस तरह की टिप्पणियों के कारण अनुभा को गुस्सा आ जाता था। फिर वह गंभीरता से बोला :” ठंड लग रही हो तो एसी कम कर दूं।”

इसका व्यवहार समझ नहीं आता एक पल मजाक उड़ाता है और दूसरे पल इतनी चिंता जताता है।वह बोली :” नहीं ठीक है आपका धन्यवाद हमें लिफ्ट देने के लिए।

अभिनंदन :” मुझे कोई धन्यवाद नहीं चाहिए,तुम आराम से क्यो नही बैठती हो, मैं तुम्हें खा  नहीं जाऊंगा।” अनुभा ने बात को अनसुनी कर खिड़की से बाहर झांकना बेहतर समझा।

होटल पहुंचकर लोगों की भीड़ और आयोजन की भव्यता देखकर अनुभा के होश उड़ गए। उसे अपने आप पर गुस्सा आ रहा था, उसने क्यों आमंत्रण स्वीकार किया,क्यों वह अभिनंदन की बात मानने को मजबूर हो गई। भीड़ में वह असहज महसूस करती थी और यहां तो किसी को जानती भी नहीं थी । अपने अंतर्मुखी स्वभाव के कारण स्कूल में उसकी बहुत कम लोगों से पहचान हुई थी। सोनल तो पारूल के साथ लगी रहेगी,वह अकेले एक कोने में चुपचाप बैठी रहेगी। वह अंदर पहुंचकर ऐसा ही कोई कोना तलाश रही थी,सोनम तो पारुल को देखते ही उसके पास चली गईं। अभिनंदन मेहमानों की भीड़ में सबसे अभिवादन करने में व्यस्त हो गया।दस मिनट भी नहीं हुए थे अनुभा को बैठे हुए अभिनंदन कुछ स्नैक्स लेकर उसके पास पहुंच गया।” मैं तुम्हें ही ढूंढ रहा था और तुम सबसे छुप कर यहां बैठी हों।”

अनुभा :” बस किसी को जानती नहीं तो सोचा एक तरफ बैठ कर पार्टी का मजा लेना बेहतर होगा।” अभिनंदन :” चलो मैं तुम्हारा सबसे परिचय करवा देता हूं।”

उसने अनुभा को सबसे मिलवाना शुरू कर दिया, हंसी मजाक करता तो कुछ न कुछ खाने के लिए ले आता।वह इतना ध्यान रख रहा था कि अनुभा को संकोच होने लगा ।उसे लग रहा था सबकी निगाहें उस पर थी कि आखिर वह है कौन जिसका अभिनंदन इतना ध्यान रख रहा है।

गिरिजा भी आयी थी इस पार्टी में,अनुभा के निकट आते हुए बोली:” कैसी हो? तुम्हारी तो चाल-ढाल, पहनावा सब कुछ बदल गया।”

अनुभा को इन अनजान चेहरों में एक जाना-पहचाना चेहरा देखकर बड़ी खुशी हुई।वह प्रसन्नता के साथ बोली :” दीदी आप कब आईं, कैसी हो?”

गिरिजा ठंडे स्वर में बोली :” मैं तो ठीक हूं तुम सुनाओ। लगता है बहुत रास आ रही है आजादी।”

और दो-चार इस तरह के फिक्रे कस कर वह चलीं गईं।

अनुभा को उसकी बेरूखी का कारण समझ नहीं आया। लेकिन पार्टी में उसको अभिनंदन के साथ बहुत आनंद आया और सोनल भी प्रसन्न थी।

अभिनंदन का अनुभव भी सुखद रहा,नींद भी अच्छी आयी। सुबह उठा तो अनुभा से मिलने को मन बैचेन हो रहा था।क्यों उसका मन अनुभा से मिलने को बार बार करता था ,उसको देखते ही दिल को ठंडक मिल जाती थी। कईं साल हो गए थे इस बीच किसी स्त्री का सानिध्य उसने स्वीकार नहीं किया था इसलिए शायद अनुभा का साथ उसे अच्छा लगता था। स्त्रियां उससे नजदिकियां बढ़ाने की कोशिश करतीं थीं उसका ही मन किसी की तरफ आकर्षित नहीं हुआ था।वो सब उसे अपनी पत्नी ईशा की क्लोन लगती थी, बनावटी आवरण में ढंकी, असली चेहरा और भावनाएं न जाने कहां दफ़न हो गयी थी। ईशा जब शादी के दो साल बाद गर्भवती हुई तो उसने बच्चे को जन्म देने से इंकार कर दिया। दोनों पति-पत्नी में बहुत बहस हुई, ईशा को लगता उसकी सारी जवानी बच्चा पालने में स्वाह हो जाएगी। लेकिन अभिनंदन को लगता जब बच्चा गर्भ में आ ही गया है तो संसार में आने का भी हक रखता है।इसी बहस में चार महीने निकल गये । अभिनंदन किसी काम से एक हफ़्ते के लिए बाहर गया तो मौका देख कर ईशा अस्पताल में भर्ती हो गई। पता नहीं उसने डाक्टर को कैसे राज़ी , पैसों का लालच ही दिया होगा, लेकिन परिणाम बहुत दुखद रहा। मां और बच्चे दोनों की जान चली गई। अभिनंदन का मन दुःख और अपराध बोध से भर गया। उसे लगा ईशा की बात पहले मान लेता तो उसके प्राण तो नहीं जाते,एक स्त्री को उसकी इच्छा के बिना मां बनने के लिए जोर डालना पाप है और यह पाप उससे हुआ था। लेकिन जब से अनुभा को देखा ,उसका अपनी पुत्री के प्रति प्रेम , झूले वाले हादसे के दिन उसकी घबराहट, पार्टी में पुत्री की प्रसन्न देख उसके चेहरे की चमक, अभिनंदन के हृदय में एक बात बैठती जा रही थी। अगर उसका बच्चा हो और ममता की ऐसी छांव में पलें तो कितना सौभाग्यशाली होगा वह ।

सुबह जोगिंग के बहाने अभिनंदन ने अनुभा के घर के सामने से गुजरने का निर्णय लिया । लेकिन दिमाग में उलझन थी कि अगर वो सामने पड़ गई तो क्या कहेगा।उधर छुट्टी होने के कारण दोनों मां-बेटी निंद्रा में लीन थी कि घंटी की आवाज़ से अनुभा की  आंख खुली। उसने  दरवाज़ा खोला तो सामने गिरिजा खड़ी थी,उसको देखते ही भड़क उठी :”तुम्हें होश भी है तुम्हारी हरकतों के कारण लोग क्या बातें बना रहे हैं।तुम यहां नौकरी करने आईं थी और दौलतमंद अभिनंदन को देखा तो उसे फंसाने की योजना बना ली। पहले हितेंद्र के साथ भी तुमने यही खेल खेला था। ”

अनुभा को समझ नहीं आ रहा था गिरिजा इतने गुस्से में क्यों है और इतनी बेहुदा बात कैसे कर सकती हैं। अपनी बात उसने बोलनी चाही तो गिरिजा ने हाथ के इशारे से उसको चुप करते हुए कहा:” जो दिख रहा है वही कह रहीं हूं। कल पार्टी में अभी तुम्हारे आगे पीछे घूमता रहा और तुम भी निर्लज्ज होकर उसे प्रोत्साहित कर रही थी। पुरुषों को कैसे फांसते है तुम्हें बहुत अच्छे से आता है ‌‌न जाने चाची जी क्या सोचती होंगी, कैसी औरत की मैंने सिफारिश की है।”

अभिनंदन जब अनुभा के घर के सामने से गुजर रहा था तभी उसे घर से ज़ोर ज़ोर से बोलने की आवाजें सुनाई दीं तो वह दरवाजा खुला देख अंदर आ गया। गिरिजा अनुभा पर इल्ज़ाम लगा रही थी और अनुभा सिर झुकाए सुन रहीं थीं। यह नजारा देख अभिनंदन गुस्से से गिरिजा पर चिल्लाने लगा :” यह क्या बकवास कर रही हो? तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई अनुभा से इस तरह बात करने की।” गिरिजा उसको देख कर सकपका गई लेकिन फिर भी अपनी बात को ऊपर रखते हुए बोली :” सही तो कह रही हूं,कल पार्टी में सब पूछ रहे थे कौन है यह स्त्री जिसमें अभिनंदन चौहान इतनी दिलचस्पी दिखा रहा है।”

अभिनंदन ने एक पल के लिए अनुभा की ओर देखा तो उसका हृदय व्यथित हो गया,वह उदास थी और उसकी आंखों नम थी। अभिनंदन सारी दुनिया से लड़ सकता था लेकिन अनुभा को दुखी नहीं देख सकता था। उसने गुस्से से गिरिजा को देखते हुए कहा :” मेरे व्यक्तिगत मामलों में तुम्हें बोलने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है, दुनिया को जो बोलना है मेरे सामने आकर बोलें,एक एक का मुंह तोड़ दूंगा। अब तुम यहां से जा सकती हों , आइंदा अनुभा से इस तरह बात की तो मैं भूल जाऊंगा तुम मेरी बहन हों।”

गिरिजा पैर पटकती हुई चली गई ,अनुभा का सिर घूम रहा था इन सब बातों से ,क्यों हर कोई उसे दबाने में लगा रहता है। अपनी बात उस पर थोपता रहता है ,थक गई थी वह सब के हिसाब से चलते हुए, बहुत अकेला महसूस करती थी। कोई उसका साथ नहीं देता था ,पहली बार अभिनंदन उसके पक्ष में खड़ा होकर बोला था। हितेंद्र ने कभी उसके मान की परवाह नहीं की थी, उनकी मां कितने भी अपमान जनक शब्द बोल देती थी वह खामोश सुनता रहता था।कईं बार अनुभा को लगता था बड़ी है तो उनको उसका अपमान करने का हक पति ने दे दिया,ऐसा पुरुष जब घर में उसके मान की जिम्मेदारी नहीं ले सकता वह बाहर कैसे साथ देगा। अनुभा चक्कर आने के कारण गिरने वाली थी कि अभिनंदन ने उसे थाम लिया। उसकी आंखों में अपने लिए इतनी कोमलता देख उसे इतनी राहत महसूस हुई, उसके सीने से सिर टिका कर वह खड़ी हो गई। वह थक गई थी जीवन से , सबकी उम्मीदें पूरी करते करते । अभिनंदन के नजदीक खड़े होकर उसके शरीर की ऊष्मा और ताक़त के कारण उसे लगा जैसे वह किसी पेड़ की शीतल छाया के नीचे आ गयी है। लेकिन एहसास हुआ पथिक है कब तक इस छाया के नीचे बैठी रह सकती है। अपने अस्तित्व की लड़ाई तो स्वयं लड़नी पड़ेगी,एक पिंजरे में से निकल कर दूसरी कैद में घुसने की चेष्टा कर रहीं हैं

अभिनंदन की बांहे उसके चारों तरफ और कस जाती उसने धीरे से अपने हाथ उसके सीने पर रख उसको पीछे कर दिया।वह बोली :” गिरिजा ठीक कहती हैं तुम्हें यहां नहीं आना चाहिए ,लोग तो बातें बनाएंगे हीं।”

अभिनंदन :” मैं किसी की परवाह नहीं करता…।”

उसको बीच में टोकते हुए अनुभा बोली :” आप नहीं करते होंगे लेकिन मैं करती हूं।मेरी एक बेटी भी है जिसके भविष्य की मुझे चिंता है , मेरी बदनामी उसके भविष्य पर गलत असर डाल सकती है। आप यहां से तुरंत चले जाइए।”

इतना सब कहते हुए अनुभा की नजरें फर्श पर टिकी हुई थी, लेकिन कहकर जैसे ही उसने अभिनंदन की आंखों में झांका तो वहां कोमलता धीरे धीरे कठोरता में बदलती जा रही थी। वह कांप गई और अभिनंदन तीखी नजरों से उसे देखते हुए बोला:”मैं तुम्हारे लिए सारी दुनिया से लड़ सकता हूं लेकिन तुम्हारे भीतर के भय से कैसे लड़ सकता हूं। अपने मन की सुनना और अपने लिए जीना सीखों अनुभा।जिस दिन हिम्मत आ जाएं मेरे पास आ जाना मैं तुम्हारा इंतज़ार करूंगा।”

अभिनंदन तुरंत मुड़ा और बाहर चला गया। उसके जाते ही अनुभा को खालीपन का ऐसा एहसास हुआ कि वह वहीं कुर्सी पर बैठ कर रो पड़ी। कुछ पल बाद जब सोनल वहां आयी और उसे इस तरह सुबकते हुए देखा तो घबरा गई। तुरंत उसके पास पहुंच कर उसकी गले में बाहें डाल कर पूछने लगी:” क्या हुआ मॉम आप रो क्यों रही हो?”

अनुभा :” नहीं कुछ नहीं वह सिर में दर्द महसूस हो रहा था ।”

सोनल :” नहीं मॉम आप सिर दर्द के कारण ऐसे नहीं रोती हों। यहां कोई आया था क्या आपको किसी ने कुछ कहा क्या ?”

अनुभा आश्चर्य से :” तुम्हें ऐसा क्यों लगता है मुझे किसी ने कुछ कहा होगा?”

,सोनल :” माॅम आप को सब लोग कुछ भी कह देते हैं और आप चुप चाप सुन लेती हों। बाद में छुप कर रोती हों। आखिर कब तक सब से डरती रहोगी। दादी, पापा चाचा ,चाची, कोई भी आपको तेज आवाज में सुनाकर चला जाता और आप सिर झुकाए सुन लेती। ”

अनुभा को आश्चर्य हुआ सोनल की बात सुनकर , बच्चे अपने आसपास होती बातों से अनभिज्ञ नहीं होते। सबको खुश रखने के लिए वह सब की बातें सुन लेती थी कभी पलट कर जवाब नहीं देती थी । आसपास शांति बनाए रखने की कोशिश में लगी रहती थी लेकिन परिणाम क्या निकला उसका दिल अशांत रहता है,वह स्वयं दुखी रहती है।

शाम को अनुभा सामान खरीदने के उद्देश्य से बाहर जाने लगी तो देखा एक गाड़ी आकर रुकीं है। देखा तो उसकी सास विमला देवी आयी थी , उसे हैरानी हुई। लेकिन माजरा शीघ्र समझ आ गया, गिरिजा ने फोन करके बुलाया है। विमला देवी अंदर घुसते ही शुरू हो गई :” मैं तो पहले से जानती थी तुम्हारा आचरण चाल-चलन ठीक नहीं, तुम पर निगाह रखने की आवश्यकता है। तुम्हारी ओछी हरकतों के कारण हमारे खानदान का नाम बदनाम हो जाएगा। मैं तुम्हें इस तरह चरित्रहीनता की खाई में गिरने नहीं दे सकतीं हूं। तुम अपना सामान बांध लो , और मेरे साथ वापस चलों।”

अनुभा का मन खिन्न हो रहा था ,वह इतनी दूर आ गई इन लोगों से फिर भी उसके जीवन में दख़लंदाज़ी करने से बाज़ नहीं आ रहे। उसने सोनल की तरफ देखा तो सोनल उसका मुख देख रही थी। सोनल के चेहरे पर पराजय के भाव थे। उसे लग रहा था इस बार भी मां खामोश रहेगी और वापस पुरानी जिंदगी में चली जाएगी।

अनुभा :” बस मम्मीजी बहुत हो गया, मैं आपके साथ नहीं जाऊंगी। देवरजी को लगता है मैं जायदाद में हिस्सा चाहती हूं लेकिन आप सब जानते हैं मुझे पैसे की चाह कभी नहीं रही। मैं तो बहुत कम में काम चलाने की आदी हूं। अपनी पोती के भविष्य के लिए आप कुछ नाम करना चाहती हो वो आपकी इच्छा है। लेकिन मुझे आप से अपने लिए एक पैसा नहीं चाहिए। और आप आगे से मेरी जिन्दगी में दखल देना बंद कर दें। मुझे जो सही लगेगा अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए, अपनी खुशी के लिए मैं करुंगी। रात होने वाली है इसलिए आप आज यहीं ठहर सकतीं हैं,सुबह चली जाना। आगे कभी मां बन कर आना हो तो आपका स्वागत है वरना हितेंद्र के जाने के बाद हमारा सास-बहू का रिश्ता खत्म हो गया है।।”

विमला देवी सकते में आ गई,अनुभा से ऐसी उम्मीद नहीं थी,एकदम गाय बनकर रहती थी, मुंह में जबान नहीं थी। लेकिन इतना अनुभव था जब बाज़ी हाथ से निकलती नज़र आ रही हों तो तुरंत पैंतरा बदल लो।एक दम से मुलायम स्वर में बोली :” अरे बेटा तू तो बुरा मान गई , उम्र के साथ तजुर्बा आ जाता है , बेकार बदनामी होगी इस बात से डर गई थी। वरना मैं जानती हूं तू कितनी धैर्यवान और समझदार है ,जो करेंगी सोच समझ कर करेंगी। चल कुछ खाने को लिया बहुत थकान महसूस हो रही है।”

रात भर अनुभा को नींद नहीं आई ,बार बार अभिनंदन का चेहरा घूम जाता। उसे महसूस हो रहा था उसने अभिनंदन के साथ उचित व्यवहार नहीं किया , वो तो अपनी बहन तक से लड़ पड़ा उसके लिए। उसने निश्चय किया अगले दिन स्कूल में उससे माफी मांगने अवश्य जाएगी। लेकिन आफिस में पता चला वह स्कूल आया ही नहीं।

स्कूल खत्म होते ही सोनल को घर जाने का निर्देश देकर स्वयं पता पूछते हुए वह अभिनंदन के घर की ओर चल दीं। इतनी भव्य इमारत देखकर वह घबरा गई, उसे लगा उसे वापस चलें जाना चाहिए। अगर सुगंधा चौहान ने उसे यहां देख लिया तो क्या सोचेंगी।वह दरवाजे से ही खामोशी से पलट कर जाने लगी तो देखा बगीचे में एक पेड़ के नीचे खड़ा अभिनंदन मुस्करा रहा था बोला :” यहां तक आकर वापस जा रही हो अनुभा ,जो कहने आयी हों वह बात तो कह कर जाओं। ”

अनुभा ने क्या कुछ नहीं सोच रखा था कहने के लिए लेकिन सब भूल गईं चुपचाप उसके पास जाकर खड़ी हो गई। अभिनंदन ने उंगलियों से उसकी ठोड़ी उपर करते हुए उसकी आंखों में देखते हुए कहा :” लोगों का डर खत्म हो गया जो अकेली यहां चलीं आयीं।”

अनुभा :” मुझे माफ़ कर दो मेरा व्यवहार उस दिन ठीक नहीं… ।”

अभिनंदन ने उसके होंठों पर अपनी उंगली रखते आ धीरे से कहा :” श श … माफी तभी मिलेगी जब तुम मेरा प्रेम स्वीकार करोगी, मुझसे शादी के लिए हां करोगी।अनुभा अपने दिल की सुनना फिर जवाब देना। लोगों के बारे में सोचकर अपना निर्णय मत लेना।” उसके इतना निकट खड़े होकर एक अनोखा एहसास उस पर हावी हो रहा था, लोगों के बारे में सोचने का उसे होश ही नहीं रहा था। वह उसके सीने से लग गई, उसे लगा उसको मंजिल मिल गई और अभिनंदन को उसके बिना बोले ही अपने प्रश्न का उत्तर।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *