भारी कंगन

Bhaaree Kangan

पति को गुज़रे चार साल हो गए थे, दोनों बच्चे विदेश में बस गए थे। सुमित्रा के जीवन में एकाकी पन और खालीपन भर गया था। एक दिन बैंक गयी ,घर में पड़ी सोने की चेन भी सोचा लाकर में रखना ही सुरक्षा की दृष्टि से ठीक है। लाकर में रखें कंगन की जोड़ी पर नजर पड़ी तो अतीत के कुछ पल याद आ गए।बीस साल पहले जेठ जी के पुत्र के विवाह में कितनी ज़िद करके बनवाएं थे ।पति की आंखों में बेबसी को भी नजरंदाज कर दिया था।

जेठानी ने आश्चर्य से पूछा था :” इतने भारी कंगन?”

इठलाती हुई बोली थी सुमित्रा :” और क्या? जब भी कुछ मांगों इनसे पैसे का रोना लेकर बैठ जाते हैं।इस बार तो अड़ गई थी ,बनवा कर दिए, बच्चों के काम आएंगे।”

जेठानी मुंह बनाकर आगे चली गई, लगा कोई किसी को देखकर खुश नहीं।

कंगन हाथ में लेकर सुमित्रा सोचने लगी , बहुत भारी है, अकेली रह गई है कहां पहनकर जाएगी।इस बार बेटी को दे देगी।

शाम को फोन पर बेटी से बोली ” तुझे वो कंगन याद है जो मैंने मिंटू की शादी में बनवाएं थे।”

पुत्री हंसते हुए बोली :” हां याद क्यों नहीं होंगे ? कितने महिने तुम्हारे और पापा के बीच कोल्ड वॉर चली थी । सनी और मैं बहुत सहमे रहते थे।”

उस समय को याद नहीं करना चाहती थी तुरंत बोली :” इस बार जब भारत आएगी तब तुझे दे दूंगी।”

मां के स्वर में उदासी नहीं भांप सकीं  बोली :” यहां इतने भारी कंगन पहन कर कहां जाऊंगी ? ऐसा करों तुम उन्हें अपने पास ही रहने दो ,आखिर इतने मन से बनवाएं थे।कभी कहीं जाओ तो पहन लिया करों।” सुमित्रा अपने सिकुड़ते झुर्रियां पड़ते हाथों को देख रहीं थीं।

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