चाहत उसकी

Chaahat Usakee

आधे घंटे से मानव उसकी गली में घूम रहा था , लेकिन पांच बजते ही उसने कांपती उंगलियों से सोनाली के घर की दरवाजे की घंटी बजा दी। हमेशा की तरह सोनाली की मां ने  दरवाजा खोला ,हल्के से मुस्कुरा कर अभिवादन स्वीकार किया और उसे बैठक में बिठा कर चली गई।वह धैर्य के साथ इंतजार करता रहा जानता था दस पंद्रह मिनट से पहले सोनाली नहीं आने वाली। सोनाली के आते ही उसकी आंखें और हृदय तृप्त हो जातें, सुंदरता की प्रतिमूर्ति,लहराती हुई आती और अपनी किताबें निकाल कर बैठ जाती।देरी के लिए क्षमा मांगना उसकी शान के खिलाफ था। लेकिन मानव को कोई शिकवा नहीं था ,चांद ने अपने निकट बैठने की इजाजत दे दी उसके लिए यह बहुत था।

ग्यारहवीं में नयी आईं थी सोनाली ,मानव के स्कूल में।कॉमर्स विधा में थी और मानव ने विज्ञान के विषय ले रखें थे।ऊपर वाले ने उसे दिमाग देने में कोई कंजूसी नहीं की थी भले और कुछ देना भूल गया था। साधारण शक्लसूरत के मानव की नजर जब सोनाली पर पड़ी तो बस ठहर गई,निकट जाने की और बात करने की  कभी हिम्मत नहीं हुई।कक्षा अलग थी इसलिए जब मौका मिलता लंच ब्रेक में या खाली पीरियड में वह उसकी कक्षा का एक चक्कर लगा आता ‌, सुकून मिल जाता।

स्कूल के और छात्रों की नजर भी उस पर रहतीं थीं लेकिन उससे अधिक बोलने की हिम्मत किसी में नहीं थी।वह बहुत गुस्से वाली और नकचढी थी।

बारहवीं में छमाही में मानव को चारों सेक्शन में सबसे अधिक अंक प्राप्त हुएं और सोनाली बस उत्तीर्ण हो सकीं  ।वह सीधे मानव के पास गईं और बोलीं :” क्या तुम मुझे तीन महीने गणित पढ़ा सकते हों,ट्यूशन लगा कर मुझे कुछ  लाभ नहीं हुआ।”

मानव भला कैसे मना कर सकता था , उसके दोस्तों ने समझाया,” इसके चक्कर में मत पड़ ,तेरी पढ़ाई में व्यवधान आएगा और कब किस बात पर चिढ़ कर तेरा अपमान कर दे कह नहीं सकते।”

मानव नहीं माना , अपने चांद को निकटता से निहारने का मौका वह कैसे जाने देता ।फिर उसके नीरस जीवन में यही एक घंटा होता था जब वह जी उठता था।रात दिन माता पिता की कलह के कारण घर अव्यवस्थित रहता था , पिता शराब के नशे में मां को मारते तो बीच-बचाव करते हुए वह भी चपेट में आ जाता। कोई भाई-बहन नहीं थे , मां भी नौकरी करतीं थीं ,सारा दिन अकेला रहता और रात को होने वाले क्लेश से खौफजदा।

मानव ने सवाल समझा दिया था और सोनाली उससे मिलता जुलता दुसरा सवाल हल कर रही थी। तभी उसकी मम्मी दो गिलास जूस और दो प्लेट नाश्ता ले आयीं।गर्म नाश्ता उसे अच्छा लगता और रोज की तरह सोनाली अपनी प्लेट भी उसकी तरफ बढ़ा देती। वह ना-नुकुर करता तो वह उसे गुस्से से देखती और कहती :”खालो चुपचाप , मैं डाइटिंग पर हूं। मम्मी ने देख लिया मैंने नहीं खाया तो गुस्सा करेंगी।”

सोनाली के हाव भाव से लग रहा था उसे सवाल हल करने में परेशानी हो रही है।मानव को कोई जल्दी नहीं थी ,आराम से बैठा सोनाली को निहार रहा था।हमेशा अपने बाल खुले रखती लेकिन उस दिन चोटी बना रखी थी। दो चार लटें निकल गई थी और उसके गालों पर अधिकार जमा कर अठखेलियां कर रही थी।मानव की उंगलियां छटपटा रही थी उन्हें कान के पीछे करने के लिए लेकिन मजबूर था। नज़रें फिसल कर बाहों पर आ गई थी, रंग-बिरंगी चूड़ियां,हर उंगलियों में अंगुठी,हर नाखून पर अलग रंग , सौंदर्य और श्रृंगार का अनूठा संगम थी वह।स्कूल में एकदम सादा यूनिफॉर्म और सादगी की मूर्ति बन कर आती थी।वह आश्चर्य से उसके इस शौक को देखता और सोचता उसके बस में होता  तो दुनिया जहान की ऐसी वस्तुएं लाकर उसके कदमों में डाल देता।

वह उसको निहार ने में ऐसा खो गया कि सतर्कता भूल गया । सोनाली की बड़ी बड़ी आंखें अपने ऊपर देख कर वह सकपका गया, पसीना पसीना हो गया।अब सोनाली क्रोधित होकर ,उसपर घूरने का इल्ज़ाम लगाकर घर से निकाल देगी।उसकी नजरें जमीन में गड़ी जा रही थी कैसे जियेगा उसे देखें बिना।

अपने हाथ पर उसकी हथेली की गर्माहट महसूस हुई।आंख उठाकर देखा तो सोनाली की आंखों में अपने लिए दर्द और भावनाएं नजर आईं।वह बोला रही थी :” मैं तुम्हारे बारे में सब जानती हूं , तुम्हारे पड़ोस में जो नेहा रहतीं हैं वह मेरी अच्छी दोस्त हैं।”

फिर उसकी शर्ट की आस्तीन थोड़ा ऊपर करके, पहले दिन की पड़ी मार के नील पर अपने कांपते होंठ रख दिए।मानव को लगा उसकी रूह तक पर मरहम लगा दी उसने।वह बोल रहीं थीं:”मैं जब भी शादी करूंगी , तुम जैसा जीवनसाथी चाहूंगी। जिसमें इतना धैर्य हो कि मेरी गलतियों पर भी शांत रहे और सुधारने में सहयोग दें।जो इतना प्यार करता हों फिर भी जबरदस्ती कोई हक नहीं जमाएं। मैं आगे पढ़ना नहीं चाहती फैशन संबंधित कोई कोर्स करके बुटीक खोलना चाहती हूं। तुम भी पढ़ कर अपने पैरों पर खड़े हो जाओ ।तब तक हम अच्छे दोस्त बनकर एक दूसरे का सहारा बनेंगे।”

मानव तर गया,लगा सारे जहां की खुशियां उसके  पहलू में आकर बैठ गई। डबडबाई आंखों से उसको देखा और उसके दोनों हाथ चूम लिए।

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