दिल से

Dil Se

सोमा जब राकेशवरी के  दिए पते पर पहुंची तो उसे झुंझलाहट हो रही थी। उसे स्कूल की कॉपियां जांचते हुए वैसे भी बहुत देर हो गई थी और निकलने लगी तो राकेशवरी ने उसे बुलवा लिया। राकेशवरी उस स्कूल की प्रधानाचार्य थी जिसमें सोमा पढ़ाती थी और प्रेरित नाम की संस्था चलाती थी। परेशान और प्रताड़ित स्त्रियों को संबल देना इस संस्था का काम था ।पुष्पा नाम की किसी औरत ने आत्महत्या करने की कोशिश की थी लेकिन उसकी 10 वर्षीय पुत्री रक्षा ने समय रहते फोन करके पुलिस को बुला लिया था ।डॉक्टर ने पुष्पा की मरहम पट्टी कर दी थी लेकिन ऐसे समय में उसे अकेला छोड़ना उचित नहीं था इसलिए प्रेरिता संस्था को फोन किया गया था। राकेशवरी ने सोमा को तुरंत वहां पहुंचने का निर्देश दे दिया सोमा थक रही थी,  भूखी भी थी अचानक इस तरह का कार्य उसे बोझिल लग रहा था। लेकिन राकेशवरी के उस पर बहुत एहसान थे वह मना नहीं कर सकती थी ।पति की मृत्यु के बाद राकेशवरी ने उसकी आर्थिक सहायता के रूप में इस संस्था में उसको वैतनिक कार्यकर्ता बना दिया था ।उसको देखते ही डॉक्टर आंधी की गति से तुरंत निकल गया उसे स्वयं देर हो रही थी।

सोमा को नहीं मालूम था ऐसे हालात में क्या करते हैं ।घर के अंदर दोनों मां बेटी चुपचाप बुत बनी बैठी थी ,पुष्पा पलंग पर और उसकी बेटी रक्षा एक कुर्सी पर। दोनों शायद इतना रोना सुबकना  कर चुकी थी कि अब  आंसुओं ने भी दगा दे दिया था | ‌सोमा चुपचाप वही कुर्सी पर बैठ गई ,उसको लगा उसको बस यह देखना है कि पुष्पा फिर से मरने की कोशिश ना करें। आस पड़ोस के लोगों ने सहानुभूति जताने के लिए आना शुरू कर दिया ।सोमा की समझ नहीं आ रहा था उस जैसे लोग जो हर समय जीने के लिए संघर्ष करते हैं वह भला किसी के मरने की कोशिश को कैसे समझ सकते हैं ।कोई किसी को नहीं समझ सकता सबकी सहन करने की क्षमता अलग-अलग होती है ।जो लोग चिंता दिखाने आए थे, कहीं ना कहीं उन्हें अपने अंदर एक सुकून महसूस हो रहा होगा उनकी स्थिति इस से बेहतर है ।उनके समक्ष  दुख को नापने का एक मानदंड खड़ा था और वह दुख की रेखा के इस तरह थी ।अगर उन्हें इस इंसान की इतनी चिंता थी तो तब क्यों नहीं आगे आए जब वह सहन कर रही थी। तब आगे आकर थाम लेते तो शायद वह उस रेखा के पार नहीं जाती। एक दिन की परेशानी से कोई इस तरह के निर्णय नहीं लेता, तिल तिल के मरते हुए थक जाता है तब एकदम से अपने को खत्म करने की सोचता है।

सोमा एकदम से खड़ी हुई, कड़क आवाज में बोली ,”बस बहुत हो गया उसे आराम करने दो ,अब कोई नहीं आएगा ।”

लोगों के जाते ही पुष्पा ने फिर सुबकना  शुरू कर दिया ।जैसे याद आ गया होवह कितना दुखी है ।

सोमा उसकी पुत्री की तरफ देखते हुए बोली,” इसका क्या होता, गिद्ध नोच खाते इसको ।”

पुष्पा धीरे से बुदबुदाते हुए बोली ,” नहीं सहन हो रहा था ,किस्मत में मरना भी शांति से नहीं लिखा ।”

छः बज गए थे, सोमा की बेचैनी बढ़ रही थी। एक तो बहुत भूख बहुत लग रही थी और इतनी देर हो गई थी तो अपनी पांच साल की पुत्री चित्र की भी उसे फिक्र हो रही थी ।स्कूल से आकर खाना खा कर सो गई होगी लेकिन उठने के बाद सोमा नजर नहीं आएगी तो वह डर जाएगी ।उसने रसोई में जाकर देखा बस एक दो रोटी का आटा गुंथा रखा था और कुछ खाने को नहीं था। इतने में किस-किस का भला होगा और रसोई से बाहर आ गई तो पुष्पा उसके देखते हुए तल्खी से बोली,” इसलिए मरना चाहती थी, एक एक पैसे को मोहताज हूं।”

सोमा को समझ नहीं आ रहा था वह  स्पष्टीकरण क्यों दे रही है ।उसको वैसे भी अपनी पुत्री की चिंता अधिक हो रही थी, फिर भी ध्यान बेटी की तरफ से हटाने के उद्देश से पूछा,” यह मकान किसका है ?”

पुष्पा ने वितृष्णा के साथ जवाब दिया,” किराए का मकान है,मकान मालिक ने 10 दिन में खाली करने का नोटिस दे दिया है ,तीन महीने से किराया नहीं दे पाई।”

सोमा ने जम्हाई लेते हुए पूछा,” तेरा आदमी कहां है?”

पुष्पा ने गुस्से में कहा ,”नाम मत लो उसका, किसी और के चक्कर में पड़कर तीन महीने पहले घर छोड़कर चला गया।”

सोमा का संपूर्ण ध्यान पुष्पा की तरफ था ,”तो तीन महीने  से खर्च कैसे चला रही है ,कुछ काम करती हो तुम?”

पुष्पा दयनीय आवाज में बोली,” वह छः सात दिन के लिए महीने में आता है, जब उस चुडैल से उसका झगड़ा हो जाता है ,कुछ पैसे दे जाता है ।”

सोमा गुस्से से चिल्लाई ,”और तुम ले लेती हो ,इस घर में आने देती हो उसको ।अरे! तेरी सौतन से गई गुजरी तो तू है।”

दोनों मां बेटी घबरा गई, अभी तक जिसने कोई सहानुभूति का एक शब्द नहीं बोला था अचानक कैसे इतने गुस्से में  चिल्लाने लगी थी ।

लेकिन सोमा बोलती जा रही थी ,”मेरी मां भी ऐसी थी जब वह दूसरी के पास जाता था तो  रोती बिलखती रहती थी और जब उसके पास आता तो पहले लड़ती, फिर उसके पैरों में लोट  जाती। मुझे अच्छा नहीं लगता मैं उसको रोकती तो मुझे भी मारने लगती। मैंने खामोशी की चादर ओढ़ ली ,आज तक सुलगती हूं। अरे मरने की हिम्मत दिखा सकती है तो जीने की क्यों नहीं?”

तभी राकेशवरी का फोन आ गया, वह चिंतित स्वर में बोल रही थी ,”सब ठीक तो है ना ,जो कार्यकर्ता  इस स्थिति को संभालने के लिए सक्षम है उनसे संपर्क नहीं हो सका, इसलिए तुम्हें भेजना पड़ा।  पुष्पा कैसी है ?”

सोमा अभी भी शांत नहीं हुई थी तीखे  स्वर में बोली ,”वह तो ठीक है लेकिन मेरी बेटी घर पर भूखी और अकेली है।”

राकेशवरी बोली ,” ठीक है मैं उसे और कुछ खाने का सामान लेकर पहुंचती हूं।”

सोमा की कुछ चिंता कम हुई तो पुष्पा से बोली,” कभी कोई काम नहीं किया क्या ?”

पुष्पा ने कहा,” किया था बेटी होने के पहले एक बड़े से शोरूम में सेल्स गर्ल थी।”

सोना ,” तो फिर कोई ऐसा काम ढूंढ लो, क्यो अपने आपको इतना गिराती  हो की वह रोंदता रहता है।

जब मरने के लिए इतनी कोशिश कर  रही थी तो थोड़ा जीने के लिए प्रयत्न कर लो | राकेशवरी दी की बहुत पहचान है उनसेमदद मांगो।”

तभी राकेशवरी ने सोमा की पुत्री के साथ प्रवेश किया। कुछ बातें कानों में पड़ गयी  थी बोली ,”हां समस्या का कोई ना कोई हल अवश्य निकालेंगे बस तुम हिम्मत बनाए रखो ‌”

राकेशवरी जा चुकी थी ,चारों ने मिलकर भोजन कर लिया ।सोमा को लग रहा था पुष्पा की आंखों में अब उम्मीद है ,इसलिए उसने विदा ली । पुष्पा भावुक होकर उसके गले लग कर रोने लगी तो सोमा की आंखों में भी नमी आ गई ।पुष्पा को रोते देख उसकी पुत्री ने पूछा ,”तुम रो क्यों रही हो मां?” पुष्पा आंसू पूछते हुए बोली ,”पहली बार किसी ने दिल से सहानुभूति दिखाइए ।”

सोमा की पुत्री ने उसकी तरफ देखते हुए पूछा ,”और तुम क्यों रो रही हो मां?” तो वह बोली ,”पहली बार किसी ने दिल से शुक्रिया किया है।”

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