दोषारोपण

Doshaaropan

आज फिर बस छूट गई। बहुत गुस्सा आता है सबके ऊपर। साली  जिंदगी हराम हो गई है । शिक्षा प्रणाली , आरक्षण, समाज ,रिश्तेदार मेरा बाप ,किस-किस को गालियां दूं। स्कूल वाले हरामियों ने हफ्ते में एक काउंसलर का पीरियड ठोक रखा है और वर्मा की औलाद को नए-नए परीक्षण करने के लिए हम ही मीले हैं। हर हफ्ते कागज के टुकड़े पर  सब लिख कर दो कि किस से सबसे ज्यादा शिकायत है ।मुझे तो यह लड़कियों वाला रोने पीटने का काम पसंद नहीं ।अंदर की खीझ सबके सामने परोस कर बैठ जाओ। दो हफ्ते गया नहीं तो धमकी भेज दी अगर आगे से इस पीरियड में गायब रहे तो परीक्षा के लिए प्रवेश पत्र नहीं देंगे। साला हर कोई ब्लैकमेल करेगा, 12वीं के बोर्ड में रिस्क भी तो नहीं ले सकता।  आज देख ही लूं क्या मगजमारी करते हैं।

सुबह सुबह कुछ किताबों के लिए पैसे क्या मांग लिए बापू का चेहरा देखने लायक हो गया। खुद तो फटे हाल रहते हैं मुझे एक एक पैसा देते हुए दस बातें सुनाते हैं ।पिछले हफ्ते भौतिकी की ट्यूशन के लिए क्या चिल्लपों मचाई ।पता नहीं कैसा बाप है।बड़ी मुश्किल से अंटी में से पैसे निकाले । लो अब बस छूट गई ।ऑटो के पैसे तो कभी होते ही नहीं । आज दौड़कर  जाऊंगा, थोड़ी गर्मी निकलेगी, नहीं तो पता नहीं किसका सिर फोड़ दूं। सारे लौंडे जब देखो तब खाने के स्टाल पर पांच सौ का नोट निकाल खड़े रहते हैं। मजाल है मेरे वालेट से एक सौ का नोट भी निकल आए। गुस्सा तो बहुत आता है नहीं पाल सकते थे  तो पैदा ही क्यों किया।

कक्षा में पहुंचा तो देखा सारे छात्र अपनी शिकायतें एक कटोरे में डाल कर बैठ गए थे ,और वह वर्मा साला एक पर्ची उठाने ही वाला था कि मुझे देख कर रुक गया। जल्दी से एक कागज फाड़ा और जो मन आया  लिखकर ढेर में डाल दिया और पीछे की सीट पर जाकर बैठ गया ।लिख तो दिया लेकिन साला दिल पर बोझ सा बैठ गया ।अगर उसे पता चल गया कि मैंने यह लिखा है तो झंड हो जाएगी। उसको कैसे पता चलेगा इतने ढेर में, फिर भी मन में कुछ सोचते रहो अलग बात है ,सबके सामने पिटारा खोलना अलग बात है। तभी वर्मा की आवाज गूंजने लगी ,” आज का विषय है साला बाप के कारण जिंदगी हराम हो गई है ।”

यह तो उसने मेरी पर्ची निकाल ली, कक्षा में शिकायत सुनकर सन्नाटा छा गया ।सारे छात्र उत्साहित होकर एक साथ बोलने लगे ।दोष रोपण का खेल सबसे पसंदीदा खेल है सब का । जब भी कहीं इकट्ठा होते सारे चीख चीख कर बताते कि कैसे सब दुश्मन बने हुए हैं आगे बढ़ने से रोकने के लिए। एक से एक भारी गाली उगलते जो जितना गंदा बोलता उतना कूल  समझा जाता।

वर्मा ने सबको खामोश कराया और एक-एक को बोलने के लिए कहा। कमाल है, सब को शिकायत है अपने अपने बाप से- किसी का पैसे देते हुए रोता था तो किसी का टोका टाकी बहुत करता था । किसी का चीखता चिल्लाता था, तो किसी का मारपीट पर उतर आता था। मतलब खुद तो किसी के बाप ने कुछ जिंदगी में खास तीर मारा नहीं और औलाद से चाहते हैं कलेक्टर की कुर्सी पर जाकर बैठ जाए। सब ने जी भरकर कोसा फिर वर्मा ने हाथ का इशारा कर सबको चुप करा दिया ।सामान्य आवाज में वह बोला , “ठीक है यह तो साबित हो गया है कि पिता नालायक हैं । अब साबित करो कि औलादें कितनी काम की हैं?” कक्षा में ऐसा सन्नाटा छाया कि चींटी भी कुछ कहती तो सुनाई पड़ जाता ।किसी के पास कहने को कुछ नहीं था। सबने आसान रास्ता पकड़ रखा था, अपनी जिम्मेदारी को नजरंदाज करो और हर बात के लिए दूसरे  को जिम्मेदार ठहरा दो। कुछ लोगों के पास हुनर होता है दूसरे के दिमाग में घुस कर सोच की ऐसी की तैसी करने का । वर्मा भी ऐसा ही है  ।गेंद उछाल कर विलीन हो जाता है । साले सोचते रहो  हफ्ते भर। वह कह रहा था,” तुम्हारी जिंदगी और उसकी परेशानियों के लिए कौन जिम्मेदार है ? तुम्हारे घर वाले इतने बुरे हैं तब  भी कब तक दोष देते रहोगे । कबअपने कर्मो, अपनी भावनाओं और अपने चुनावों के जिम्मेदारी स्वयं लोगे ।कब तक दूसरे को अपने जीवन का कर्ता बने रहने दोगे ।माता पिता जन्म के साथी  होते हैं, जन्म देते हैं ,भाग्य विधाता नहीं होते।

घंटी बज गई थी लेकिन कोई अपनी जगह से नहीं हिला। ऐसे बुत बने बैठे रहे जैसे सांप सूंघ गया हो। न जाने क्यों दिल बहुत भारी सा हो गया पिताजी का बेबस लाचार चेहराआंखों के आगे घूम गया।

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