खालीपन

Khaaleepan

शशांक को हैदराबाद में नौकरी करते छः महीने हो गए थे, वसुंधरा रोज़ उससे रात को एक सवा घंटे फोन पर बात करती,तब उसको तसल्ली होती। पहली बार बच्चा इतनी दूर , परिवार से अलग रहने गया था  , मां का दिल तो परेशान हो गया ही‌। शशांक बात करते करते अचानक बोला,” मम्मी, ज़रा पापा से बात कराना।”

वसुंधरा को इस बात का हमेशा से गर्व था कि दोनों बच्चे उसके बहुत करीब थे,मन की एक एक बात उसको बताते थे, अपने पिता अमित कुमार से तो कम ही बात करते थे। उसने हंसते हुए अमित को फोन देते हुए कहा :” लोजी सुपुत्र को आज पिता की याद सता रही है ।”

अमित कुमार ने जैसे ही फोन कान पर लगाया शशांक बोला :” पापा प्लीज़ मेरी बात ध्यान से सुनो , थोड़ा बाहर आ जाओ बहुत जरूरी बात है ‌”

अमित थोड़ा तेज़ बोलते हुए ,”क्या आवाज नहीं आ रही मैं बाहर आता हूं,सिग्नल की बड़ी परेशानी है।”

शशांक :” पापा कल राजेश अग्रवाल आपके पास अपनी बेटी तृप्ति का रिश्ता मेरे लिए  लेकर आएँगे। आप मना मत करना , मैं ने छुट्टी के लिए आवेदन कर दिया है । छुट्टी मिलते ही तुरंत आ जाऊंगा, सगाई तब कर लेंगे।”

अमित कुमार सुन कर दंग रह गए,बात इतना आगे बढ़ गई और उन्हें पता तक नहीं ‌। लेकिन गंभीर और संयमी स्वभाव के कारण शांत स्वर में पूछा :” तुम लड़की को जानते हो ?”

शशांक :” हां पापा स्कूल के समय से,इस बार आता तो आप सब से मिलवाता, लेकिन उसके दादाजी शादी जल्दी करवाना चाहते हैं।आप प्लीज मम्मी को संभाल लेना।”

अमित कुमार ने ‘ठीक है ‘ कहकर फोन काट दिया, और सोचा बेटा बड़ा हो गया है। अपने निर्णय लेने में समर्थ हो गया है , नौकरी करने लगा है जो निश्चय किया है सोच समझ कर ही किया होगा। वसुंधरा को बैचेनी हो रही थी बेटा क्या कहना चाहता था लेकिन जब अमित कुमार ने सब बातें बताई तो वसुंधरा के दिल में फांस सी चुभती प्रतीत हुई।जो बेटा दिन भर की एक एक बात शेयर करता था इतनी बड़ी बात छुपा गया । आज से नहीं सात आठ साल से जानता है उस लड़की को और भनक तक नहीं लगने दी। और आज बता भी रहा है तो उसको नहीं अपने पिता को बता रहा है। कितने अरमान थे ऐसी बहू ढूंढ कर लाऊंगी, दिखने में ऐसी होगी, पढ़ी-लिखी इतनी होगी ,सब एक पल में धाराशाई हो गए।

अगले दिन राजेश अग्रवाल अकेले आए बात करने ,दो टूक बात की और कुछ और कीलें दिल में गाड़ गए। उनसे पता चला शशांक ने एक महीने की छुट्टियों के लिए आवेदन दे दिया है , अगले हफ्ते तक आएगा और तभी सगाई और शादी कर लेगा । कोशिश तो वह यहां दिल्ली तबादले की भी कर रहा है अगर हो गया तो दोनो आराम से दिल्ली में रहेंगे नहीं तो तृप्ति को हैदराबाद में दूसरी नौकरी ढूंढनी पड़ेगी। वसुंधरा को उत्सुकता हो रही थी कि आखिर दोनों मिले कहां, दोनों के स्कूल अलग-अलग हैं और दोनों के कार्य क्षेत्र में भी कोई मेल नहीं। शशांक इंजीनियरिंग करके नौकरी कर रहा था जबकि तृप्ति फैशन डिज़ाइनर थी।

राजेश ने मुस्कुराते हुए यह बात ऐसे बताई जैसे कितना बड़ा राज खोल रहे हो ,” अजी हमारे छोटा भाई जो हमारे पड़ोस में ही रहता है के बेटे के साथ शशांक पढ़ते थे। वहां अक्सर आते रहते थे तो हमारी बिटिया से भी मुलाकात होती रहती थी।अब यह तो हमें भी नहीं पता प्रेम का बीज कब अंकुरित हुआ लेकिन अब दोनों शादी करना चाहते हैं। अभी हम इतनी जल्दी बिल्कुल नहीं करते शादी की लेकिन क्या करें हमारे बाबूजी बहुत बिमार है और उनकी अंतिम इच्छा है प्राण छोड़ने से पहले पोती को दुल्हन के रुप में देखले ‌।” लड़की की एक तस्वीर छोड़ गए और यह कह गए कि आगे की सारी कार्यवाही शशांक के आने के बाद होगी। उन्हें तो अपने बिमार पिता जी के कारण रात दिन अस्पताल के चक्कर काटने पड़ते हैं इसलिए अब शशांक ही सब संभालेगा।

वसुंधरा को लग रहा था अभी उम्र ही क्या है शशांक की ,तेईस साल का है आगे पढ़ने की सोच रहा था लेकिन अब शादी कर लेगा तो क्या पढ़ेगा। छः महीने हो गए लड़के की शक्ल देखें, कितनी बार कहती थी दो तीन दिन की छुट्टी ले कर आजा मन हल्का हो जाएगा एक बार मिल कर। लेकिन तब छुट्टी नहीं मिल रही थी , आने जाने का किराया भी बहुत लग रहा था और अब एक महीने की छुट्टियां तो तुरंत मिल ही गई किराया भी नहीं अखर रहा है ।‌ कितनी बार कहती थी दिल्ली तबादला कराले,सब एक साथ रहेंगे लेकिन तब कंपनी में कोई सुनता नहीं था और अब कंपनी ने कानों का इलाज करा लिया होगा जो तुरंत तबादला कर देंगे।

शशांक के आते ही आनन-फानन में सगाई का कार्यक्रम रखा गया।सारा इंतजाम हाल और खाने-पीने का उसने वही से नेट पर बैठे बैठे ही कर दिया था। अपने ही बेटे की शादी में मेहमान सी बनकर जा रही थी। लड़की को भी पहली बार वहीं देखा, ऐसा तो कुछ भी नहीं था जो लड़का इतना दीवाना हुआ जा रहा था ‌|

वैसे अगर ठंडे दिमाग से दिल पर हाथ रख कर सोचती तो ऐसी ही कोई लड़की शशांक के लिए पसंद करके लाती, दुबली पतली, तीखे नैन-नक्श सांवली चिकनी त्वचा, मासुमियत और मुस्कान से लबरेज चेहरा। लेकिन यहां हर कदम पर लग रहा था बच्चे मनमानी करने पर उतारू हैं। शादी की तारीख भी शशांक और उसके होने वाले ससुर ने तय कर ली और अमित कुमार को बता दी जिससे वे कार्ड वगैरह छपवालें। दुल्हन के कपड़ों के लिए लड़की की मां का फोन आया वसुंधरा के पास कि वह दुल्हन की किसी भी पोशाक को लेकर परेशान नहो , लड़की फैशन डिजाइनर है अपने कपड़े अपनी पसंद के स्वयं बनवा लेगी। बस एक-दो जो आभूषण देने हो वो अपनी पसंद के बनवा लें ‌।

घर में बेटे की शादी , और ना कुछ चहल-पहल ना किसी काम की व्यस्तता दिख रही थी। बहुत ही साधारण समारोह के बाद बेटा-बहू घर आ गए। तीन दिन बाद बहू के दादाजी भी अस्पताल से ठीक होकर अपने घर पहुंच गए। वसुंधरा को समझ नहीं आया नियती ने मजा़क किया या लड़की वालों की कोई साजिश थी , परंतु वह ठगी सी रह गई। मध्यम वर्गीय परिवार बच्चों के विवाह में ही सारी उम्र धूम-धड़ाके का सपना संजो कर बैठा रहता है, लेकिन अमित कुमार बड़े प्रसन्न थे इतने कम खर्चे में शादी हो गई।

बहु-बेटे ने हनीमून के लिए एक हफ्ते का विदेश भ्रमण का कार्यक्रम बनाया। वसुंधरा बड़बड़ा रही थी पति के सामने ,” नई-नई नौकरी है , इतना लुटाने को क्या हो रहा था। ”

अमित कुमार लापरवाही से बोले ,” करने दो मन की, दोनों ने आधा आधा ख़र्चा बांट लिया है।बहू भी अच्छा खासा कमाती है , शशांक के बराबर ही वेतन है उसका।” वसुंधरा को लगा गृहणी तन मन लगा देती है परिवार में प्यार और देखभाल उलीचने में लेकिन कमाने वाली औरतों का पलड़ा शायद फिर भी कहीं न कहीं भारी रहता है।बहू के आने की उतनी खुशी नहीं हो रही थी जितनी होनी चाहिए थी ऐसा लग रहा था बहू उसके एक क्षत्र राज में सेंध लगा रहीं थीं।

मां थी बेटे की कुशलक्षेम पूछने के लिए फोन मिला ही लिया ‌

” फोन क्यो नही किया?”

बस मम्मी मैं और तृप्ति जरा घूमने चले गए…”

” तृप्ति ने तो याद दिलाया था मैं ही…”

“तृप्ति आपके लिए पर्स खरीद रही है ,आपकी पसंद का रंग जानना चाहतीं…”

“तृप्ति यह कह रही…”

तृप्ति वह कह रही है…”

बेटा तो बस बहू के नाम की माला ही जपता रहता है रात दिन। वापस आएं दोनों तो इतने खुश कभी वहां के वृतांत सुनाते तो कभी वहां से लाएं  हुए तोहफे दिखाते। अमित कुमार और बेटी आशा उनकी खुशी में प्रसन्नता से शामिल हो रहे थे लेकिन वसुंधरा की ईगो उसे पीछे धकेल रही थी।

अगले दिन रविवार था बहू की पहली रसोई थी, वसुंधरा को पूरा यकीन था आजकल की लड़कियों को खाना बनाना कहां आता है,अब शायद बहू उससे कुछ कहेंगी,मदद मांगेगी ‌। लेकिन तृप्ति ने बड़े आत्मविश्वास से कहा रसोई वह संभाल लेगी और उसने वसुंधरा को आराम करने की सलाह दी।

खाना न केवल स्वादिष्ट बना था बल्कि टेबल पर परोसने का अंदाज भी खूबसूरत था। सब उंगली चाटते रह गए और तारीफ भी दिल खोलकर करते रहे। अमित कुमार ने नेग देते हुए कुछ अधिक ही प्रशंसा कर दी। तृप्ति बहुत खुश थी बाद में सास के साथ रसोई संगवाते हुए बोली :” मम्मीजी आपने नहीं बताया खाना कैसा लगा?”

वसुंधरा के न चाहते हुए भी स्वर में तल्खी आ गई, बोली :” इतना तेल और तीखे मसाले हो तो खाना जायकेदार लगता ही है ‌ बात तो तब है जब खाना स्वाद और सेहत दोनों को ध्यान में रखकर बनाया जाए।” । तृप्ति को सास की बात ताना प्रतीत हुई,मन में विचार दृढ़ हो गया कि सास को बस चिढ़ने के अलावा और कुछ नहीं आता।

शशांक की तबादले की अर्जी मंजूर हो गई थी,उसको दो तीन दिन के लिए हैदराबाद जाना था। अभी तृप्ति की छुट्टियां थी,मन तो शशांक के साथ जाने का कर रहा था लेकिन इतने कम समय के लिए हवाई यात्रा पर इतना खर्चा करके जाने में शशांक को कोई तुक नज़र नहीं आईं। वैसे भी औपचारिकता पूरी करने में व्यस्त रहेगा, घूमने फिरने का समय तो होगा नहीं, उसने इंकार कर दिया।  ‌

तृप्ति की मन नहीं हुआ तीन दिन शशांक के बिना ससुराल में रहने का , कौन सास का फूला हुआ मुंह देखता रहे। वह अपने मायके चली गई, और जब आई तो आफिस जाना शुरू कर दिया। उसे लगा यह सही है कम से कम बोलो सास से, अपने काम से काम रखो, बेकार मन मुटाव की कोई नौबत ही न आने दो।

एक दिन खाना खाने के बाद सब टीवी देख रहे थे तब आशा तृप्ति से बोली :” भाभी मेरे कालेज में फेस्ट होने वाला है,इस बार फैशन शो भी होगा। मेरे लिए कोई ऐसी ड्रेस डिजाइन कर दो कि मिस कालेज का खिताब मुझे ही मिल जाए ‌‌। अभी तक मैं कितनी भी मेहनत से ढूंढ कर कपड़े लातीं हूं थोड़े उन्नीस ही लगते हैं आगे से आप कपड़े चुनने में मेरी मदद करना। “वसुंधरा को यह सुनकर बहुत बुरा लगा ‌। सारा दिन आशा की पसन्द के कपड़े लेने के लिए बाजारों की खाक छानती थी और आज ऐसा कहकर आशा ने सारी मेहनत पर पानी फेर दिया। अब जब समय होता ननद भाभी लैपटॉप में सिर घुसाए बैंठी रहती , फिर दोनों ने मिलकर कपड़ा खरीदा‌। तृप्ति ने अपने फैशन हाउस के दर्जी से पौशाक बनवा दी। पौशाक निसंदेह सुंदर बनी थी लेकिन खर्चा सुनकर वसुंधरा के तन बदन में आग लग गई। हमेशा बजट की लटकती तलवार की धार से बचते बचाते खर्च करने वाली गृहणी को सात हजार एक पौशाक पर खर्च करना अखर गया। ‌आशा इतनी खुश थी चहकते हुए सब को अपनी ड्रेस दिखा रही थी ‌।जब प्रशंसा करने की उसकी बारी आई तो मुंह से जो बोल फुटे ,बहू को तीर से चुभ गए।

“सात हजार में तो बाजार से बनी-बनाई एक से एक ड्रेस मिल जाती ,तारीफ तो तब होती जब कम से कम खर्चे में यह ड्रेस तैयार होती।”

आशा तो खैर खिताब जीत गई लेकिन तृप्ति को संतुष्टि नहीं हुई।उसका मन ससुराल से उखड़ने लगा था। शशांक को कंपनी के काम से एक हफ्ते के लिए दूसरे शहर जाना था, तृप्ति ने निश्चय किया वह शशांक के पीछे से इस घर में एक दिन नहीं रहेगी ‌। अगले दिन ही सास को बताकर वह अपने मायके चली गई।

तेजस्विनी को पुत्री का एक महीने में दूसरी बार आना कुछ जंचा नहीं । ऐसे तो कभी पैर जमा भी नहीं पाएंगी ससुराल में, फिर भी अपनी चिंता प्रकट किए बिना बोली ,” कैसा चल रहा है । सासूमां बड़ी अच्छी है जो तुझे बार बार मायके भेज देती है।”

तृप्ति :” उनसे मैंने पूछा नहीं बता दिया था मैं जा रही हूं।”

तेजस्विनी :” क्या हुआ मन नहीं लग रहा है वहां?”

तृप्ति :” नहीं मम्मी ऐसी कोई बात नहीं है, और सब तो ठीक है वहां पर पता नहीं मम्मीजी को क्या परेशानी है मुझसे।मैं तो फालतू बोलती नहीं फिर भी ताने मारती रहती है।”

तेजस्विनी :” जिस औरत ने छब्बीस साल तक उस घर को समेट कर रखा हो, अपनी ममता दोनों बच्चों पर लुटाई हो वह इतनी बुरी तो नहीं हो सकती‌। उसकी स्थिति समझने की कोशिश तो करो। वह उम्र के उस मुकाम पर खड़ी है जब औरतें शारीरिक और हार्मोन के बदलाव से जूझ रही होती हैं। दूसरा अभी तक वह उस घर की केन्द्र बिन्दु थी ,हर निर्णय हर काम उनकी इच्छा से होता था अब तुम एक चुनौती बनकर उनके घर में उनके जीवन में प्रवेश कर रही हो‌ ।उनको कुछ समय दो और दो कदम तुम बढ़ाओ उनकी तरफ , फिर देखना मां से भी अधिक प्यार मिलेगा।”

तृप्ति :” यह सही है ,सब कुछ मैं ही करूं।मेरा बनाया हुआ खाना सबको अच्छा लगता है पर वो कहती हैं तेल और मसाले अधिक होते हैं ।”

तेजस्विनी :” तो बेटा ठीक ही तो कह रही थी। अपने पति की शूगर और दिल की बिमारी को उन्होंने संतुलित भोजन से ही नियंत्रित कर रखा है। रोज़ रोज़ मसाले दार भोजन खाने में तो अच्छा लग सकता है पर सेहत के लिए नुकसानदायक है।वो अपने अनुभव से ही यह सब कहती है।”

तृप्ति :” उनको जो ड्रेस मैं ने आशा के लिए बनवाईं थी , बड़ी महंगी लगी थी।”

तेजस्विनी :” हम मध्यम वर्गीय परिवार कैसे सीमित आमदनी में अपनी जरूरतें और इच्छाएं पूरी करते हैं क्या तुम नहीं जानती हो? आशा को खुश करने के लिए तुमने महीने भर का बजट गड़बड़ा दिया तो उनको बुरा लगता ही ‌”

तृप्ति :” शायद आप ठीक कह रही है , तो मुझे क्या करना चाहिए?”

तेजस्विनी :” उनकी परेशानी को समझो, दोनों बच्चों को अब उनकी उतनी जरूरत नहीं है जितनी पहले थी ।वो एक भावनात्मक खालीपन से जूझ रही है,अब उनके पास अधिक कुछ करने के लिए नहीं है। ऐसे में उनकी मदद करों वो अपने लिए कुछ करें, अपने आप पर अपना समय खर्च करें,जो परिवार पालने के चक्कर में यह सब कैसे किया जाता है भूल गईं हैं।उनकी किसी काम  में दिलचस्पी जगाओं जिसमें वे अपनी उर्जा और दिल लगा सकें।”

तृप्ति :” ठीक है मम्मी मैं अब ऐसा ही कुछ करूंगी।” और अपना सामान समेट कर फिर ससुराल चली गई।

तृप्ति के उसी दिन वापस आने पर  वसुंधरा ने तंज कसा :” क्या हुआ मायके में जी नहीं लगा जो आज ही लौट आईं।”

तृप्ति हंसते हुए बोली :” ठीक कह रही हो मम्मीजी वहां मन नहीं लगा ,अब यही अपना घर लगता है।” जवाब सुनकर तीनों के चेहरे खिल गए। अमित कुमार खुश होते हुए बोले :” आजा बेटा पहले खाना खाते हैं ‌”

वसुंधरा ने भरवां टिंडे बनाएं थे, तृप्ति को टिंडों से सख्त परहेज था , लेकिन चखने पर इतने बुरे भी नहीं लगे। उसने तारीफ करते हुए कहा ” वाह मम्मीजी मुझे नहीं मालूम था टिंडों को इतना स्वादिष्ट भी बनाया जा सकता है।”

वसुंधरा खुश हो गई तुरंत दो तीन और परोस दिया। अब तृप्ति मन ही मन सोच रही थी :” लो अब तारीफ करना भी मुसीबत हो गया, इतने भी अच्छे नहीं लगते की इतने सारे खा लूं।”

अगले दिन तृप्ति ने निर्णय लिया कि वह घर से ही काम करेगी और  समझेगी की सासूमां सारा दिन क्या करती है , कैसे रहती है ।

एक दो दिन में ही तृप्ति को पता चल गया कि वसुंधरा को जोड़ों के दर्द की परेशानी रहती है और दिन में कई बार स्वयं ही तेल मालीश करती रहती है। सारा दिन करने को कुछ खास काम नहीं था इसलिए बोरियत महसूस करती थी । कोई सहेली भी नहीं थी ऐसी जिसके साथ समय व्यतीत कर सके। इतने सालों से परिवार को प्राथमिकता देने के चक्कर में कोई सामाजिक दायरा नहीं था। तृप्ति ने पता किया सुबह कलोनी के पार्क में सामुहिक योग होता है। वसुंधरा जानती थी लेकिन अकेले जाने का उसका मन नहीं करता ‌था। उसके ना-नुकुर करने के बावजूद तृप्ति उसे सुबह पार्क ले कर जाने लगी। उसे स्वयं भी प्रात:की ताज़ी हवा में योगा करना और बाद में थोड़ा टहलना बहुत अच्छा लगा ।

दो हफ्ते में वसुंधरा को भी शरीर में हल्कापन और लचीलापन महसूस होने लगा। बहू के साथ कुछ अकेले समय बिताया और बातें करने से लगा बहू इतनी बूरी भी नहीं जितनी वो समझती थी। काफी चाय देने के बहाने वो तृप्ति के आसपास घूमती रहती कि आखिर बहू लैपटॉप में करती क्या हैं। एक दिन तृप्ति ने ही पूछ लिया ” मम्मीजी आपकी कोई हॉबी तो होगी , बताओं न क्या करना अच्छा लगता है आपको?”

वसुंधरा :” शादी से पहले ही मुझे पेंटिंग का बड़ा शौक था लेकिन शादी के बाद एक तो समय नहीं मिलता था और दूसरे रंग इतने महंगे होते हैं। शुरू से ही हाथ इतना तंग रहता था कि इस तरह के खर्चों पर नियंत्रण रखना पड़ता था ‌‌।”

तृप्ति :” आप अब दिन में बिल्कुल खाली रहती है , छोटा-सा पेंटिंग का कोर्स कर लो ,कुछ पुराना याद आ जाएगा और कुछ नया सीखने को मिलेगा।”

वसुंधरा :” नहीं बेटा इस उम्र में यह सब करते बड़ा अजीब लगता है ,लोग भी क्या कहेंगे। फिर पता नहीं शरीर से होगा कि नहीं , इतनी देर कहां बैठा जाएगा।”

तृप्ति :” एक बार कोशिश तो करो , नहीं होगा तो छोड़ देना और होगया तो हो सकता है आपको अच्छा लगने लगे।”

वसुंधरा स्वयं ऐसा कुछ करना चाहती थी लेकिन हिम्मत नहीं होती थी। जब तृप्ति ने बार बार कहा तो उसे लगा एक बार करके देखने में क्या हर्ज है। कुछ दिनों में ही उसे आनन्द आने लगा ,रोज़ सुबह उठते हुए उसे उत्साह रहता कुछ करने की उमंग रहती।जब वह तृप्ति को दिखाती तो वह उन्हें और प्रोत्साहित करती लेकिन फिर वसुंधरा को लगता वह पेंटिंग का करेंगी क्या। तृप्ति ने एक सुझाव दिया कि क्यो न वे कुछ दुपट्टों पर फेब्रिक पेंटिंग करें और उसका फैशन हाउस जो प्रर्दशनी लगा रहा है वहां एक कोने में उन दुपट्टों को भी प्रर्दशित करेंगे।यह सुनते ही वसुंधरा के अरमानों को पंख लग गए बड़े उत्साह से तृप्ति के मार्ग दर्शन में एक एक दुपट्टा बड़ी मेहनत से बनाया।

प्रर्दशनी वाले दिन वसुंधरा बड़ी नर्वस थी, तृप्ति के पास तीन साड़ियां लेकर गईं की कौन सी पहने। तृप्ति को उस समय वो एक छोटी बच्ची सी लगी जो घबरा भी रही थी और उत्साहित भी थी। उसकी आंखें भर आईं, इस उम्र में वे बड़ी निरीह सी लग रही थी।

उसने उन्हें गले लगाते हुए कहा ” मम्मीजी कोई भी साड़ी पहनोगी आप सुंदर लगोगी, फिर भी यह गाजरी रंग की साड़ी पहन लो यह आप पर बहुत सुंदर लगती है।”

तृप्ति को लगा वह बेकार अपना ईगो अड़ा कर बैठी थी , कितनी भोली है वो बस जरा सा मान और समय ही तो चाहती है।

वसुंधरा से अधिक तृप्ति घबरा रही थी कि अगर एक भी दुपट्टा नहीं बिका तो वसुंधरा की आशा टूट जाएगी। उसने अपनी कुछ सहेलियों से कह दिया था कि एक एक दुपट्टा वे खरीद लें लेकिन ऐसी नौबत आई नहीं। दुपट्टे पसंद भी आए और हाथों हाथ बिक भी गए। आगे के कुछ ऑर्डर भी मिल गए। वसुंधरा की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था, वह तृप्ति को एक कोने में ले जाकर बोली :” तू नहीं जानती आज तूने मेरे लिए क्या किया है।सब को सहारा देने वाली मैं आज भावनात्मक रूप से सब पर आश्रित हो रही थी,एक खालीपन से जूझ रही थी। तूने मेरी जिन्दगी को एक नई दिशा दी है। मैं अपने शौक को पूरा करूंगी और कुछ कमाईं करके आत्मनिर्भरता के अहसास को भी महसूस करूंगी ‌”

तृप्ति :” मैंने तो केवल आप को अपना टेलेंट पहचानने में सहायता की है।आप जितना चाहे इस काम को बढ़ा सकती है, साड़ी और टी-शर्ट पर भी अपनी कलाकारी दिखा सकतीं हैं। वसुंधरा :” लेकिन बेटा मैं इतना सब कैसे कर  पाऊंगी।”

तृप्ति :” आप चिंता मत करो , मैं आपकी मदद करूंगी और जब ज्यादा बढ़ जाएगा तो मैं अपनी नौकरी छोड़ कर आपके साथ फुलटाइम काम करना शुरू कर दूंगी।”

वसुंधरा के दिल में अब निश्चिंतता थी कि जिंदगी की सांझ भी खुबसूरती से बीतेगी।

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