कुदरत का पंच

Kudarat Ka Panch

द्वारकानाथ ने सबसे छोटी पुत्री चैताली के लिए वर खोजने में कोई कसर नहीं छोड़ी,प्रत्येक प्रत्याशी में कोई न कोई कमी नजर आ जाती। तीन चार साल की जद्दोजहद के बाद अनूप उन्हें पसंद आया , देखने में राजकुमार सा , किसी विदेशी कंपनी में लाखों का वेतन पाता था, कोई ऐब नहीं ,बस दो भाई और बड़ा सा अपना मकान। दो बच्चों के बाद दस साल के अंतराल में चैताली हुईं थीं,बस लाड़ प्यार में सिर चढ़ा लिया था , किसी को कुछ न समझना उसकी फितरत हो गई थी।

शादी के बाद चैताली बहुत खुश थी, लेकिन धीरे-धीरे उसे कुछ बातें अखरने लगी जो द्वरकानाथ पता नहीं कर सकें थे। अनूप का बड़ा भाई गगन बहुत छोटी सी नौकरी करता था और अक्सर बिमार रहता था , जिसके कारण घर का सारा खर्च अनूप की तनख्वाह से चलता था। अनूप को गगन और बिंदिया के छः साल के पुत्र चिराग से बहुत प्यार था तो उसने उसका दाखिला एक महंगे और बड़े पब्लिक स्कूल में करवा दिया था जिसका सारा खर्चा भी वही उठाता था। यह सब बातें चैताली को नागवार गुजरी ,उसको लगता उसके पति की कमाई पर केवल उसका हक है और इस तरह वह अपने परिवार पर लुटाएगा तो भविष्य के लिए क्या बचेगा। उसका आक्रोश और चिड़चिड़ापन अपने जेठ के परिवार की तरफ बढ़ने लगा। बिंदिया सीधी और समझदार स्त्री थी, चैताली की मनोदशा को समझ रही थी, इसलिए खामोशी से घर का काम करती और चैताली से बहुत सोच समझ कर बोलती। जब चैताली के पुत्र हुआ तो उसने बहुत स्नेह से जच्चा-बच्चा की देखभाल की लेकिन चैताली अपने अंदर उपजती कटूता को कम नहीं कर पा रही थी। उसको लगता जब जेठ की कमाई इतनी कम है तो चिराग को किसी साधारण स्कूल में क्यों नहीं डाल देते या जब देखो तब जेठजी को कोई न कोई तकलीफ़ होती रहती है तो किसी सरकारी अस्पताल में क्यों इलाज नहीं करवाते ,हर बार महंगे अस्पताल में ही क्यों जाते हैं। उसने कईं बार अनूप से जब यह बात की तो पहले वह हंसी में टाल जाता था लेकिन फिर बात शुरू करते ही चिढ़ने लगा और उन दोनों के बीच यह क्लेश का मुद्दा बन गया। उसने साफ कह दिया कि वह अपने बड़े भाई के परिवार को मझधार में नहीं छोड़ेगा और उससे जितनी सहायता बन पड़ेगी वह अवश्य करेंगा।

बच्चों की गर्मियों की छुट्टियों में चैताली की बहन कावेरी एक हफ्ते के लिए अपने मायके और एक हफ्ते चैताली के पास रहने आतीं। उसकी बड़ी बेटी शमिता चिराग की हमउम्र थी, दोनों की बहुत पटती जब भी छुट्टियों में मिलते सारा दिन खेलते और दुनिया भर की बातें करते। चैताली जब अपने दिल की बात कावेरी को बताती तो वह भी अनूप की तरफदारी करती , कहती वह कैसे अपने भाई की परेशानियों को अनदेखा कर सकता है। चैताली चिढ़कर कहती ,”दी तू रहने दें ,यह सब आदर्शवादी बातें किताबी होती है , तुझे अगर जीजू की तनख्वाह किसी और पर लुटानी पड़े तब देखती हूं कितनी भली बन कर रहती है।” कावेरी समझ गई , चैताली को समझाना पत्थर की दिवार पर सिर फोड़ने जैसा है।

अनूप का वेतन अच्छा था लेकिन बढ़ते खर्चें और पत्नी की चिक-चिक से वह परेशान हो गया था ।जब कंपनी की तरफ से पांच साल का विदेश जाने का मौका मिला तो उसने तुरंत हां कर दी। उसे लगा अब अधिक आमदनी होगी तो खर्चों की चिंता कुछ कम होगी और चैताली का गुस्सा शांत रहेगा। चैताली ने सुना तो आगबबूला हो गई पति से इतने साल इतनी दूर रहना उसे गवारा नही था। उसे लगा जेठ के परिवार के कारण उसे पग पग पर कुर्बानियां देनी पड़ रही है। उसे बिंदिया की शक्ल से ही उकताहट होने लगी थी,उसका बस चलता तो वह अनूप के साथ अमेरिका चली जाती ‌। उसका पुत्र सुहास अभी छोटा था और रहने की व्यवस्था करने में अनूप को कुछ समय चाहिए था। वह मन मसोस कर रह गई पति को भारी मन से विदा किया। चैताली के लिए दिन काटने मुश्किल हो जाते , बिंदिया से बात करने का उसका मन नहीं होता था। उधर गगन को जब देखो तब कुछ न कुछ तकलीफ़ रहती कभी बुखार चढ़ता तो उतरता मुश्किल से तो कभी उल्टी दस्त। ज्यादा छुट्टी करनी पड़ी तो नौकरी भी हाथ से गई,अब तो पूर्ण रूप से अनूप पर आश्रित हो गये।

बिंदिया को बहुत संकोच होता देवरानी से पैसे मांगने में लेकिन क्या करती मजबूरी थी । फिर गगन की कमजोरी बढ़ती जा रही थी, उसे खाया पिया बिल्कुल नहीं लग रहा था बिंदिया की चिंता बढ़ती जा रही थी। चैताली का व्यवहार दिन पर दिन रूखा होता जा रहा था, उसके मन में बिंदिया के लिए सहानुभूति नहीं थी।वह बिंदिया की परेशानी को न समझ कर उस पर झल्लाती रहती। आखिर दिल कड़ा कर बिंदिया ने चैताली से कहा कि एक बार गगन के सारे टेस्ट करवाले, कहीं अन्दर ही अन्दर शरीर में कोई बड़ी बिमारी ने बन गई हो। चैताली को बहुत गुस्सा आया, जानती थी अच्छा खासा मोटा बिल आएगा और कोई बड़ी बिमारी निकल गई तो इलाज भी करवाना पड़ेगा। उसको लगा बस बहुत हो गया ,अब जेठ के परिवार से किसी भी तरह पीछा छुड़ाना पड़ेगा  आखिर कब तक उनकी सहायता करती रहेगी।
उसने बिंदिया के समक्ष एक शर्त रख दी कि वह जेठ का फुल बाड़ी चेक अप करवा देंगी और कुछ परेशानी सामने आई तो इलाज भी करवा देगी लेकिन गगन को मकान का अपना आधा हिस्सा चैताली के नाम करना होगा। गगन को यह शर्त  बिल्कुल मंजूर नहीं थी , उसे लगा उसे कुछ हो गया तो बिंदिया और चिराग कहां जाएंगे । लेकिन बिंदिया को उस समय केवल पति की सेहत की चिंता थी , उसने कह सुन कर गगन से मकान चैताली के नाम करवा दिया।

चैताली के चित को बड़ी तसल्ली हुई। गगन के दुनिया भर के टेस्ट हुए, और अन्त में रिपोर्ट से निष्कर्ष निकला कि गगन को कैंसर है। बिंदिया तो सुन कर अंदर तक हिल गयी, गगन भी चिंता के कारण सुन्न सा हो गया,पल्ले पैसा नही  और इतनी भंयकर खर्चीली बिमारी। इससे भी अधिक चिंता उसे बिंदिया और चिराग की हो रही थी। अनूप को जब फोन पर पता चला तो सकते में आ गया,इतना दुखी हुआ कि तुरंत भारत आने की सोचने लगा। फिर लगा आने जाने में पैसा खर्च करेगा, उससे अच्छा तो भाई के इलाज में लगे वह पैसा तो ठीक रहेगा। वह मन मारकर रह गया, लेकिन रोज़ फोन करके, चैताली से एक एक जानकारी अवश्य लेता। वहां डाक्टर से भी गगन की  रिपोर्ट दिखाकर सलाह लेता।

गगन का इलाज चल रहा था उसका शरीर बहुत कमजोर हो गया था , उसे बिल्कुल उम्मीद नहीं रही थी वह ठीक हो जाएगा। बिंदिया मानसिक और शारीरिक रूप से बहुत थकान महसूस करने लगी थी और चैताली के लिए पैसों की व्यवस्था करना बहुत कठिन हो रहा था।
कितना पैसा लग चुका था और किमोथेरेपी जैसे महेंगे इलाज के लिए और पैसा चाहिए था। चैताली को कुछ पैसा अपने पिता से उधार लेने पड़े। चिराग अपने पिता की हालत देखकर बहुत डरा सहमा रहता ,बस किसी तरह पिता ठीक हो जाएं यही कामना करता रहता। गर्मियों की छुट्टियां थी , कावेरी अपने तीनों बच्चों के साथ आई थी एक हफ्ते के लिए। शमिता चिराग को ढूंढ रही थी ,सारा घर छान मारा वह कहीं दिखाई नहीं दिया। फिर बगीचे के एक कोने में बैठा हुआ दिखाई दिया, सुबक रहा था । शमिता को देखते ही आंसू पोंछ कर खड़ा हो गया अंदर जाने के लिए। शमिता ने हाथ पकड़ कर उसे रोका और स्वयं उसके पास बैठ गई। उसकी आंखों में सहानुभूति देखकर चिराग कांपते स्वर में बोला,” मुझे बहुत डर लग रहा है , पापा बहुत बिमार है।” इतने दिनों से चिराग बहुत अकेला महसूस कर रहा था , दिमाग में डर और चिंता ने डेरा जमा रखा था लेकिन किसी के पास समय नहीं था उसकी बात सुनने का । मां जब घर होती तो इतनी थकी और उदास होती कि वह कुछ कह नहीं पाता और चाची से बात करने की उसकी कभी हिम्मत ही नहीं हुई। अब शमिता के साथ बैठा वह अक्सर अपने पापा की बातें याद करता , कितना प्यार करते हैं उससे, कैसे उसके लिए तोहफे लाते और उसे घुमाने ले जाते।

एक हफ्ता बीत गया था कावेरी को आए हुए, और गगन की तबीयत संभल नहीं रही थी । आखिर डाक्टर ने जवाब दे दिया और गगन का निधन हो गया। कावेरी ने अपना जाना स्थगित कर दिया अनूप भी आया और गगन का अंतिम संस्कार कर दिया गया। इस बीच शमिता चिराग का बहुत ध्यान रखती, उसके खाने पीने का और जरूरतों का । हर समय उसके पास बैठी रहती ,वह अपने पिता को याद करके रोता तो चुपचाप सुनती रहती, और कभी कभी उसके दुख से दुखी हो कर स्वयं भी रो पड़ती। दोनों के दिल के तार ऐसे जुड़ गए कि कईं बार बिना बोले ही दोनों एक दूसरे की मन की बात समझ जाते।

पन्द्रह दिन बीत गए थे अनूप भी वापस अमेरिका चला गया था। घर में अजीब सी खामोशी बिखरी हुई थी, चैताली ने बिंदिया से कह दिया कि एक हफ्ते में वह घर छोड़ कर कहीं और चली जाएं। बिंदिया तो यह बात सुनकर अवाक रह गईं और कावेरी को चैताली का यह रवैया अच्छा नहीं लगा। उसने अकेले में चैताली को समझाते हुए कहा,” तेरा दिमाग खराब हो गया है,एक बेसहारा विधवा औरत को तू घर से निकाल रही है।”

चैताली :” क्या करूं,इस औरत ने जोंग की तरह खून चूसा है मेरा। आज हमारे एकाउंट में एक पैसा नहीं है अपने और बच्चे के भविष्य के लिए, कहने को इतना अच्छा पैकेज मिलता है अनूप को।अब इस औरत को एक मिनट भी बर्दाश्त नहीं कर सकती अपनी आंखों के सामने।”
कावेरी :” बिंदिया स्वाभीमानी औरत है ,यह उसकी मजबूरी है कि उसे तुम पर आश्रित हो कर जीना पड़ रहा है ।”
चैताली :” अब यह घर मेरे और अनूप के नाम है इसलिए अब उसके यहां रहने का कोई मतलब नहीं है।”
कावेरी :”मकान तूने बिंदिया की मजबूरी का लाभ उठाकर अपने नाम कराया है। ठीक है तू ने इलाज पर खर्च करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन मकान की कीमत के हिसाब से वह बहुत कम पैसे थे ‌‌। भगवान से डर ,एक विधवा की आह मत ले,यही जाने अनजाने किए गए पाप हमें भुगतने पड़ते हैं।”

लेकिन चैताली पर इन बातों का कोई असर नहीं हुआ। चिराग ने सुना तो हतप्रभ रह गया, उसके दिमाग में सवालों की झड़ी लग गई,भला अपना घर क्यो छोड़ेंगे, कहां जाएंगे? पिता के जाने से वह बहुत दुखी था और अब घर भी छूट जाएगा जहां उनकी यादें बिखरी पड़ी थी। बिंदिया परेशान थी कि कहां जाएगी अपने पुत्र को लेकर लेकिन समझ रही थी चैताली इतना उक्ता चुकी है ,उससे गुहार करने का मतलब है अपने स्वाभिमान को बिल्कुल ही कुचल देना। एक हफ्ते क्या इंतजार करना उसने अपना थोड़ा बहुत जो भी समान था समेट लिया और चलने की तैयारी कर ली।

सब कुछ इतनी जल्दी हो रहा था चिराग और शमिता को समझ नहीं आ रहा था क्या करें। जब बिल्कुल ही बिंदिया दो सूटकेस लेकर चिराग का हाथ पकड़ कर बाहर जाने लगी तो शमिता ने जल्दी से एक कागज पर अपने घर भोपाल का फोन नं लिख कर  चिराग के हाथ में थमाते हुए कहा ,” जहां भी जाओ , किसी भी तरह मुझे फ़ोन जरूर करते रहना अपने बारे में बताने के लिए ,हमारा संपर्क नहीं टूटना चाहिए।”
रोते हुए चिराग ने वह कागज अपनी जेब में डाल लिया। कावेरी ने एक बार और चैताली को समझाने की कोशिश की लेकिन चैताली ने अपना दिल पत्थर का  कर लिया था। वह कमरे से बाहर तक नहीं निकली। कावेरी का फिर वहां मन नहीं लगा ,एक दो दिन में अपने बच्चों को लेकर वह भी भोपाल चली गई।

बिंदिया चिराग को लेकर अपने मायके कानपुर आ गयी , जहां उसका बड़ा भाई गिरधर किसी स्कूल में अध्यापक था ।तीन बच्चों का लालन-पालन उसके लिए भारी पड़ रहा था,दो और का आगमन उसकी पत्नी शालिनी को अखर गया। चिराग को समझ नहीं आ रहा था इस बार मामी और बच्चों के तेवर बदले हुए क्यो है। पहले आता था दौड़ दौड़कर अपने नये खिलौने दिखाते,मामी लाड़ से नये व्यंजन बनाके खिलाती,मामा घुमाने ले जाते। लेकिन अब बच्चें अपना सामान छुपाते , आवश्यकता पड़ने पर एक पेंसिल देने में भी झुंझला जाते ।मामी से अब डिब्बे में रखा एक बिस्कुट भी मांग लेता तो आंखें दिखा देती। पहले मामी मां को कुछ काम नहीं करने देती थी लेकिन अब मां हर काम में हाथ बंटाती तब भी मामी ताने मार देती। जब वह मामी की तरफ गुस्से में देखता तो मां आंखों से खामोश रहने का इशारा करती। बाजार से कुछ भी सामान मंगवाना होता,मामी उसे पढ़ते हुए उठा देती। उसे इस बार मामा के घर बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था। कईं बार मन करता शमिता से फोन पर  बात करने का लेकिन  मामी फोन को हाथ नहीं लगाने देती। उसे एक दो बार फोन के आसपास देखकर सख्त लहजे में बोली,” खबरदार जो फोन को हाथ लगाया ,बिल क्या तेरा बाप भरने आएगा ऊपर से ।” दोनों मां बेटा बहुत रोये थे उस रात।

उधर शमिता का बुरा हाल था ,पांच महीने हो गए थे चिराग का कोई फोन नहीं आया था। वह फोन के आसपास डटी रहती , कहीं चिराग का फोन आया और उसकी बात न हुई तो। वह कल्पना करती चिराग अपनी मां के साथ दर दर की ठोकरें खा रहा होगा न जाने कहां रहता है,क्या करता है , कुछ फिल्मों के दृश्य उसकी आंखों के आगे घूम जाते। उधर गिरधर सपरिवार दो दिन के लिए ससुराल किसी रिश्तेदार के यहां शादी में गया , चिराग को मौका मिल गया। फोन मिलाया तो शमिता के पिता ने फोन उठाया उनकी आवाज सुनते ही उसने फोन काट दिया । वो बड़बड़ाने लगे लोग फोन मिलाते ही क्यों है जब बात नहीं करनी होती है। शमिता को लगा कहीं चिराग का फोन नं हो वह वहीं फोन के पास अपनी किताब लेकर बैठ गई। दो घंटे बाद जब दुबारा फोन आया तो उसने लपक कर फोन उठाया , कोई नहीं बोला तो उसने कहा ,” मैं शमिता बोल रही हूं ,प्लीज अगर तुम चिराग हो तो फोन नहीं काटना।”

उधर से गहरी सांस लेने का स्वर सुनाई दिया फिर चिराग ने बोलना शुरु किया , बताया कि वह मामा के यहां रहता है। सुनकर शमिता को बड़ी शांति मिली लेकिन उसके स्वर में उदासी को भांप गई तो पूछा ,” तुम्हें वहां अच्छा नहीं लग रहा है क्या ? ” चिराग छुपा नहीं सका अपने मन की सारी बातें उसने शमिता को बता दी।

बिंदिया ने बहुत समय से कोई साड़ी नहीं खरीदी थी ,जो पहनती थी वो सब घिस गई थी। गिरधर को शादी में जो टीके के पैसे मिले थे उससे वह बहन के लिए एक  साड़ी खरीद लाया। बस शालिनी ने सारा घर सिर पर उठा लिया, बिंदिया को बहुत बुरा भला कहा।
देर हो रही थी गिरधर उस समय तो स्कूल चला गया,रात को भी देर से आया और सीधे बहन के कमरे में चला गया। बिंदिया उदास बैठी थी,नयी साड़ी एक तरफ पड़ी थी । गिरधर दुखी स्वर में बोला :” कितना अभागा है यह भाई , अपनी बहन की दुख की घड़ी में ठीक से मदद भी नहीं कर सकता है। उस बददिमाग औरत को कुछ कहुंगा तो वह तुझे और बुरा भला कहेंगी। ”

बिंदिया :” भईया भाभी का दोष नहीं है मेरी किस्मत खराब है। पहले देवरानी की सुनती थी अब भाभी पर बोझ बन गयी हूं।”
गिरधर :” मैं तुझे इस तरह अपमानित होते नहीं देख सकता, मैं ने तेरा इंतज़ाम कहीं और कर दिया है। तुझे याद है पिताजी से पढ़ने वह शिशिर आता था , कितनी मार खाता था ,उसका बहुत बड़ा शोरुम है रेडीमेड गारमेंट्स का। मैं ने उससे बात कर ली है,तू वहां सेल्स गर्ल की नौकरी करेंगी और शोरूम के ऊपर एक छोटा सा कमरा है तू वही रहेगी। शिशिर मदद करना चाहता है , पिताजी की बहुत इज्जत करता था कमरे का कोई किराया नहीं लेगा। धीरे धीरे तू कारीगरों से सिलाई भी सीख लेना तेरी आमदनी बढ़ जाएगी। ”

बिंदिया तुरंत तैयार हो गई,वह बेबसी का जीवन जीते हुए थक गईं थीं। जानती थी परेशानियां आगे भी आएंगी लेकिन अपने कमरे में आकर खुलकर सांस तो ले सकेंगी। शिशिर उसका बहुत ध्यान रखता, छोटी बहन की तरह। लेकिन बिंदिया संकोच में रहती, उसे फिक्र रहती शिशिर की बीवी गलत मतलब न निकाल लें। उसका डर निराधार निकला,वह बड़ी हंसमुख और दयालु औरत थी । वह बिंदिया से बड़े अपने पन से मिली। वह शिशिर के लिए दोनों समय का खाना घर से बनवा कर भेजती थी तो उसने बिंदिया और चिराग के लिए भी टिफिन भेजना शुरू कर दिया। बिंदिया ने बहुत मना किया लेकिन वह मानी नहीं। वह अपने बच्चों को कहीं घुमाने या फिल्म दिखाने ले जाती तो चिराग को अवश्य लें जाती।अक्सर उसे अपने घर बुलवा लेती और उसके बच्चों के साथ खेलने में चिराग को बहुत आनंद आता।

बिंदिया के जाने के बाद चैताली दो तीन महीने अपने नायडा वाले घर में रही फिर किरायेदार रखकर अपने पुत्र के साथ पति के पास अमेरिका चली गई। अनूप बहुत खुश हुआ पत्नी और पुत्र का साथ पाकर अब उसे अकेला पन अखरने लगा था। दुसरा उसके मन में चैताली के लिए इज्जत बढ़ गई थी,वह उसका शुक्रगुजार था कि उसने बिना उफ़ किए गगन की बिमारी में पैसा खर्च किया,हर तरह से बिंदिया को सहारा दिया।जब उसने बिंदिया और चिराग के विषय में पूछा तो चैताली ने  झूठ बोल दिया कि उसने आधा घर किराए पर चढ़ा दिया और आधे हिस्से में बिंदिया रहती है। किराए के पैसे से उसका खर्चा चलता है। अनूप निश्चिंत हो गया और चैताली बहुत खुश थी जैसी जिंदगी वह चाहती थी उसे मिल गई। चार साल कैसे निकल गए पता ही नहीं चलें,तीन महीने रह गए थे भारत वापसी के ‌। चैताली का लौटने का मन नहीं था, उसने अनूप से कईं बार आग्रह किया कि वह कोशिश करके कुछ और साल अमेरिका में रहनी की कोशिश कर ले। अनूप नहीं माना , उसे बिंदिया और चिराग की चिंता होने लगी थी, उसे समझ नहीं आता था कि उन दोनों से उसकी कभी भी बात क्यों नहीं पाती जो भी सूचना मिलती चैताली के माध्यम से ही मिलती। उसने भारत लौटने की ठान ली थी।

क्रिसमस की लम्बी छुट्टियां थी अनूप ने लौटने से पहले एक हफ्ते का घूमने का कार्यक्रम बनाया। चारों तरफ बर्फ़ ही बर्फ़ तीनों को बहुत मज़ा आया। लौटते समय गाड़ी चलाते हुए अनूप की झपकी लग गई और गाड़ी इतनी तेज गति में थी कि संतुलन बिगड़ने से दूसरी गाड़ियों से टकरा गई।भयानक दुर्घटना घटी ,कईं लोगों को चोटें आई, लेकिन अनूप और उसका बेटा तो जीवन से हाथ धो बैठे।

चैताली को बहुत चोट आई थी,एक हाथ और एक पैर की हड्डियां टूट गई थी, अस्पताल में ही होश आया था। जब पति और पुत्र के बारे में पता चला तो बहुत दुखी हुईं , बिस्तर पर पड़ी रोती रहती। कुछ भारतीय दोस्त थे जो बारी बारी से देखभाल करने आते। तीन महीने बाद यात्रा करने लायक हुई तो वापस भारत आयी , बहुत ठगा हुआ सा और अकेला महसूस कर रही थी। दो महीने के लिए कावेरी उसके पास आकर रूकी अपने बच्चों को पति के साथ भैपाल छोड़ कर आईं थीं। एक दिन कावेरी ने समझाने के उद्देश्य से कहा :” इतने बड़े घर में तू बिल्कुल अकेली रहेगी, मेरी मान अपनी जेठानी और उसके पुत्र को बुला ले तेरा समय भी कट जाएगा और तूझे सहारा भी मिल जाएगा। ”

चैताली गुस्से से बिफर पड़ी :” नाम मत लो उस नागिन का, उसकी हाय ने उजाड़ दिया मेरा संसार , हमेशा जलती थी मेरी बढ़ती देख कर।” कावेरी ने फिर इस विषय पर कुछ नहीं कहा दो ढाई महीने रहकर वह अपने घर लौट गईं।
धीरे धीरे चैताली ने आसपास सामाजिक कार्यक्रमों में भाग लेना शुरू कर दिया, मंदिर के हर आयोजन में सहयोग देती और शीघ्र ही कईं संस्थाओं की सदस्या बन गई। बिंदिया को शोरूम में काम करते करते परिधानों के विषय में अच्छी जानकारी हो गई।समय निकाल कर उसने फैशन डिजाइनिंग का डिप्लोमा कर लिया। कुछ आमदनी बढ़ी तो दो कमरों का फ्लेट किराए पर ले लिया और चिराग की जिद पर फोन भी लगवा लिया। अब चिराग और शमिता को फोन पर बात करने में कोई परेशानी नहीं रही, घंटों एक दूसरे से मन की कहते। समय अपनी गति से आगे बढ़ रहा था, बिंदिया ने शिशिर और अपने भाई की मदद से एक बुटीक खोल लिया,अब वह रात दिन उसमें व्यस्त रहती और चिराग भी जितना हो सके मदद करता।

चिराग इंजीनियरिंग कर रहा था कईं बार मन हुआ शमिता से मिल कर आने का लेकिन मुमकिन न हो सका। मामा की तबीयत खराब रहने लगीं थीं और उनके बच्चों ने किनारा कर लिया था। चिराग ही उनकी दवा और इलाज का ध्यान रखता, हफ्ते में दो तीन बार अवश्य जाता , उनके बाजार ,बैंक और इधर उधर के काम कर आता। मां का बुटीक में भी हाथ बंटाता, कपड़े लाना, एकाउंट देखना , आवश्यकता पड़े तो आर्डर की डिलीवरी करना और फिर पढ़ाई पर भी पूरा ध्यान देता। चिराग आगे एम बीए करने के लिए परीक्षा दे रहा था और शमिता भी कोशिश कर रही थी दाखिले की। दोनों ने सलाह मशविरा और यत्न करके नोएडा के एक ही कालेज में दाखिला ले लिया। चिराग ने रहने की व्यवस्था पी जी में की तो चैताली ने जिद करके शमिता को अपने पास ठहरा लिया। दोनों ने फोन पर पहले से ही निश्चित कर लिया था कि प्रथम दिन कक्षा में जाने से आधे घंटे पहले कालेज के बाहर कैफेटेरिया में मिलेंगे।

दोनों की धड़कनें बहुत तेज हो रही थी, पहली मुलाकात कैसी रहेगी,क्या कहेंगे,सोच सोचकर दोनों नर्वस हो रहे थे और उत्साहित तो थे ही। शमिता की नजर दूर से ही कैफे के बाहर खड़े नौजवान पर पड़ी तो विश्वास नहीं हुआ , चिराग कितना स्मार्ट दिखने लगा है। उधर चिराग की भी यही प्रतिक्रिया थी जब उसने शमिता को देखा , दुबली पतली, सुनहरे बाल कितनी हसीन लग रही थी । दोनों आमने-सामने खड़े थे लेकिन संकोच के कारण मुंह से बोल नहीं फूट रहे थे , वैसे फोन पर घंटों बातें करते थे। आखिर चिराग ने पहल की :” चलो बैठ कर काफ़ी पीते हैं।” शमिता ने हां करते हुए नजरें झुका ली। दोनों दोस्ती से अधिक एक दूसरे के प्रति जबरदस्त खिंचाव महसूस कर रहें थे। बहुत मुश्किल से पहले दिन दोनों समय से कक्षा में पहुंच पाए। अब दोनों का यह रोज का क्रम बन गया था , सुबह थोड़ा  जल्दी निकल कर एक दूसरे से मिलते ,कक्षा में साथ बैठते , शमिता अपने टिफिन में चिराग के लायक भी लेकर आती और छुट्टी के बाद भी कुछ देर साथ समय बिताने के बाद विदा लेते।

चैताली को बैचेनी रहती शमिता समय से घर क्यों नहीं आती। उसको अब अकेला पन अच्छा नहीं लगता था। शमिता भले ही पढ़ाई करती रहें , चैताली को तो घर में उसकी उपस्थिति ही सुकून देती। डेढ़ साल बीत गए थे और चैताली को चिंता होने लगी कि पढ़ाई खत्म होते ही शमिता भोपाल चली जाएगी। उसे अब मृत्यु और बिमारी का भय सताने लगा था , कहीं वह रात को अकेली हुईं और उसकी तबीयत खराब हो गई तो कैसे अपने आप को संभालेंगी। वह शमिता को लम्बी छुट्टी होती तो भोपाल भी नहीं जाने देती। शमिता के पास रात को तब तक बैठी रहती जब तक वह सो नहीं जाती। उसके लिए तरह तरह के व्यंजन बनाती , खरीददारी करती, उसकी सुविधाओं का ध्यान रखती। चैताली शमिता पर भावनात्मक रूप से अश्रित हो गई थी जबकि शमिता को कईं बार एकांत न मिलने से परेशानी होती। वह चिराग से बात करना चाहती लेकिन चैताली उसके आगे पीछे घूमती रहती। चिराग ने अपने प्रेम का इजहार तो कर दिया था ,बस दोनों का पढ़ाई पूरी करके नौकरी मिलते ही शादी करने का विचार था।

दोनों जानते थे कि इस रिश्ते को बड़ों का सहयोग और आशीर्वाद नहीं मिलने वाला इसलिए विवाह करने के बाद सूचना देने का इरादा था दोनों का। शमिता का जन्म दिन था और शमिता, चिराग ने उसी दिन जाकर कोर्ट में शादी कर ली। उधर चैताली कईं दिन से वकील से कागजात तैयार करवाने में लगी थी। उसने निश्चय किया था इस बार जन्मदिन पर शमिता को हैरान कर देगी। कावेरी भी सपरिवार आयी हुई थी ,बेटी की  जन्मदिन की खुशी में घर में एक छोटी सी पार्टी का आयोजन किया था, कुछ और मेहमान भी बुलाएं हुए थे। जब शादी करके शमिता चिराग के साथ घर पहुंची तो सब जोर से चिल्ला कर जन्मदिन की शुभकामनाएं देने लगे। चैताली ने उसे गले से लगाया और कागजात पकड़ा दिए। तभी सब का ध्यान चिराग पर गया , शमिता ने परिचय कराते हुए कहा उन दोनों ने शादी करली है। चिराग ने आगे बढ़ कर चैताली के पांव छूकर कहा :” चाची आप कैसी हैं?” चैताली हतप्रभ सी खड़ी चिराग को देख रही थी तभी शमिता ने उन कागजों के बारे में पूछा जो उसके हाथ में थे। चैताली वहीं सोफे पर धम्म से बैठते हुए बोली ,” ये मकान के कागजात है , मैंने मकान और अपनी सारी जायदाद तेरे नाम कर दी है।”

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