मां की पाती

Maa Kee Paatee

पति के गुजरने के बाद से सुमित्रा पांच साल से अकेली गाजियाबाद में रह रही थी ।पुत्र अपने परिवार के साथ हैदराबाद रहता था ।अब अकेले रहने में थोड़ी परेशानी महसूस होने लगी थी तो बेटे ने फोन पर कह दिया था  जरूरत का सामान बांध लेना और अब उसके साथ हैदराबाद में ही रहना।ले जाने का सामान छांट अवश्य रही थी लेकिन बहुत घबराहट थी। बहु को उसके परिवार का हिस्सा बने सात साल अवश्य हो गये थे लेकिन उससे  भावनात्मक रिश्ता नहीं जुड़ पाया था।साल में एक बार बहू बेटा छुट्टी लेकर आते थे दस दिन के लिए , छः दिन बहू के मायके में बीतते थे दोनों के। वह स्वयं एक महीने के लिए हैदराबाद जाती अवश्य थी लेकिन बिल्कुल मन नहीं लगता था। दोनों बहू बेटे सुबह ही नौकरी के लिए निकल जाते और उसके लिए सारा दिन कटना मुश्किल हो जाता। जब पोता हुआ था वह बहुत खुश थी कि उसके साथ उसका समय अच्छा कट जाएगा लेकिन बहू ने छः महीने के बच्चे को क्रेश में छोड़ना शुरू कर दिया था। सुमित्रा के  वहां होने पर भी बहू ने बच्चे को घर पर सुमित्रा के पास छोड़ने से इंकार कर दिया यह कहकर कि बच्चे की दिनचर्या मत बदलो बाद में तंग करेगा।

अब शेष रह गईं जिंदगी बहू बेटे के साथ काटने के विचार से मन बैठा जा रहा था लेकिन मजबूरी थी। कागज संभालते हुए उसकी नजर एक पत्र पर पड़ी। याद आया पैंतीस साल पहले जब ससुराल आ रही थी तब भी ऐसी डरी हुई थी , मां ने यह पत्र पर्स में डालते हुए कहा था कि जब भी मन घबराएं इसे पढ़ लेना। आज फिर जिंदगी के इस दोराहे पर मां की याद आ रही थी लेकिन अब उनका भी साथ कहां।

लाड़ो, जिंदगी में नया अध्याय प्रारंभ करने जा रही हो , नया माहौल,नये लोगों के बीच स्थान बनाने में कईं बार बहुत समझौते करने पड़ते हैं ‌। वहां तुम्हारे लिए कोई नहीं बदलेगा , तुम्हें ही नये परिवेश में अपने आप को ढालना पड़ेगा | धैर्य और प्रेम के सहारे अपनी जगह बना लोगी  मुझे पूरा विश्वास है । मेरा आशिर्वाद तो हमेशा तुम्हारे साथ है।

जीवन की संध्या में सुमित्रा ने फिर  हिम्मत का दामन पकड़ आगे बढ़ने का फैसला लिया।

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