महंगी

Mahangee

पन्द्रह दिन से लगातार ऑफिस में एक प्रोजेक्ट पर काम करते करते इतना थक गई थी कि एक  दिन की छुट्टी लेना आवश्यक हो गया था। अंकित का टिफिन बनाया, अपने भी दो पराठे सेंक  कर रख दिए। बस  उसके जाते ही सो जाऊंगी और जब भूख लगेगी तब ही उठूंगी ।9:30 बजे अंकित के जाते ही मैं बिस्तर की ओर बढ़ ही रही थी कि किसी ने दरवाजे की घंटी बजाई। अब इस समय कौन पागल दिमाग खाने आ गया होगा। खोला तो मेरी ननद मोनिका थी, चार भाई बहनों में सबसे छोटी इसलिए कुछ अधिक ही लाडली। मुझे देखते ही चहकते हुए बोली ,” भाभी मुझे सुबह ही अंकित भाई ने बताया आपने छुट्टी ली है। मैं बता नहीं सकती मुझे कितनी खुशी है।”

मैं उसे मुंह बाए देख रही थी, मेरी छुट्टी लेने से इसे इतनी प्रसन्नता  क्यों हो रही थी जरूर कोई काम बताएगी  चालू कहीं की।

वह लदी हुई थी, एक हाथ में उसकी बेटी पिंकी दूसरे हाथ में पिंकी का बैग। पिंकी उसकी डेढ़ साल की बच्ची थी। मोनिका एक बुटीक चलाती थी, जहां बहुत महंगी पोशाकें बनवाती थी। मैं केवल ललचा कर रह जाती थी, कभी खरीदी नहीं थी वहां से। मैंने और अंकित ने निश्चय किया था जब तक हमारा स्वयं का मकान नहीं हो जाता और ठोस बैंकबैलेंस ,हम कोई फिजूलखर्ची नहीं करेंगे ।हमारी शादी को छः साल हो गए थे और हम दोनों पागलों की तरह लगे हुए थे अपना लक्ष्य पूरा करने में। चार पांच साल और लग जाएंगे।

मोनिका बोली,” पांच सितारा होटल में पार्टी गाउन की प्रदर्शनी है, मुझे भी मौका मिला है वहां अपने बुटीक के गाउन का प्रदर्शन करने का ।चार-पांच घंटे की बात है, एक बार गांऊन अरेंज कर दूंगी फिर तो मेरी सहायक भी संभाल लेगी।”

मैंने झुंझलाकर कहां ,”हां तो मुझसे क्या काम है।”

वह ऐसे मुस्कुराई जैसे कितना बड़ा राज खोलने वाली हो ,”आप मेरी सबसे प्यारी भाभी हो ,आप बस पिंकी  का ध्यान रख लो । चार पांच घंटे की बात है, वैसे तो वह सोती रहेगी और दो  घंटे में उसे कुछ खिला देना । वह सब मै बनाकर  लाई हूं।

मैंने घबरा कर कहा,” तू पागल हो गई है ,मुझे बच्चों के बारे में कुछ नहीं मालूम ।मैं इतने छोटे बच्चे को इतनी देर तक कैसे संभाल लूंगी। अगर रोने लगी तो मैं कैसे चुप कराउंगी।”

वह मस्का लगाते हुए बोली,” मेरी सास तीर्थ यात्रा पर गई है ,नहीं तो वह संभाल लेती। आप सबसे समझदार भाभी हो इसलिए कह रही हो ।प्लीज प्लीज जो कहोगी करूंगी ।अच्छा बोलो एक गाउन आप को गिफ्ट कर दूंगी।”

मेरे कान खड़े हो गए, घाटे का सौदा नहीं था। चार-पांच घंटे के एवज में मुझे पांच छः हजार की पोशाक मिल जाएगी, और क्या चाहिए। वैसे मैं पिंकी से दो-तीन बार ही मिली थी ,सब इतने व्यस्त रहते हैं, एक शहर में रहते हुए भी  कम ही मिलना होता थे। जब दो महीने हो जाते तो अंकित और उसके भाई बहन अपने परिवार के साथ कहीं भी बाहर खाने का या घूमने का कार्यक्रम बना लेते | मोनिका पिंकी को कम ही लाती थी |

मेरी गर्दन हल्की सी हां में हीली और मोनिका  तुरंत पिंकी को पलंग पर लिटा कर  और बैग को टेबल पर रख भागी।, इससे पहले मेरी मुंडी ना में न हिलने लगे।

मैं पिंकी के बगल में ही लेट गई, सोने का ही तो कार्यक्रम था ,वह तो अब भी हो सकता था ।लेकिन नींद गायब हो चुकी थी, एक तो चिंता कहीं पिंकी गिर ना जाए दूसरे सोते हुए इतनी प्यारी लग रही थी कि निगाहें नहीं हट रही थी। बीच बीच में कुनमुनाती और मैं थपकी देती ,वह फिर सो जाती। नींदों में ही खिसक कर वह  मुझसे लिपट कर सो गई। अब तो झपकी  का मतलब नहीं ,कहीं मेरे भार से ही न दब  जाए। उस की निकटता मुझ में मोह का एहसास बढ़ा रही थी , सुकुन दे रही थी।पता नहीं कितनी देर उसे थामें मैं ऐसे ही लेटी रही।

पिंकी कि जब आंख खुली , वह एक दम से छिटक कर एक तरफ बैठ गई और मुझे टुकुर-टुकुर देखने लगी। मैंने जल्दी से उसके बैग में से एक डिब्बी निकाली, खिचड़ी बनाकर रखी हुई थी मोनिका ने। इसके पहले की वह रोना शुरू कर देती, मैंने जल्दी से गर्म करके उसे खिला दिया।पांच घंटे में उसके साथ ऐसे ही लगी रही और मुझे समय का पता ही नहीं चला। उसका डाइपर तक बदल दिया, मुझे लगा था कि मुझे घिन आएगी लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ ।उस बच्ची ने मेरे अंदर के सोए हुए  ममता के भाव को जगा दिया था। मुझे महसूस हो रहा था आर्थिक स्थिति मजबूत करने के उद्देश में मैं अपने वर्तमान में ऐसे नैसर्गिक  सुख को छोड़ रही हूं,जिसे  बाद में समय निकल जाने पर मैं चाह कर भी प्राप्त नहीं कर पाऊंगी।

जिंदगी बोझिल सी लगने लगी, जिस उद्देश्य को लेकर भागे जा रहे थे, बेमानी लगने लगा ।कल को अपना मकान होगा, गाड़ी होगी और बैंक में पैसा भी होगा लेकिन तब उस उम्र में अपना बच्चा कहां से लाएंगे। तभी घंटी बजी ,मोनिका खड़ी थी, पिंकी को ले जाने के लिए। वह पिंकी को गोद में लेते हुए बोली ,” बहुत बहुत धन्यवाद भाभी, जब चाहो आकर गाउन पसंद कर लेना।”

मैं ने अनमने मन  से कहा ,”अरे तू छोटी है, तुझसे कुछ कैसे ले सकती हुं मैं।”

बहुत महंगी पड़ रही थी उसकी वह पोशाक, मेरी तो जिंदगी के सारे समीकरण बदल गई थी ।

2 thoughts on “महंगी

  1. बहुत बढिया, सुंदर, उद्देश्य पूर्ण एवं सार्थक रचना।

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