मैं ग़लत तो नहीं

Main Galat To Nahin

मैंने मूसलाधार बारिश से बचने के लिए निकटतम रेस्टोरेंट की शरण ली। एक तरफ खड़े होकर जबरदस्त भीड़ का जायजा ले रही थी  किएक जाने पहचाने चेहरे पर नज़र टिक गई। पंद्रह सोलह साल बाद नागेंद्र को देख रही थी, वही खूबसूरत व्यक्तित्व,बस समय ने कुछ लकीरें उभर दी थी चेहरे पर‌। वह बैठने के लिए स्थान तलाश रहा था कि अचानक उसकी नजर मुझ पर पड़ी और बेझिझक दौड़ता हुआ मेरे निकट आ गया। उसके चेहरे के भाव बता रहे थे मुझे देकर कितना हैरान और प्रसन्न था‌ ।कॉलेज में मेरी, उसकी और प्रेमा की तिकड़ी मशहूर थी और वह जुड़ा ही हम से कॉलेज में प्रेमा के प्रेम में पड़कर था ।मेरे संरक्षण और प्रोत्साहन के कारण  तीन साल उन दोनों के बीच प्रेम सरिता निर्बाध बहती रही।विवाह की बात आई तो दोनों के परिवारों ने अड़ंगा डाल दिया ,आर्थिक स्थिति और जात पात को लेकर ।आनन-फानन में प्रेमा के परिवार ने उसका विवाह एक बड़ी उम्र के सजातीय अधेड़ से कर दिया। उन्हीं दिनों मेरे पिताजी को भी कुछ कारणों से वह शहर छोडना पड़ा और मैं नागेंद्र से  मिले बिना चली आई।

प्रेमा ने शादी के चारसाल बाद मुझसे संपर्क किया ,तब वह बहुत दुखी थी। शराबी पति ने बहुत प्रताड़ित किया था, जब एक सड़क हादसे में वह गुजर गया तो प्रेमा ने सहारे के लिए मुझसे संपर्क किया | मैंने अपनी पति की सहायता से एक छोटी सी नौकरी उसको दिलवा दी थी ।लेकिन  उसकी और उसकी पुत्री की आर्थिक तंगी बनी रही ,अकेलापन भी बहुत महसूस करती थी ।जब भी बात करती नागेंद्र का नाम होठों पर आ जाता है और आंखें छलक जातीं ।

रेस्टोरेंट में बहुत शोर था, इसलिए नागेंद्र मुझे खींच कर बाहर बरामदे में ले आया। वहां बारिश की बूंदे तो नहीं टपक रही थीं ,शेड़ पड़ा था। लेकिन हवा बहुत ठंडी थी इसलिए कोई भी वहां नहीं खड़ा था। मैं दीवार से टिक कर खड़ी थी और वह मेरे सामने हाथ बांधकर खड़ा था। बहुत उत्सुक लग रहा था समय के लंबे अंतराल को समेटने के लिए ,”कहां चली गई थी एकदम से,  मिलकर भी नहीं गई?”

मैंने एक लंबी सांस खींचते हुए कहा,” बस यूं ही तू बता कैसा है ?”

उसके होठों की मुस्कान उसकी आंखों तक नहीं पहुंच रही थी ,स्वर भी उदास था,” एकदम से दोनों फ्रेंड जिंदगी से गायब हो जाएं ,वह इंसान कैसा हो सकता है?”

मेरी आंखें फर्श  पर कुछ ढूंढ़ रही थीं,”सॉरी यार एकदम से पता नहीं कैसे सब बिगड़ गया ।”

वह अपने जज्बातों को संभालते हुए बोला ,”कुछ पता है वह कहां है कैसी है?”

मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखते हुए पूछा,” तू अभी भी उसको याद करता है ,क्या शादी नहीं की तूने ?”

वह बहुत भावुक हो रहा था ,”शादी तो मां ने अपनी सेहत का वास्ता देकर करवा दी थी ।लेकिन धड़कनें तो वह ले गई थी अपने साथ ,बस समय काट रहा हूं ।”

मेरा मन प्रसन्नता से भर गया ,प्रेम का दुख मुझसे देखा नहीं जाता था,” तो तू उससे अभी भी प्यार करता है ?”

उसने मेरी दोनों बाहें अपने हाथों से पकड़ी ,मेरी आंखों में आंखें डाल कर बोला,” कुछ भी कर सकता हूं उसके लिए, एक बार पता बता दे सब कुछ छोड़ कर चला जाऊंगा उसके पास।”

मैं उसको प्रेमा के बारे में बताने ही वाली थी कि अनायास मुंह से निकल गया ,”और तेरी पत्नी का क्या होगा, बच्चे भी तो होंगे?”

वह बड़े इत्मीनान  से बोला,” वह बहुत सीधी औरत है ,मैं जैसा चाहूंगा वह मान जाएगी। उसको महीने का खर्चा दे दिया करूंगा।”

मैं प्रेमा को अपनी बहन की तरह प्रेम करती हूं लेकिन उसकी खुशी के लिए किसी और स्त्री का अधिकार भी छीन नहीं  सकती ।फिर मन में विचार आया वह स्त्री भी ऐसे पति के साथ खुश क्या होगी जो किसी और की याद में जीता है ।मुझे इन दोनों को मिलवा देना चाहिए ,शायद नियति भी यही चाहती होगी ।लेकिन नहीं मैं एक औरत होकर एक औरत का अधिकार छीन कर दूसरी औरत को कैसे दे सकती हूं? नियति कीअगर यही मंशा है तो भी मैं बानक नहीं बनूंगी ,उसे कोई और माध्यम ढूंढना पड़ेगा।

नागेंद्र उत्सुकता से मेरे जवाब का इंतजार कर रहा था, मुझे खामोश देख उसने फिर पूछा,” बता न तुझे मालूम है वह कहां है?”

मैंने उसकी आंखों में आंखें डाल कर कहा,” नहीं मैं उसके बारे में कुछ नहीं जानती।”

4 thoughts on “मैं ग़लत तो नहीं

  1. नरेंद्र चूरा पूर्व संपादक दैनिक भास्कर नागौर says:

    Baut उम्दा स्टोरी लिखी है। बहुत ही शानदार।

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