मुस्कुराहट

Muskuraahat

इशानी को जब से फोन पर अपने पिता मनोहर लाल से पता चला कि इस रविवार को लड़के वाले देखने आने वाले हैं, उसकी अजीब मनोदशा हो रही थी। घबराहट हो रही थी कैसे सामना करेगी उन लोगों का जिन्हें वह जानती तक नहीं थी। उत्साहित थी विवाह को लेकर तो लज्जा भी महसूस हो रही थी। दिल्ली से पानीपत का रास्ता भी इसी असमंजस की स्थिति में बीता की कैसे होगा सब कुछ।

इशानी की बुआ लायी थी आभरण का रिश्ता।सात आठ लोग आयें थे, नाश्ता किया, इधर उधर की बातें की और अगले दिन जवाब देंगे कहकर चले गए। इशानी को थोड़ा विस्मय हुआ कि आभरण ने कोई बात ही नहीं की,एक दूसरे की पसन्द नापसंद जानने की कोशिश ही नहीं की। घर में सब को यकीन हो गया कि या तो लड़की पसंद नहीं आई या लेन-देन कम लग रहा होगा इसलिए फटाफट निकल लिए। लड़का इशानी से हर लिहाज से इक्कीस था,एम.टेक करके किसी बड़ी विदेशी कंपनी में अच्छा वेतन पाता था। दिल्ली में तीन मंजिला इमारत थी जिसमें आभरण और उसके दो बड़े भाई एक एक मंजिल पर रहते थे। दोनों भाई शादीशुदा थे, मां बाप आभरण के साथ रहते थे। देखने में भी आभरण किसी हीरो से कम नहीं था इसलिए जब अगले दिन बुआ ने संदेश दिया कि लड़के वालों ने रिश्ते के लिए हां कर दी है तो सबको बड़ा आश्चर्य हुआ। निश्चिंत हुआ कि अगले रविवार को दिल्ली में किसी रेस्टोरेंट में छोटी सी रोका की रस्म रखी जाएगी।

मनोहर लाल सीधा-साधा धार्मिक किस्म का इंसान था। पानीपत में पिता जी से विरासत में मिली दुकान चलाता था और उसके बेटे ने भी बारहवीं उत्तीर्ण करके वहीं बैठना शुरू कर दिया था। मनोहर लाल महत्त्वाकांक्षी नहीं था, दुकान से उसकी अच्छी आमदनी हो जाती थी। फालतू और दिखावे में ख़र्च करने की उसकी आदत नहीं थी , वैसे ही उसके दोनों बच्चे  सादगी से जीवन व्यतीत करने में विश्वास रखते थे। अपनी हैसियत के अनुसार उसने पुत्री के विवाह के लिए आवश्यकता अनुसार जोड़ रखा था।

इशानी के पड़ोस में एक मूक बधिर बच्चा रहता था,जिसकी तरफ घरवालों का रवैया लापरवाही वाला था। वो बच्चा बहुत दुखी रहता था कोई उसकी बात या जरूरतों को समझने की कोशिश नहीं करता था। इशानी उसका बहुत ध्यान रखती थी उसके साथ समय बिताना उसको अच्छा लगता था। लेकिन मन में यह विचार रहता कि अगर वह उसके मन की बात समझ पाती तो कितना अच्छा होता। उसने स्नातक करके विशेष प्रसिक्षण लिया और दिल्ली में किसी एनजीओ में दिव्यांग बच्चों को शिक्षा देने का काम करने लगीं। वेतन तो बहुत कम मिलता था लेकिन संतुष्टि इतनी मिलती थी कि कोई शिक़ायत नहीं थी।

इशानी के मन में बहुत उमंग थी, रविवार तक का समय काटना मुश्किल हो रहा था। बस यही सोचती रही आभरण को क्या क्या बताना है और क्या पूछना है। निर्धारित दिन दोनों पक्षों के निकट संबंधी इकट्ठे हुए और हंसी मज़ाक का दौर चलता रहा। आभरण ने इशानी को देखते ही हेलो कहा और खाने-पीने की व्यवस्था देखने में व्यस्त हो गया। इशानी उसे दूर से देख कर लजाती रही लेकिन वह उसके पास नहीं आया। जब सब खाना खाने बैठे तो आभरण उसके समीप ही बैठा था और एक दो बार जब उसका हाथ आभरण से टकराया तो लगा उसके जिस्म में एक लहर सी दौड़ गई। लेकिन आभरण बिना विचलित हुए अपने फोन पर लगा रहा। सब बहुत प्रसन्न थे , कार्यक्रम अच्छे से संपन्न हो गया था, मनोहर ने सब मेहमानों को लिफाफे देने में कोई कंजूसी नहीं की थी। इशानी का मन बैठा जा रहा था, ऐसी कोई बात या घटना नहीं थी जिसपर वह उंगली रख कर कह  दें यह ग़लत हुआ है लेकिन उसका उत्साह ठंडा हो गया था।

दो दिन बाद आभरण का फोन आया, उसकी आवाज सुनकर इशानी की दिल की धड़कनें तेज हो गई। फोन उठाते ही आभरण अधिकार से बोला :” कैसी हो तुम? उस दिन सब ठीक रहा ना, कुछ कमी तो नहीं लगी?”

वह सकुचाती सी बोली ,” मैं ठीक हूं ,आप कैसे हैं?”

आभरण:” रोका वाले दिन मुझे कोई अच्छा फोटोग्राफर नहीं मिला था तो मैंने अपने दोस्त कबीर को कह दिया था फोटो लेने को। वह शोकिया फोटो खींचता है लेकिन उत्साह में उसने उस दिन दो ढाई सौ फोटो खींच ली। मैं चाहता हूं तुम कोई पच्चीस-तीस फोटो सिलेक्ट कर लो जो सबसे अच्छी हो। मेरे पास समय नहीं है यह सब करने का, आगे के लिए मैं किसी प्रोफेशनल की ही मदद लूंगा। मैं ने कबीर को कह दिया है वह तुम्हें पांच बजे कॉफी हाउस में मिल जाएगा।” और कबीर का फोन नं देकर आभरण ने फोन काट दिया। इशानी अपने मन को समझा रही थी आभरण बहुत व्यस्त रहता है… लेकिन वह पांच बजे खाली होगी यह उसने स्वयं ही निर्धारित कर लिया।

इशानी ठीक समय पर कबीर के सामने बैठी उसके लैपटॉप पर उस दिन की तस्वीरें देख रही थी।वह इस बात से अनजान नहीं थी कि कबीर तीव्र उत्कंठा से उसके चेहरे पर टकटकी लगाए बैठा था , जैसे उसकी समीक्षा पर कबीर का आगे का जीवन टिका हो। कुछ तस्वीरें देखकर ही वह बहुत प्रभावित हो गई थी, उसने कबीर से कहा,” बहुत जीवन्त फोटो है , निसंदेह आप बहुत प्रतिभाशाली हैं।” सुनते ही उसने गहरी सांस ली,लग रहा था सांस रोके बैठा था।

इशानी को हंसी आ रही थी,इसको पता है यह इसमें प्रतीभा है लेकिन तारीफ सुनने के लिए मरा जा रहा है,खैर आत्म बल बढ़ाने के लिए आवश्यक है। वह तस्वीरों को देखने में और उनपर टिप्पणी करने में इतनी मशगूल हो गई कि समय का भान ही नहीं रहा। बीस पच्चीस तस्वीरें उसने छांट दी जो आभरण को भेजने के लिए उपयुक्त लगी। बहुत सारी तस्वीरें उसको इतनी अच्छी लगी कि उसने कबीर से स्वयं के लिए मांग ली। बहुत देर हो गई थी इसलिए कबीर ने अपनी बाइक पर उसे घर छोड़ दिया। कबीर सहज सरल इंसान लगा, दिमाग में कोई जल्दबाजी नहीं। फिर हंसी आ गई यह सोचकर कि उसकी तरह कबीर भी फुरसतिया होगा।

एक दिन होने वाली सासूमां का फोन आया, तैयार रहना बारह बजे फलां मॉल में मिलना, उसकी पसंद की पोशाकें खरीदनी है।परेशानी तो हुईं लेकिन एनजीओ की संचालिका से विनती करके थोड़ा जल्दी निकल कर मॉल पहुंच गईं। सासूमां,आभरण की दोनों बड़ी भाभियां और चाची आईं थीं उसे खरीददारी कराने। चारों ने उसे जैसे ही देखा बस अवाक देखती रह गई,जब उसने मुस्कुराकर कर नमस्ते की तो चारों झेंप कर इधर उधर देखने लगी। वह समझ गयी उसका ड्रेसिंग सेंस उनको रास नहीं आया। वह सूती भारतीय पारंपरिक परिधान अधिक पहनती थी,उस समय उसने लम्बी स्कर्ट,कमर तक की कुर्ती और कईं रंगों को समेटे दुपट्टा पहन रखा था ।कान में लम्बे झुमके तथा कढ़ाई वाला झोला।तीन चार घंटों की जद्दोजहद के बाद पांच पोशाकें ख़रीदीं गयी लेकिन उनमें उसकी पसंद शामिल नहीं थीं।

चारों अपने आप पोशाक निकलवाती, इशानी को पहनवाकर देखती और निर्णय लें लेती कि उस पर कैसी लग रही थी। उसे अपनी स्थिति दरवाजे पर खड़ी बुत जैसी लगी,शायद उसका पहनावा देखकर वो उसकी राय लेकर कोई जोखिम नहीं उठाना चाहतीं थीं। उन्होंने ख़रीदीं हुई पोशाकों में से दो उसे पकड़ा दी अपने साथ ले जाने के लिए। वो बोझिल क़दमों से उनका बोझ लादे अपने कमरे में पहुंची।

ऐसा तो नहीं था पिता जी ने कभी पैसे देने से आनाकानी की हों,वो जब चाहे ऐसी पोशाकें ले सकतीं थीं, बस उसे तड़क-भड़क पसंद नहीं थी, सादगी से जीना अच्छा लगता था। कहीं न कहीं यह आदर्श सोच थीं कि प्रांतीय कारीगरों को प्रोत्साहित और काम देने के उद्देश्य से हाथ की बनी वस्तुओं का इस्तेमाल करना चाहिए। अगले दिन शाम को कबीर को अपने दरवाजे पर खड़ा देखा तो इशानी को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह एक कमरा ले कर पेइंग गेस्ट की तरह रहती थी,कोई रोक टोक नहीं थी किसी के आने जाने की पर उसे स्वयं को ही असहज लगा। दरवाजे पर उसको संकोच में खड़े देखा तो कबीर झेंपता हुआ बोला,” मैं यहां से जा रहा था सोचा फोटो की सीडी आपको पकड़ाता जाऊं ‌|”

वह एक तरफ हो गई , जिससे कबीर अंदर आ सकें लेकिन उसे लगा कबीर फोटो नेट से भी भेज सकता था। जब वह पलटी तो देखा कबीर उसके कमरे का आंखें फाड़े अवलोकन कर रहा था। वह जानती थी कबीर उसके कमरे की साज-सज्जा देखकर ज़ोर से हंसेगा। इशानी को जो वस्तु पसंद आ जाती वह खरीद लेती, उसके कमरे में पांच कुशन्स पांच रंगों और पांच डिजाइन के थे । कोई भी वस्तु आपस में किसी से मेल नहीं खाती थी , रंगों और डिजाइन का इंद्रधनुष था उसका कमरा ‌|

कबीर उसकी तरफ देखते हुए बोला , मैं ने इतनी विविधता लिए हुए आज तक कोई कमरा नहीं देखा। आपके व्यक्तित्व की तरह आपका हर शौक और अदा अनुठी है।” और वह अलग अलग कोणों से कमरे की फोटो खिंचने लगा। फोन की घंटी बजने लगी, होने वाली सासूमां मां का था।कह रही थी ,” परसों हमारे घर पर पूजा और हवन का आयोजन हैं,तुम्हारा आना बहुत आवश्यक है। बड़ी मुश्किल से यह दिन निश्चित किया है,उस दिन आभरण के पास थोड़ा समय है, फिर तो वह बहुत व्यस्त हो जाएगा। शादी पर भी बड़ी मुश्किल से तीन दिन की छुट्टियां मिली है।” इशानी,” लेकिन मम्मीजी परसों मेरे एनजीओ में बच्चों की हस्तशिल्प की प्रर्दशनी है,दो महीनों से सब मेहनत कर रहे हैं उस दिन के लिए। मेरे लिए आना मुश्किल हो जाएगा।”

सासूमां :” तुम भी बेटा कैसी बात कर रही हों,आभरण का लाखों का पैकेज है , उसकी नौकरी बहुत महत्वपूर्ण है । वह इस तरह से छुट्टी नहीं ले सकता , तुम्हें एडजस्ट करना पड़ेगा। और हां उस दिन की तरह बंजारों जैसे कपड़े पहन कर मत आ जाना। कुछ ढंग का नहीं है तो जो दो ड्रेस हमने दी थी उन में से कोई पहन कर आ जाना।” फोन कट गया था , उसने देखा सामने उसकी सहेली मृदुला खड़ी थी।

इशानी :” तू कब आईं?”

मृदुला :” जब तू फोन पर बात कर रहीं थी। ” और उसने सवालिया नज़रों से कबीर की ओर देखा । इशानी ने दोनों का परिचय कराया और कबीर विदा लेते हुए बोला :” बिना आपकी इजाजत के मैंने आपके कमरे की फोटो लीं है, आपको जरूर भेजूंगा।”

मृदुला :” क्या हुआ चेहरे की हवाइयां क्यों उड़ी हुई है ?”

इशानी :” कुछ नहीं यार , परसों का पंगा पड़ रहा है।आभरण की सुविधा देखकर पूजा रख लीं , मेरे पास समय है कि नहीं यह जानने की कोशिश नहीं की। उसको कंपनी में काम करके लाखों मिलते हैं इसलिए उसकी नौकरी महत्वपूर्ण है और मेरे काम करने से उन मासूम बच्चों के मुख पर मुस्कराहट और आंखों में आशा का संचार होता है तो उसकी कोई कीमत नहीं है। ”

मृदुला :” उन लोगों की सोच और जीने का तरीका तुझ से भिन्न है यह मैं रोका के कार्यक्रम में समझ गयी थी। वो थोड़ा दिखावे में विश्वास करते हैं, उन्हें लगता है अगर पैसा है तो उसका प्रदर्शन करने में कोई बुराई नहीं है।”

इशानी :” ठीक है सबकी अपनी-अपनी सोच होती है लेकिन जो प्रर्दशन नहीं करते उनको कम आंकना तो सही नहीं है।”

मृदुला :” तुझे आगे बढ़ने से पहले यह निश्चय कर लेना चाहिए कि तू भविष्य में आभरण के साथ कदम से कदम मिलाकर चल पाएगी की नहीं। वह भाग कर जीवन जीने में विश्वास रखता है और तू चल कर मंजिल तक पहुंचना चाहती है। ”

इशानी हंसते हुए :” मतलब वह खरगोश और मैं कछुआ।”

मृदुला :” हां ऐसा ही समझ लें, लेकिन यहां हार जीत और सही ग़लत की बात नहीं हो रही है। जीने के तरीके की हो रही हैं। तू अगर दो दिन का मसूरी घूमने का कार्यक्रम बनाएगी तो रास्ते भर प्राकृतिक सौंदर्य का आंनद लेते हुए आगे बढ़ेंगी, बीच-बीच में रुक कर फोटो लेगी भले ही रात तक मसूरी पहुंचे। लेकिन आभरण अगर कार्यक्रम बनाएगा तो महीनों पहले बेस्ट होटल में बुकिंग कराएगा। दिन के बारह बजे से होटल में रूकने का समय शुरू होता है तो सारे रास्ते वह टेंशन में बैठा रहेगा कि जल्दी क्यों नहीं पहुंच रहें हैं। उसे होटल में दिये पैसे की एक एक पाई का लुत्फ उठाना है ,भले ही रास्ते की खुबसूरती से वह वंचित रह जाए।”

इशानी :” कुछ सोचते हुए ,तू शायद ठीक कह रही है ,हम दोनों का माइंड सेट अलग अलग लेवल पर है । मानसिकता एक गति से काम नहीं करतीं हैं।उसका ध्यान लक्ष्य पर है वह जल्द से जल्द बहुत कुछ पा लेना चाहता है।मेरा ध्यान रास्ते पर है, अनुभवों को बटोरते हुए , जिंदगी को महसूस करते हुए आगे बढ़ना चाहती हूं।”

मृदुला :” वही तो मैं कह रही हूं,तू सोच ले, तू उसके साथ एडजस्ट कर सकती हो , उसके साथ तेज  चल सकती हो तो उसके साथ शादी कर । शायद इसे ही कम्पेटिबलीटी कहते हैं जो आज के समय में प्रेम से अधिक आवश्यक है शादी में। पता चला रोज़ की छोटी छोटी बातों की झिकझिक में जो मधुर भावनाओं ने जन्म लिया वो दम तोड दें।”

मृदुला की बातों ने इशानी को सोच में डाल दिया था , अगले दिन भी वही बातें दिमाग़ में चक्कर लगाती रही । मन में इच्छा उठ रही थी आभरण फोन करके उसकी मनोस्थिति को समझ कर कुछ बीच का रास्ता निकालने की कोशिश करेगा। स्वयं उसकी फोन करने की हिम्मत नहीं हुई,आभरण ने इतना अपनत्व कभी दिखाया ही नहीं था , हां अधिकार अवश्य दिखाता था। रात तक उसके दिमाग में यह बात घर कर गई कि आभरण और उसके परिवार के दिल में उसकी कोई अहमियत नहीं है,वो तो बस आभरण की पत्नी का पद खाली हैं उसे भरने में लगे हैं।

अगले दिन प्रर्दशनी थी जिसके लिए बच्चों और स्टाफ दो महीने से तैयारी कर रहे थे, इशानी उनका दिल नहीं दुखा सकती थी। उसने जीवन में बहुत पहले ही निश्चय कर लिया था कि वह इस तरह की संस्था से जुड़कर समाजसेवा के क्षेत्र में काम करके अपने जीवन को सार्थक बनाएगी।उन भोले-भाले बच्चों की मुस्कुराहट में अपना अस्तित्व और भविष्य देखने वाली इशानी चाहती थी उसका जीवन साथी उसके मकसद को समझें और सहयोग दें। वह समझ गई थी कि आभरण के जीवन में इन भावनाओं का कोई स्थान नहीं है। वह तैयार हो कर अपनी संस्था चली गई। दस बजे इशानी ने अपना फोन बंद कर दिया , उसके भविष्य का निर्णय हो गया था। एक डेढ़ घंटे बाद उसने देखा कबीर अपना कैमरा संभालें चला आ रहा है। उसने आश्चर्य से पूछा :” आप यहां कैसे?”

कबीर :” उस दिन फोन पर आप इस प्रर्दशनी के बारे में आंटी को बता रही थी तो बस इस उत्सव में शामिल होने का लोभ छोड़ नहीं सका।”

सबका उत्साह देखते ही बनता था, कबीर भी कभी बच्चों के साथ मिलकर आगंतुकों को सामान दिखा रहा था तो कभी तस्वीरें खींच रहा था। तीन बज गए थे, काफी सामान बिक गया था। इशानी को भूख लगने लगी थी तो कबीर का हाथ पकड़ कर कैंटीन ले गयी।

इशानी :” आपको आज की छुट्टी लेनी पड़ी होगी?”

कबीर :” कुछ छुट्टियां बचीं थी, इसलिए लेली। जीवन में ऐसे मौके बहुत कम आते हैं जब जीवन भर याद रहने वाला सुखद अहसास आपको मिल रहा हो।”

इशानी :” आप इतनी अच्छी फोटोग्राफी करते हैं, अपने इसको अपना प्रोफेशन क्यों नहीं बनाया?”

कबीर :” नौकरी करके कुछ पैसा बचाना चाहता हूं , उसके बाद अपने सपनों को पंख दूंगा। अगर मैं अकेला होता तो शायद यह काम अभी शुरू कर देता लेकिन मेरी माताजी की भी जिम्मेदारी है मेरे ऊपर । इस उम्र में उन्हें कोई तकलीफ़ नहीं होने देना चाहता हूं।

इशानी :”आप चाहें तो मैं आपके साथ जीवन की राह पर चल सकती हूं , आपकी ज़िम्मेदारी और सपने सार्थक करने में आपकी हमसफ़र बन सकती हूं ।”

कबीर आश्चर्य से उसे देख रहा था, फिर बोला ,”मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा है जो मैंने अभी सुना है। मैं आपके व्यक्तित्व और विचारों से बहुत प्रभावित हूं लेकिन कभी सपने में भी नहीं सोचा था आपका साथ मुझे मिल सकता है। मन में इच्छा तो जागी थी इसलिए किसी न किसी बहाने आपसे मिलने चला आता था। लेकिन ऐसा यथार्थ में हो सकता है , अपनी किस्मत पर भरोसा नहीं था।” उसने उसकी दोनों हथेली अपने हाथों में लेकर चूम लिए । फिर एक सन्तुष्टी भरी मुस्कराहट के साथ बोला ,”मैं तुम्हें इतना प्रेम और मान दूंगा कि तुम्हें जीवन में कोई शिक़ायत का मौका नहीं दूंगा ।”

6 thoughts on “मुस्कुराहट

  1. एक बहुत ही प्यारी सी मुलायमियत लिए ,बिल्कुल सरल शब्दों में और बेहद सरलता के साथ छोटे-छोटे किन्तु सार्थक कार्यों में जीवन की थाह और उद्देश्यमकता ढूंढती और अपने पाठक को भी इस बात के लिए प्रेरित करती एक कॉम्पैक्ट कथा है ये ।
    कुछ गलतियाँ बेशक आँखों को खटकती हैं,किन्तु कहानी का कंटेंट और प्रवाह उन्हें बिसरा देता है,एक बेहद अच्छी कहानी के लिए लेखिका को आभार ।

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