प्रेरणा

Prerana

प्रेरणा अनुपम के ऑफिस में सिर झुकाए बैठी थी। नौकरी का उसका वह पहला दिन था ,बहुत घबराहट थी। हर बात अनुपम से पूछकर करती थी, इसलिए उसकी कमी बहुत खल रही थी ।पांच महीने पहले हुए हादसे के कारण जिंदगी में जो उथल-पुथल हुई थी, जिंदगी अब तक सामान्य नहीं हुई थी ।अनुपम के साथ पंद्रह साल का वैवाहिक जीवन कैसे बीत गया पता नहीं चला लेकिन उसके बिना पांच महीने का एक-एक पल भार जैसा लग रहा था।

कहां जाएं ,क्या करें, आगे का जीवन कैसे कटेगा अनुपम के बिना ,उसकी कुछ समझ में नहीं आ रहा था। घर के हर कोने में उसकी हंसी ,यादें, शरारतें बिखरी थी कहां देखे ,कहांं  नहीं।अनुपम के बॉस आए थे दो दिन पहले, कह रहे थे अनुपम की मृत्यु के पश्चात प्रेरणा को नौकरी मिल सकती  है उस आफिस में। प्रेरणा की शैक्षणिक योग्यता के हिसाब से जो नौकरी उसे  मिल रही थी अनुपम के ओहदे के हिसाब से कुछ भी नहीं थी। इसीलिए प्रेरणा के भाई ने आपत्ति जताई  थी,” इतनी छोटी सी नौकरी करेगी, तेरा दिमाग खराब हो गया है । उस कार्यालय में जीजू का क्या पद था और तू…..।”

प्रेरणा ने बीच में बात काटते हुए कहा था,” तो क्या हुआ धीरे धीरे काम सीख कर पदोन्नति कर लूंगी ।आज तक कभी घर से बाहर नहीं निकली हूं ,कम से कम दुनिया का सामना करना तो सीख लूंगी।”

अनुपम शुरू से ही उसका इतना ध्यान रखता था बाहर के भी सारे काम की जिम्मेदारी उसने अपने ऊपर ले रखी थी । प्रेरणा की हर परेशानी का हल उसके पास होता था। प्रेरणा को भी आदत पड़ गई थी हर बात के लिए अनुपम से ही सलाह मशवरा करने की। लेकिन अब जिंदगी का इतना बड़ा फैसला अकेले लेना पड़ रहा था। कई बार मन हुआ छोटे भाई की बात मान लें। सही  तो कह रहा है जितना पैसा है उसी को ठीक से निवेश करके और  थोड़ी भाई की मदद ले कर जिंदगी गुजार दे।

लेकिन फिर अपने दस और बारह  साल के बच्चों की तरफ देखा तो लगा, जैसे जैसे बड़े होंगे जरूरतें बढ़ेगी ।कब तक दूसरों पर आश्रित होकर जिंदगी कटेगी ।अभी तो नौकरी मिल भी रही है, स्वाभिमान से जीने का हक मिल रहा है ।लेकिन हिम्मत नहीं हो रही थी ,अंदर से एक भय उमड़ रहा था ।अनुपम की बहुत याद आ रही थी, कितना आत्मविश्वास  था, किसी बात से घबराता नहीं था , उसकी फितरत में ही नहीं था ।जब वह बहुत देर तक ऐसे ही सिर झुकाए बैठी रही तो ऑफिस के अन्य कर्मचारी जो उसे देख रहे थे सोच रहे थे  कोई प्रतिक्रिया क्यों नहीं दे रही है वह। तभी अनुपम का बॉस उसके पास पहुंचा एक लिफाफा लेकर। वह बोला, “यह लिफाफा अनुपम के सामान में मिला था ।सब सामान तो आप को भिजवा दिया था, यह रह गया था।”

प्रेरणा ने लिफाफा खोला तो उसमें एक जन्मदिन का कार्ड था जो अनुपम उसके जन्मदिन के लिए तोहफे के साथ रखता  लेकिन ….।

उसने कांपते हाथों से खोला तो उसमें उसके लिए संदेश था।

‘मेरी जान, तुम केवल नाम की प्रेरणा नहीं हो, बल्कि मेरे जीवन में प्रेरणा का स्रोत हो। जब भी कोई नया काम करता हूं तो घबराहट होती है। लेकिन अपने दिल में झांकता हूं, तुम्हारी मुस्कुराती छवि को देखते ही इतनी हिम्मत आ जाती है कि तुम्हारे और बच्चों के लिए कुछ भी कर गुजरता हूं। कभी तुम अपने आप को अकेला मत समझना, अपने दिल में झांकना मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं।”

प्रेरणा इतना पढ़ते ही फूट-फूट कर रोने लगी ।उसे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था, ऑफिस के सारे कर्मचारियों उसे देख रहे थे ।उसे विश्वास हो गया था अनुपम उसके साथ है।

अब उसमें हौसला आ गया था आगे बढ़ने का‌।

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