पुण्य

Puny

रामदीन के हाथ कांप रहे थे उस कीमती पत्थर पर हथोडा़ चलाते हुए। दो दिन से कुछ खाया नहीं था,चक्कर आ रहे थे।बार बार अपनी बीवी और दोनों मासूम बच्चों का ख्याल आ जाता और वह अपने चित्त को कड़ा कर एकाग्रता से काम करने की कोशिश करता।जानता था एक ग़लत चोट उस पत्थर पर पड़ी और उसकी अंतहीन परेशानियों में एक और परेशानी बढ़ जाएगी। सामने यशोदा अवस्थी सोफे पर अधलेटी पड़ी थी, बीमार थी, डाक्टरों ने जवाब दे दिया था।तीन चार महीने से अधिक का समय नहीं था,पैसा बहुत था

तो दिमाग में विचार आया क्यों न जाने से पहले अपनी तरफ से एक भगवान की मूर्ति मंदिर में स्थापित करवा दी जाएं, पुण्य भी हो जाएगा और नाम भी। वैसे तो वह अपने कमरे में बिस्तर पर लेटी रहती थी , डाक्टरों और नर्सों से घिरी रहती।आज कारीगर आएं थे काम शुरू होने वाला था तो वह भी बाहर बरामदे में आकर बैठ गई।तन अस्वस्थ था तो मन खिन्न था हर किसी को झिड़क रही थी। तभी मेनेजर बैंक से पैसे निकाल कर लाया और उनके हाथ में दे दिए। यशोदा थोड़ा सीधे होकर बैठते हुए पैसे गिनने लगी। और दो कारीगर दूर बैठे काम करते रहे लेकिन रामदीन नजदीक बैठा था और उसकी निगाह बार बार पैसे की तरफ जा रही थी।

यशोदा ने उसे इस तरह अपने हाथ में पकड़े रूपयों की तरफ देखते हुए देखा तो कड़क आवाज में बोली ,”क्या देख रहा है छीन कर भागने का इरादा है क्या ?”

रामदीन का पेट खाली था तो दिमाग भी बगावत कर रहा था।न चाहते हुए भी उसके मुंह से उलाहना भरे शब्द निकल  पड़े ,”क्यों गरीब के थोबड़े पर लिखा होता है वह चोर और चरित्रहीन भी होगा। वैसे अगर भगवान की मूर्ति नहीं बना रहा होता तो शायद पेट की भूख साली पैसे छीनकर भागने पर मजबूर कर देती।”

रामदीन ने बोल तो दिया लेकिन अब उसका अपना सिर धुनने का मन कर रहा था।अगर बुढ़िया ने काम भी छीन लिया तो जो शाम तक पैसे मिलने की आशा थी उस पर भी पानी फिर जाएगा।

यशोदा उसकी तरफ पैनी निगाह से देखते हुए बोली ,”तू तो बड़ा खतरनाक आदमी है , मुझे मारकर पैसे छीन कर भाग गया तो क्या होगा?” फिर कुछ सोचते हुए बोली ,”वैसे तो तीन महीने बाद मरूंगी ,आज मर जाऊंगी क्या फर्क पड़ेगा। दर्द से निजात ही मिलेगी।”

रामदीन दुखी स्वर में बोला ,”भूख का दर्द भी ऐसा जानलेवा ही होता है ,सारे शरीर को जकड़ लेता है , लेकिन तुम क्या जानो?”

यशोदा का सारा दुख उसके चेहरे और वाणी पर आ गया ,”अच्छी तरह जानती हूं,घर में अन्न भरा पड़ा है, लेकिन जिह्वा पर रखा नहीं जाता। कुछ भी खाया नहीं जाता। लगता है अन्न दोष लगा है मुझे।”

रामदीन अपनी धुन में कह रहा था,”ऐसे भगवान की क्या मूर्ति बनाएं जो पेट तक भरने में सक्षम नहीं।”

यशोदा तीखे स्वर में बोली,”तूझे भगवान में श्रृद्धा नहीं है , फिर तू भगवान की मूर्ति कैसे बना सकता है।”

रामदीन उदास स्वर में बोला ,”अगर भगवान में श्रृद्धा बढ़ानी है तो मूर्त्तियां बनवाने से क्या लाभ। मजबूर इंसान की जरूरत पूरी कर दे माई लोग श्रेय भगवान को देंगे।”

यशोदा कुछ सोचते हुए बोली,”तू ठीक कहता है रे  चल पहले तेरे ही खाने की व्यवस्था करवाती हूं। फिर औरों के बारे में भी सोचती हूं।”

यशोदा के मुख पर संतुष्टि थी।

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