संवेदना

Sanvedana

तेज़ मूसलाधार बारिश के कारण यातायात घोंघे की गति से आगे बढ़ रहा था ।आनु को बैचेनी और झुंझलाहट हो रही थी , अगर समय से घर नहीं पहुंचा तो इतनी मुश्किल से जो डॉक्टर से समय मिला था वह व्यर्थ  हो जाएगा। अपने बड़े भाई कैलाश के लिए वह चिंता ग्रस्त था तीन महीने पहले कैलाश जब अपनी पुत्री रिया को स्कूल बस में बैठाने जा रहा था तो उसकी आंखों के सामने वह दुर्घटना का शिकार हो गई। गलती सारी ड्राइवर की थी ,कंडक्टर उस दिन आया नहीं था, यह देखे बिना कि बच्चे सब चढ़ गए हैं कि नहीं उसने बस चला दी। रिया ठीक से चढ़ भी नहीं पाई थी कि बस चल पड़ी और और झटके के कारण बस से फिसल गईऔर पिछले पहिए के नीचे आ गई। कैलाश हतप्रभ रह गया, खून से लथपथ रिया को लेकर तुरंत ऑटो  पकड़कर नजदीक के अस्पताल ले गया लेकिन नन्ही जान इस संसार से विदा ले चुकी थी। हंसती खेलती बच्ची का इस तरह आधे घंटे में निष्प्राण हो जाना उसके लिए सदमे से कम नहीं था ।यंत्र चलित सा वह रिया की देह का संस्कार तो  कर आया लेकिन दिल और दिमाग से इस बात को स्वीकार नहीं कर पाया।

पत्नी संध्या की लाख कोशिश के बावजूद वह ना किसी से बोलता ना कुछ काम करता। बस चुपचाप शुन्य में देखता रहता । पत्नी जबरदस्ती नहाने भेज देती तो आधे घंटे तक अपने ऊपर पानी ही डालता रहता, खाना खाने बैठता तो होश ही नहीं रहता खाता चला जाता ।कैलाश की ऐसी हालत देखकर पत्नी व्यथित हो गई और उसने अपने देवर आनु से संपर्क किया। आनु तुरंत दोनों को अपने घर ले आया, उसे लगा उसके दोनों बच्चों के बीच शायद कैलाश अपना गम भुला कर सामान्य जीवन जी सकेगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ ,सब की चिंताएं कैलाश को लेकर बढ़ती जा रही थी तो उसने शहर के प्रसिद्ध मनोचिकित्सक से समय ले लिया।

बहुत मुश्किल से समय मिला था ,आनु ने आधे दिन की छुट्टी भी ले ली थी। लेकिन बारिश और जाम के कारण उसे लग रहा था वह कैलाश को लेकर समय से नहीं पहुंच सकेगा उधर संध्या को भी चिंता हो रही थी अगर बारिश नहीं रुकी तो कैसे जाएंगे और तैयार होकर कैलाश के साथ घर के दरवाजे पर खड़ी अपने देवर का इंतजार कर रही थी कि जैसे ही देवर ऑटो से आते दिखाई देगा वह कैलाश के साथ शीघ्रता से ऑटो में बैठ जाएगी ।सड़क पर बहुत गहमागहमी थी, करीब में एक स्कूल था जिसकी छुट्टी  हो गई थी। बारिश देख बच्चे बेकाबू हो रहे थे इधर उधर भाग रहे थे अपनी सवारी तक पहुंचने की उन्हें कोई जल्दी नहीं थी। तभी एक तीन-चारसाल की लड़की  पानी से भरे गड्ढे में कूदती फांदती फिसल गई। उठने की कोशिश करती लेकिन बार-बार फिसल जाती, इधर उधर से गाड़ियों का आना जाना लगा हुआ था ।तभी कैलाश फुर्ती से भागता हुआ उस लड़की को गोद में खींचकर एक तरफ ले गया | उसके गले लगी वह बच्ची बुरी तरह से डर के मारे कांप रही थी ।कैलाश फूट-फूट कर रो रहा था और बोलता जा रहा था:” तुझे कुछ नहीं होगा इस बार रिया,मैंने तुझे बचा लिया है ।”तभी बच्ची की अध्यापिका भी वहां आ गई ,वह बच्ची को कैलाश की गोदी से लेने की कोशिश करने लगी लेकिन बच्ची अपनी पकड़ ढीली नहीं छोड़ रही थी। कैलाश की पत्नी भी वहां पहुंच गई और अध्यापिका का हाथ रोक दिया। अश्रुपूर्ण नेत्रों से उसे अपने पति की संवेदना का  लौटते देखना बहुत सुखद लग रहा था।

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