शिकायत पेटी

Shikaayat Petee

शालिनी बड़बड़ाती हुई शयनकक्ष में दाखिल हुई,” आज फिर महारानी ज्वालामुखी बनी घूम रहीं हैं,जरा सा काम करती है अहसान तोड़ती है।” पत्नी की बात सुनकर सुबोध बोले,” क्या हुआ? कुछ कहा क्या?”

शालिनी :” कहेगी क्या? तेवर देखकर समझ जाती हूं, कभी बर्त्तन पटके जा रहें हैं तो कभी दरवाजे धाडधाड बंद हो रहें हैं।”

सुबोध,” अवश्य ही भूषण ने कुछ कह दिया होगा।”

शालिनी,” बस हिरोइन को कुछ कहो मत । आज इतना अच्छा मौसम हो रहा है ,सोचा था पकौड़े बनाने के लिए कहुंगी ‌। जितनी उबल रहीं हैं ठीक से सिंका पराठा ही खाने को मिल जाए तो बहुत बड़ी बात है। अभी मेरे जाने के बाद आएगी आपके लिए चाय लेकर ,अपना दुखड़ा रोने। कभी कहती हैं मैं तो पंचिंग बैग हूं हर कोई आकर अपना गुस्सा मेरे उपर उतार देता है। तो कभी उसे लगता है उसकी अहमियत घर के फर्नीचर से अधिक नहीं ,सब इस्तेमाल करते हैं और भूल जाते हैं। सुनो थोड़ा समझा बुझाकर शांत कर देना और मूड ठीक हो जाए तो पकौड़े तलने के लिए कह देना।”

सुबोध,” कभी तुम भी बहू के हालचाल पूछ लिया करो।”

शालिनी ,” रहने दो उसके लिए आप बहुत है। सिर पर चढ़ा रखा है तभी तो इतना इतराती है।

मैं नहाकर मंदिर जा रही हूं, लेने मत आना अपनी उस खटारा स्कुटी पर । मैं रिक्शा करके खुद आ जाऊंगी।सारी जिंदगी बीत गयी एक गाड़ी नहीं खरीदी गई।”

शालिनी नहाने चली गयी और सुबोध सुखी हंसी हंस कर रह गए। जानते थे शालिनी की बहुत सी इच्छाएं पूरी नहीं कर सकें लेकिन अपनी तरफ से प्रेम और मान में कोई कमी नहीं छोड़ी। उनका व्यक्तित्व ही ऐसा था सबके बारे में सोच कर चलने और सबकी ख़ुशी में अपनी खुशी देखने में विश्वास करते थे।

शालिनी के जाने के बाद बहू आरती ने दो कप चाय के साथ कमरे में प्रवेश किया। बहुत बुझी सी लग रही थी तो सुबोध ने प्रेम पूर्वक पूछा,” क्या हुआ बिटिया , तबियत ठीक नहीं है क्या?”

आरती,” तबीयत से अधिक तो पापाजी सबका रवैया दुखी करता है हमें।सब शिकायत पेटी समझते हैं हमें।बात किसी की बुरी लगेगी, परेशानी किसी से होगी, सुनाने हमें बैठ जाएंगे। चाहतें हैं हम  जाकर सब की पैरवी करें, बुरे बनें और स्वयं सफेद चौला पहने ,बत्तिसी दिखाते हुए भले बनें रहें।”

सुबोध:” क्या हुआ, भूषण ने कुछ कहा, मैं बात करूं उससे?”

आरती :” रोज़ रात को भाई साहब इनके बाद आतें हैं गाड़ी इनकी गाड़ी के पीछे लगा देते हैं ,सुबह इनको जल्दी जाना होता है तो रोज चिक-चिक करते हैं। हमसे कहते हैं भाई साहब से कहो कि गाड़ी कहीं ओर खड़ी किया करें।भाई साहब हमसे कहते हैं भूषण को समझाओं हर किसी से गुस्से में बात करता है इतने तैश में रहेगा तो काम कैसे करेगा।हम इनसे इस बारे में बोले तो ये हम पर चिल्ला कर पड़े,” तुम्हें तो उनकी बात सही लगती है मैं तो सबको पागल लगता हूं। अब पापाजी भाई साहब स्वयं भी तो प्यार से यह बात इनको समझा सकते है कि नहीं। इनको बच्चों की कोई कोई बात या आदत ठीक नहीं लगती तो हमें शिकायत करेंगे,अरे तुम्हारे भी तो बच्चे हैं खुद समझाओं। बच्चों को इनसे कुछ चाहिए हमें कहेंगे, अपने पिता से सीधे बात क्यो नही करते। उम्र के साथ काम बढ़ता जा रहा है शरीर घटता जा रहा है। शारीरिक और मानसिक तनाव बढ़ता जा रहा है और अब हम भाग भाग कर पहले की तरह काम नहीं कर पाते हैं। जिसके भी काम में थोड़ी लापरवाही हो जाती है वही शिकायतों का अंबार लगा देता है।  अभी से हमारे घुटनों में दर्द रहने लगा है, लेकिन सबको लगता है हम बहाना बना रहे काम से बचने के लिए। ”

आरती की आंखों में आंसू थे ,कूकर की सीटी की आवाज सुनकर वह कप उठा कर रसोई की ओर चली गई। आखिरी वाक्य

शालिनी की ओर इशारा था ,वह जब देखो तब ताना मार देती थी। ” ये कोई उम्र है घुटने पकड़ कर बैठी रहती है,काम न करने के सौ बहाने है। हमारी उम्र तक आते-आते और न जाने कहां कहां दर्द का रोना रोती फिरेगी।” सुबोध को लगा वह स्वयं भी कुछ तो दोषी है ही ,भूषण से वो उम्मीद करते थे कि काम से लौटकर वह थोड़ी देर उनके पास अवश्य बैठे‌‌। लेकिन भूषण अक्सर अपने कमरे में चला जाता बिना उनसे बात करें। बहुत दिनों तक जब ऐसा होता तो वो आरती से शिकायत करते और अगले दिन से भूषण दस पंद्रह मिनट के लिए उनके पास आकर बैठ जाता। पहले भी आरती अपनी परेशानी लेकर सुबोध के पास आतीं थी लेकिन हंस कर बतातीं और मजाक में उडा कर चलीं जाती थी। इस बार उसकी नम आंखों से उनका मन भीग गया ,लगा परिवार के मुखिया होने के कारण उन पर लानत है।वह परिवार ही क्या जिसका एक सदस्य दुखी हो और किसी को उसका ध्यान ही नहीं। उन्हें लगा इस बात को गंभीरता से लेना चाहिए और इसका कोई समाधान भी निकालना चाहिए।

सुबह शालिनी नियम से दो ढाई घंटे मंदिर में लगा कर आती थी,एक घंटा पूजा करती और एक घंटा सहेलियों से गप्पे लगातीं। आतें ही गर्म नाश्ते की फरमाइश रहती। हाथ में नाश्ते की प्लेट और चाय की प्याली वह कमरे में दाखिल होते हुए बोली,” लगता है आज आप की मक्खन पालिश का महारानी पर कोई असर नहीं पड़ा।सोच रही थी इतना तो बहला फुसला लेंगे कि पकौड़ी खानें को मिल जाएगी। आज तो इतनी तीव्र इच्छा हो रही थी कि पूजा में भी मन नहीं लगा। लेकिन देखो कामचोर कहीं की ,रोज़ रोज़ आलू के परांठे सेंक कर रख देती है।”

सुबोध :” शालू आलू का पराठा सेंक ने भी हाथ हिलाने पड़ते हैं।सुबह सुबह आरती को कितने काम रहते हैं और तुम चाहो हर रोज एक नया पकवान बना कर तुम्हें खिलाएं तो यह मुमकिन नहीं।”

शालिनी :” ओहो! रहने दो जी, इस बार तो आप उसके झांसे में आ गए, जादूगरनी कहीं की।”

सुबोध :” बस बहुत हो गया शालू ,बीस बाइस साल के करीब हो गए आरती को इस घर में आएं हुए। कभी तो उसे उसके नाम से बुला लिया करो ,यह क्या कभी जादूगरनी तो कभी हिरोइन।उसको तो चाहती हो बेटी बन कर रहे, कभी तुम भी उसे बेटी समझ कर बरताव कर लिया करो। जब तक हाथ पैर चलते हैं हम बच्चों का सहारा बन सकते है।”

शालिनी :” क्या बकवास कर रहे हो ,सारी उम्र काम किया है ,कोई नौकर नहीं लगा रखे थे आपने। अब बहू के आने पर थोड़ा आराम की उम्मीद लगा ली तो कोई आफ़त नहीं आ गई। ब्याह कर आयी है इस घर में , अपनी गृहस्थी संभाल रही है । थोड़ी बहुत हमारी सेवा कर रही है तो कोई अहसान नहीं कर रहीं हैं हम पर ‌,अपना फर्ज़ निभा रही हैं।”

सुबोध :” किस फर्ज़ की बात कर रही हो शालू , तुम्हारी तो अपनी सास से एक दिन नहीं बनीं, बिचारी छोटे के यहां ही पड़ी रहती थी।”

शालिनी गुस्से से बोली,” मैं ने उन्हें आने के लिए कभी मना नहीं किया था। उनका मन नहीं लगता था यहां , तो उसमें मेरा क्या कसूर है।”

सुबोध:” शालू तुमने कभी कोशिश भी नहीं की कि उनका मन लगे यहां पर ,जब वो आती थी यहां तुम दुनिया भर के अपने बाजार के काम निकाल लेती थी। जब देखो तब किसी न किसी बहाने बाहर चली जाती थी। एक बार जब वो एक महीने के लिए आयी तुमने तभी घर में पुताई का काम फैला लिया जिससे उनको इतनी परेशानी हुई कि उन्होंने फिर आने का नाम नहीं लिया। तुम्हें क्या लगता है कोई कुछ कहता नहीं था तो क्या किसी को समझ नहीं आती थी तुम्हारी चालाकियां। रिश्ते खराब न हो इसलिए सब चुप रहते थे। बहू के संस्कार है जो बिना शिकायत करें हमारा काम करती रहती है। हमने तो अपने बेटे का पालन पोषण किया था उससे उम्मीद रखना तो जायज है,बहू का हमने ऐसा क्या कर दिया?”

शालिनी :” अच्छा बड़ी पैरवी कर रहे हो उसकी ,बसाबसाया घर दिया उसको,सारी उम्र बीत जाती तो भी भूषण की कमाई से दो कमरों का मकान कभी नहीं ले पाती ।”

सुबोध ,” वो तो मां की मृत्यु के बाद गांव की जमीन बेचने से मिले पैसे से किसी तरह दोनों बेटों को दो-दो कमरों के मकान दिला दिए थे। बड़ी बहू हमें साथ रखने को तैयार नहीं फिर भी भली लगती है तुम्हें, यदाकदा पांच छः हजार की साड़ी तुम्हें भेंट दे देती है। ”

शालिनी :” ऐसी कोई बात नहीं है , नौकरी करती है , उसके पास समय कहां है घर के काम करने का?”

सुबोध बीच में टोकते हुए बोले :” बहुत खूब, तुमने सोचा उसके साथ रहेंगे तो उसकी  गृहस्थी का बोझ तुम पर आ जाएगा इसलिए आरती के साथ रहते हैं बैठे बैठे सब काम होते रहेंगे। मैं यह नहीं कह रहा तुम सारे काम अपने ऊपर ले लो, बस सुबह शाम आरती का थोड़ा हाथ बटाओगी तो अच्छा रहेगा। कल से रोज टहलने जाता हूं,दूध और सब्जियां मैं लाया करूंगा। तुम मंदिर में एक घंटा लगाओ और शाम को पार्क में टहलने जाओ तब अपनी सहेलियों से जी भरकर बात करो । हम एक परिवार है बहू बेटे पर बोझ न बने सहारा बनें तो अच्छा है। शालू कल को वो हमारे जाने का इंतजार करने लगेंगे , उनके मन में हमारी मृत्यु की इच्छा होने लगेगी। बहू दुखी होकर मन ही मन कामना करने लगेगी,कब इन बुड्ढे बुढ़िया से पिंड छुटे।”

शालिनी :” न जाने उसने ऐसी क्या पट्टी पढ़ा दी आपका तो दिमाग ही खराब हो गया ‌। न जाने कैसी बातें कर रहे हैं , नहीं चाहिए मुझे पकौड़ी।”

सुबोध :” पकौड़े की इच्छा करने को कौन मना कर रहा है,बल्कि तुम इतनी अच्छी पकौड़ी बनाती थी ,स्वयं बनाती खुद भी खाती और सबको खिलाती , कितना अच्छा लगता।”

सुबोध ने शालिनी के दोनों हाथ अपने हाथ में लिए और उसकी आंखों में आंखें डालकर बोले :” मेरी बात समझने की कोशिश कर ,विधि का विधान है जो इस संसार में आया है एक दिन जाएगा। हम दोनों में से जो रह जाएगा उसे कितना अकेला पन झेलना पड़ेगा। अगर बच्चों के दिल में जगह बनाएंगे तो घर में कभी अकेला महसूस नहीं करेंगे, नहीं तो सब के होते हुए भी जीवन एकाकी लगेगा।”

शालिनी भावुक होते हुए :” न जाने कैसी बातें कर रहे हो ,आज हो क्या गया है ‌। जैसे कहोगे करुंगी लेकिन यह अकेले रह जाने वाली बात फिर कभी मत करना।”

सुबोध को बड़ी तसल्ली मिली शालिनी की बात मान लेने से नहीं तो उन्होंने मन बना लिया था बहू की थोड़ी बहुत मदद रसोई में भी स्वयं कर दिया करेंगे।

धीरे धीरे स्थिती में कुछ अंतर नजर आने लगा,अब इतनी हड़बड़ी नहीं रहती थी, तो सब झुंझलाते भी नहीं थे। जब भी कोई बच्चा या भूषण आरती से तेज़ आवाज़ में बात करते तो सुबोध टोंक देते। थोड़ा बहुत समय अपने लिए निकालने के लिए प्रोत्साहित करने लगे। आरती का मन कंप्यूटर सीखने का बहुत समय से था , सुबोध ने जिद करके उसे भेजना शुरू कर दिया। सारा दिन घर में बंधी आरती का मन छटपटाता था।अब बाहर जाती , लोगों से मिलती कुछ नया सीखती तो बड़ी प्रसन्न रहने लगी। घर में भी सबसे बड़े प्रेम से बात करती । सुबोध को बड़ा अफसोस होता यह छोटे-छोटे बदलाव तो वो पहले भी ला सकते थे,सबकी जिंदगी में कितना फर्क पड़ जाता।

समय अपनी गति से बढ़ रहा था,एक रात सुबोध को हार्टअटैक आया और निंद में ही संसार से विदा हो गए। शालिनी तो हतप्रभ रह गयी, टूट सी गई। सोच रही थी न जाने कितना जीवन है उसका अकेले कैसे काटेगी। लेकिन उसने महसूस किया कि सुबोध के जाने के बाद सब बिना जताएं उसका कितना ध्यान रख रहे थे, कोई न कोई उसके पास अवश्य बैठा होता। पोती मुस्कान जो सोलह सत्रह साल की थी अक्सर उसके कमरे में बैठ कर अपना काम करने लगी। उसकी उपस्थिति से शालिनी को बड़ा सुकून मिलता वरना अकेले कमरे में बैठे बैठे उसे सुबोध की याद त्रस्त कर देती।

एक दिन शालिनी ने प्रेम से मुस्कान से कहा वह अपने कपड़े और सामान ले कर उसके कमरे में ही आ जाएं। मुस्कान तुरंत तैयार हो गई और आरती को भी अच्छा लगा ,एक ही कमरे में चारों के रहने से थोड़ी दिक्कत तो होती ही थीं।

चार पांच दिन बाद शालिनी जब पार्क गयी तो उसकी सहेली सावित्री बोली :” क्या हुआ तेरी तबियत तो ठीक थी कईं दिन से पार्क में नज़र नहीं आयी।”

शालिनी :” वो मैं बच्चों के साथ नैनीताल घूमने गयी थी , मैं ने बहुत मना किया मानें ही नहीं।अपना कार्यक्रम भी रद्द करने लगे तो चलीं गईं। लेकिन बड़ा अच्छा लगा बच्चों के साथ घूमने का आंनद ही कुछ और है।”

सावित्री:” बड़ी किस्तम वाली है वरना अकेली बुढ़िया को कौन पूछता है? मैं तो बोल बोल कर थक गई आसपास के मंदिर के दर्शन ही करा लाओं लेकिन कोई नहीं सुनता।”

शालिनी को सुबोध की बड़ी याद आ रही थी , जाने से पहले उसकी जिंदगी संवार गये । बच्चों के निश्चल प्रेम और साथ के सहारे वह आगे का सफर भी काट लेंगी।

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