सुरक्षा कवच

suraksha kavach

तुलिका ने अस्पताल से बाहर निकलकर आॅटो लिया और घर का पता बताकर आंखें बंद करके बैठ गई | वह भाव-विह्वल थी, आंखों से अश्रु धारा बहती जा रही थी। लम्बे चौड़े, रौबदार व्यक्तित्व के धनी अपने पिता को नलियों में घिरा असहाय देख वह बहुत दुखी थी। पुलिस महकमे में कार्यरत थे इसलिए अंदाज ही अलग था।उसको हमेशा कहते :”तुझे जिंदगी में जो करना है कर , जहां जाना है जा , मैं हूं न तेरा सुरक्षा कवच कभी तुझ पर आंच नहीं आने दूंगा।”

डाक्टर ने जवाब दे दिया है कोई भी सांस अंतिम सांस हो सकती है। वह तो अस्पताल से हिलना भी नहीं चाह रही थी लेकिन बड़े भाई ने जबरदस्ती उसे घर भेज दिया यह कहकर कि घर जाकर कुछ आराम कर ले दो दिन से अस्पताल में बैठी है बीमार हो जाएंगी।

तभी आॅटो रूक गया और उसकी तंद्रा  भंग हो गई।देखा आॅटो एक सुनसान स्थान पर खड़ा है और आॅटो चालक के साथ एक और बंदा चाकू तान कर उससे कड़क आवाज में कह रहा था :” नीचे उतर और जो भी कीमती सामान है तुरंत हमारे हवाले कर दें।”

वह घबरा कर आॅटो से उतर गई, कीमती सामान के नाम पर उसके पास कुछ नहीं था ,पर्स में केवल दो ढाई सौ रुपए थे और फोन भी सस्ते वाला था। दोनों गुंडे बौखला गए, उनमें से एक बोला :” कोई बात नहीं , इसके पास कुछ नहीं है तो ,यह खुद क्या कम कीमती माल है इसे ही उड़ा कर ले चलतें है।”

तुलिका गिड़गिड़ाने लगी तभी उन में से एक गुंडा घबरा कर बोला :”यह लम्बा चौड़ा पुलिस वाला कहां से आ गया ।”

चाकू और आॅटो छोड़कर वो दोनों वहां से भाग गए। तुलीका ने पीछे मुड़कर देखा वहां कोई नहीं था लेकिन समझने बूझने का समय उसके पास नहीं था । गुंडों से विपरीत दिशा में उसने भी दौड़ लगाई।मेन सड़क पर पहुंच कर उसकी जान में जान आई, तभी उसका फोन बज उठा।उसके भाई ने रोते रोते बताया ,तुली पापा हम सब को छोड़कर चले गए।

वह समझ गई जाते जाते उसके पिता की रूह उसका सुरक्षा कवच बन कर आई थी।

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