उम्मीदें

Ummeeden

चित्रा रसोई में खाना बना रही थी लेकिन ध्यान सामने वाले फ्लैट पर था। बहुमंजिला इमारत थी,हर मंजिल पर चार फ्लैट थे, कोरिडोर के दो फ्लैट इस तरफ दो उस तरफ। आयुष्मान को एक साल हो गया अमेरिका गए हुए,इस हफ़्ते उसको आना है लेकिन मजाल है जो सही से बता दें किस दिन की टिकट है। चित्रा अपनी नाक ताक पर रख कर आयुष्मान को फोन करती थी लेकिन वह हां हूं करके दो टूक बात करके फोन काट देता।एक तो समय का चक्कर वहां रात तो यहां दिन , दूसरे उसका गुस्सा जो एक साल के अंतराल और सात समुंदर की दूरी के बावजूद कम नहीं हुआ।हर  कोई उससे इतनी अपेक्षाएं रखता है बस उसकी मन:स्थिती को कोई नहीं समझना चाहता।एक दादी थी जो बिना किसी उम्मीद के उससे प्यार करती थी।आठ साल हो गए गुज़रे हुए लेकिन जब भी याद आती आंखों में आंसू आ जाते।

जब एक साल की थी चित्रा उसकी दादी हेमलता गांव से आई थी अपने सबसे छोटे पुत्र भारतेश का परिवार देखने। भारतेश ने अपने आफिस में साथ काम करने वाली संतोष से क्या सोच कर शादी की थी यह बात हेमलता की कभी समझ नहीं आयी । निम्न स्तर के क्रेच में  दुधमुंहे बच्ची की दुर्दशा देखकर उसका कलेजा मुंह को आ गया। गांव में दो दो पुत्रों की बसी-बसाई गृहस्थी में राजरानी की तरह रहती हेमलता शहर में इस दो कमरे के छोटे से फ्लैट में तीसरे पुत्र की गृहस्थी संभालने के लिए आकर बस गयी। सास बहू का छत्तिस का आंकड़ा था, लेकिन संतोष अपनी सास को दो कारणों से बर्दाश्त कर रही थी।एक तो बेटी का लालन-पालन अच्छा और मुफ़्त में हो रहा था , दूसरे सुबह शाम गरमा गरम स्वादिष्ट  खाना खाने को मिलता था वरना उससे स्वयं अपने हाथ की बनी रोटी नहीं खायी जाती थी। भारतेश को पढ़ने का शौक था,गांव में बिना अधिक मशक्कत के पढ़ता चला गया,तो शहर में बसने के सपने ने जन्म ले लिया। नौकरी लग गई लेकिन जल्दी ही आटे दाल का भाव पता चल गया। इतनी कम तनख्वाह में इतनी महंगाई में गुजर-बसर करना मुश्किल काम लगा।

उन्हीं दिनों आफिस में सहकर्मी संतोष की माताजी का देहान्त हो गया , सबको उससे बड़ी सहानुभूति हुईं। उसके परिवार में और कोई नहीं था , संतोष बड़ी उदास और परेशान लगती थी सबको। ऐसे में भारतेश के मन में विचार आया कि क्यों न उससे विवाह कर लिया जाए, संतोष को सहारा मिल जाएगा और शहर में रहने के लिए एक से भली दो की कमाइ। संतोष पहले तो प्रस्ताव सुनकर हतप्रभ रह गयी , ना-नुकुर किया लेकिन आफिस में साथियों के समझाने पर राज़ी हो गई । भारतेश ने जब गांव जाकर हेमलता को सब बातें बताई तो उसने विरोध किया, उसने गांव में एक सुंदर सुशील कन्या भारतेश के लिए पसंद कर रखी थी। जब भारतेश नहीं माना तो अपने आप को तसल्ली देकर कि बिन बाप का लड़का अपनी तो चलाएगा ही उसने एक सादे समारोह में गांव में ही दोनों का विवाह करा दिया।दो दिन गांव में रहकर नवविवाहित जोड़ा वापस शहर आ गया।

भारतेश को जल्दी ही पता चल गया कि संतोष में संतोष नाम की कोई बात नहीं थी। वह बहुत ज़िद्दी और अपनी बात मनवाने वालों में से थी। उसके दिमाग में बस एक महत्त्वकांक्षा थी कि पुख्ता बैंक बेलेंस हो और सिर पर अपनी छत हों। न वो खुद खाने पहनने में विश्वास रखती थी न भारतेश को कोई शौक पूरे करने देती थी। शुरू में बहुत झगड़े होते दोनों में इन बातों को लेकर लेकिन धीरे-धीरे भारतेश ने हथियार डाल दिए। पुत्री के जन्म के बाद संतोष की बात में दम भी नजर आने लगा, भविष्य में उसकी पढ़ाई लिखाई और शादी के लिए भी पैसों की आवश्यकता पड़ेगी। भारतेश ने पैसों का हिसाब किताब पत्नी को सौंप दिया और स्वय कों किताबों की दुनिया के हवाले कर दिया।

हेमलता को बहू बेटे का जीने का यह तरीका बिल्कुल समझ नहीं आया।थोड़ा बहुत बचत करने के लिए फिजूलखर्ची न करना समझ आता है लेकिन एक एक पैसे के लिए इतना रोना पीटना,बाप रे बहू है या बला। बहू के सामने तो हेमलता मुंह सीम कर रहती लेकिन उसके जाते ही बहुत बड़बड़ाती ” पता नहीं कहां से इस चुड़ैल को पकड़ लाया ,कैसा गबरू जवान था छोरा , निचोड़ कर चूहा बना दिया। सारा दिन उंगली पर नचाने के अलावा कोई काम नहीं,मजाल है उसकी मर्जी के खिलाफ कोई काम कर लो। अगर सरकार हवा पर टैक्स लगा देतो सब की सांसोंका भी हिसाब रखने लगे। पता नहीं भरतू की आंखों पर क्या पट्टी बंध गई थी कि जो इस हिटलरनी को ब्याह लाया अपनी जिंदगी बरबाद कर ली।”

नन्ही चित्रा को कुछ समझ नहीं आता था दादी क्या बड़बड़ाती रहती है लेकिन उसे कोई फर्क नहीं पड़ता था। हेमलता को संतोष से जितनी चिढ़ थी चित्रा के लिए उतना अपार प्रेम।विधवा थी लेकिन गांव में अच्छी खेती बाड़ी थी और दोनों बेटों को मां का मान भी खूब था इसलिए उसके पास ख़र्चे के लिए हाथ में पैसे रहते थे। स्वयं अच्छा पहनती और पोती के लिए भी एक से एक कपड़े लाती पहनाने को। उसका मन रखने के लिए चाकलेट केक और फल लाकर भी चुपचाप खिला देती। नासमझ चित्रकला बचपन में मां के सामने खुश हो कर दादी के लाए हुए सामान का जिक्र करती तो सास बहू में अच्छी खासी तू तू मैं मैं हो जाती। जल्दी ही चित्रा को एक बात समझ में आ गयी कि कुछ बातें मां को नहीं पता चलें तो उसकी और दादी की जिंदगी में शांति बनी रह सकती है।

इस तरह की बहस दोनों में अक्सर हो जाती, न कोई जीतता न हारता और न कोई अपनी आदत बदलता। दो तीन दिन चुप्पी रहती फिर पहले जैसा शुरू हो जाता। चित्रा का पढ़ाई में दिमाग बहुत तेज नहीं था लेकिन उसकी समझ में एक बात और आ गयी थी। कक्षा में अव्वल भले ही न आओ लेकिन फेल होने जैसा गुनाह करके मां का तीसरा नेत्र न खुलवाओ।यह रिस्क वह लेना नहीं चाहती थी इसलिए अपनी तरफ़ से पढ़ाई में मेहनत करने में कोई कसर नहीं छोड़ती थी। दादी और पिता के प्रेम के साथ उसकी जिंदगी खुशहाल थी।

समय अपनी गति से आगे बढ़ रहा था और हेमलता का ऊपर से बुलावा आ गया। चित्रा ने कालेज में प्रवेश किया था और यह उसके लिए बहुत बड़ा सदमा था। संतोष की जिंदगी में इतना फर्क नहीं पड़ा बेटी पल ही गयी थी,अब अपनी देखभाल स्वयं कर सकती थी। चित्रा बहुत उदास रहने लगी, कालेज से आती तो घर बहुत सूनासूना सा लगता। पहले तो दादी उसके इंतजार में बैठी होती ,गर्म खाना खिलाती , कोई न कोई मनपसंद चीज़ अवश्य होती।अब संतोष सुबह जल्दबाजी में बस दो परांठे सेंक कर रख जाती,अचार या दही से खाने के लिए कह देती। ऐसे ही एक दिन जब चित्रा घर आयी तो उसकी तबीयत कुछ ठीक नहीं थी, सूखी रोटी खानी मुश्किल हो रही थी।

चित्रा ने सब्जी बनाने का निश्चय किया, लेकिन सब्जी छौंकी ही थी कि फोन के घंटी बजने लगी। बेध्यानी में सब्जी तेज आंच पर छोड़ कर फोन पर बात करने चली गई। जब जलने की बदबू आई तो भागी भागी आयी लेकिन तब तक सब्जी स्वाह हो चुकी थी ‌। रसोई में धुआं और बदबू इतनी थी कि खड़ा होना मुश्किल हो रहा था, चित्रा रुआंसी हो रही थी तभी दरवाजे की घंटी बजने लगी। खोला तो सामने वाले फ्लैट की सुनंदा खड़ी थी। चिंतित स्वर में बोली ” क्या हुआ बेटा ठीक तो हो न , कुछ जल गया है, तुम्हें तो चोट नहीं लगी।”

चित्रा ने कईं बार दादी को सुनंदा से बात करते देखा था लेकिन संतोष की सख्त हिदायत दी कि आसपास वालों से न बात करना न किसी के घर जाना। चित्रा झिझकते हुए बोली:” मैं बिल्कुल ठीक हूं आंटी आप चिंता न करें।”

सुनंदा :” चिंता कैसे न करूं, मुझे पता है तुम बिल्कुल अकेली हो‌। तुम्हारी दादी नहीं रही, बड़ी भली औरत थी ।ऐसा करो तुम मेरे घर आ जाओ खाना खाने तब तक यहां घुटन कम हो जाएगी।”

वैसे तो चित्रा नहीं जाती लेकिन दादी अक्सर सुनंदा की तारीफ करती थी और उसे बहुत भूख लगी थी। ‌वह सुनंदा के घर चली गई ,अब ऐसा अधिकतर होने लगा , चित्रा कालेज से आती सुनंदा उसका इंतजार कर रही होती,वह भी उस समय अकेली होती , उसे चित्रा के साथ खाना खाना और बातें करना अच्छा लगता। चित्रा रात का खाना दादी के जाने के बाद से स्वयं बनाने की कोशिश करती , सुनंदा उसकी थोड़ी मदद कर देती।इस कारण चित्रा रसोई के काम में बहुत निपुण हो गई।

चित्रा ने धीरे धीरे घर का सारा काम अपने ऊपर ले लिया, मां और पिता की हालत देखकर उसे बहुत दुःख होता था। दिन भर की भाग दौड़ के कारण दोनों के शरीर ढलक गये थे , बहुत कमजोर और थके हुए लगते थे। सुबह जल्दी उठकर चित्रा ने घर के सारे काम स्वयं करने शुरू कर दिये थे ,मां को किसी काम को हाथ नहीं लगाने देती। लेकिन उसकी सबसे बड़ी समस्या उसकी पढ़ाई थी, औसत दिमाग की छात्रा थी ,उत्तीर्ण होने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती थी। सुनंदा ने जब उसे इतना परेशान देखा तो अपने पुत्र आयुष्मान से चित्रा की पढ़ाई में मदद करने को कहा।

आयुष्मान इस बात के लिए बिल्कुल राज़ी नहीं हुआ,वह मल्टीनेशनल कंपनी में सीए था और उसके घर आने में ही रात के नौ बज जाते थे। न उसके पास समय था न उसका मन था किसी अनजान लड़की को पढ़ाने का। उधर चित्रा की भी समस्या थी कब पढ़ने जाती सुनंदा के घर , मां के सामने तो वह जा नहीं सकतीं थीं। सुनंदा के प्रयासों से सुबह साढ़े आठ बजे का समय निर्धारित हुआतब तक चित्रा के मां पिताजी आफिस के लिए निकल जाते थे। चित्रा का कालेज दस बजे से था और आयुष्मान साढ़े नौ बजे तक निकलता था। अब आयुष्मान को जल्दी उठकर सुबह साढ़े आठ बजे तक नहा-धोकर नाश्ता करके चित्रा को पढ़ाने के लिए बैठना पड़ता। उसे बहुत झुंझलाहट होती दूसरे लड़की का दिमाग इतना तेज नहीं था उसे कईं बार समझाना पड़ता। वह बाद में सुनंदा के सामने बहुत बड़बड़ाता ,किस बेवकूफ लड़की को पढ़ाने का काम उसके पल्ले बांध दिया। सुनंदा उसे समझाती कि चित्रा बहुत ही प्यारी और मासूम लड़की है ,वह उसे ढंग से पढ़ाएगा तो वह पढ़ने में अच्छी हो जाएगी। मां के लिहाज में वह मन मसोस कर पढ़ाता रहा।

चित्रा को समझते देर नहीं लगी कि आयुष्मान बेमन से पढ़ा रहा था।वह इतने तेज दिमाग का था कि उसकी पूछीं समस्याओं और गलतियों पर वह झुंझला जाता । उम्र में वह उससे छः सात साल बड़ा था,दो साल से किसी विदेशी कंपनी में काम कर रहा था तो तजुर्बे में भी उससे बढ़ चढ़ कर था। चित्रा को उससे घबराहट होती ,कईं बार मन हुआ उससे पढ़ना बंद कर दे लेकिन मजबूरी थी।

मां ट्यूशन पढ़ने के पैसे देती नहीं और अपने आप पढ़ कर उसे लग नहीं रहा था वह उत्तीर्ण हो जाएगी। आयुष्मान जो पढ़ाता वह उसका बहुत अभ्यास करती जिससे अगले दिन आयुष्मान के आगे बेवकूफ न लगे। धीरे धीरे आयुष्मान को उसकी मेहनत नज़र आने लगी। वह बहुत कम बोलती थी पर सरल हृदय इतनी की सबकी चिंता करना उसका स्वभाव था।

वह जितना अपने माता-पिता की फ़िक्र करती उतनी सुनंदा की भी परवाह करती। उसने महसूस किया कि वह जितनी तन की सुंदर थी उतनी ही कोमल और साफ मन की भी थी। आयुष्मान को अब उसको पढ़ाना तो क्या उसके साथ समय बिताना अच्छा लगने लगा। आफिस में काम करने वाली अधिकतर महिला सहकर्मी दोहरे मापदंड और दोगली मानसिकता की थी। उनसे बात करने में उसे बहुत सतर्कता बरतनी पड़ती थी। चित्रा के साथ हल्की-फुल्की बातचीत करके उसे बड़ा सुकून मिलने लगा , कोई बनावटी पन नहीं ,कुछ साबित नहीं करना उसके सामने। कईं बार पढ़ते हुए देर हो जाती तो वह अपनी गाड़ी से उसे कालेज भी छोड़ देता था,जब की उसे अलग से जाना पड़ता था। धीरे धीरे चित्रा की भी घबराहट आयुष्मान के सामने खत्म होने लगी, लेकिन संकोच अभी भी था।वह पहली बार किसी पुरुष के इस तरह से लम्बे समय के लिए संपर्क में आयी थी। झिझक  थी लेकिन उसके साथ समय बिताने में दिल में उत्तेजना सी महसूस होती थी। इधर इन दोनों के मन में प्रेम अंगड़ाई ले रहा था उधर संतोष के मन में कुछ और ही चल रहा था।

समय के साथ भारतेश अस्वस्थ रहने लगा ,उसका शरीर कमजोर होता जा रहा था। संतोष भी जिंदगी की भागदौड़ के कारण थकान महसूस करने लगी थी।घर का सारा काम चित्रा करने लगीं थीं, उसे बड़ा आराम महसूस होता था। लेकिन चिंता होती कि चित्रा का विवाह हो जाएगा तब कैसे चलेगा। भविष्य में उसे अकेला पन और बुढ़ापा नजर आने लगा तो उसके मन में इच्छा हुई कोई ऐसा लड़का मिल जाएं जो विवाह के बाद यहीं आकर रहने लगे।

ऐसा लड़का मिलेगा कहां? संतोष के दिमाग में एक बार कोई बात घर कर जाएं तो जब तक परिणाम तक न पहुंचे बैचेनी रहने लगती है। उसकी निगाह हर समय  हर जगह संभावित दामाद की तलाश में रहने लगी और शीघ्र ही उसकी तलाश एक शख्स पर ठहर गई। उसके बॉस ने अपने गांव के एक दूर के रिश्तेदार को नौकरी पर रखा था। हरिकिशन नाम के इस बंदे को काम सिखाने की जिम्मेदारी बॉस ने संतोष को दी। जल्दी ही संतोष समझ गई हरिकिशन दुनियादारी से अंजान , मोटी बुद्धि का गरीब घर से है। घर में मां बाप ने बच्चों की फौज खड़ी कर रखी थी इसलिए खाने पहनने की हमेशा किल्लत रही होगी। दामाद बनाने के लिए वह सही लगा,सब को खुश रखने के लिए दौड़ दौड़ कर काम करता और कोई कुछ कह देता तो चुपचाप सुन लेता। संतोष को लगा अगर चित्रा की शादी हरिकिशन से कर दें तो वह चुप चाप जैसा वह चाहेंगी उसके घर में रहेगा और बुढ़ापे में उनकी देखभाल भी ठीक से हो जाएगी। संतोष चिंता मुक्त हो गई और चित्रा की परीक्षा खत्म होने का इंतजार करने लगी।

परिक्षा खत्म होते ही चित्रा ने चैन की सांस ली,वह आगे पढ़ना नहीं चाहती थी। आयुष्मान चाहता था वह और शिक्षा ग्रहण करें लेकिन चित्रा ने उससे आग्रह किया कि वह उसकी नौकरी अपनी कंपनी में लगवा दें।इस बीच संतोष ने हरिकिशन को  घर खाने के लिए आमंत्रित कर लिया। चित्रा को आश्चर्य हुआ मां ने ऐसे किसी अजनबी को आजतक खाने पर नहीं बुलाया था।बस दो चार आफिस के हमउम्र सहकर्मी थे जो कभी कभार आते थे और जिनके यहां चित्रा अपने माता-पिता के साथ जाती थी। हरिकिशन नियत समय पर पहुंच गया और अपनी आवभगत से खुश भी बहुत हुआ। चित्रा को देख कर उसके हार्मोन उबलने लगे लेकिन अपने आप पर काबू रख कर वह खामोशी से खाना खाता रहा। उसने इतना स्वादिष्ट भोजन कभी खाया नहीं था ,चित्रा के हाथ में स्वाद था ‌|

तभी संतोष ने अपना प्रस्ताव हरिकिशन के सामने रखा कि अगर उसे चित्रा पसंद हो तो वह चित्रा की शादी उससे करना चाहती है। चित्रा संतोष की बात सुनकर हतप्रभ रह गयी कि बिना उसकी इच्छा जाने मां ऐसे कैसे उसके रिश्ते की बात कर सकतीं हैं। हरिकिशन को संतोष की बात सुनकर अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ, उसके हार्मोन अब बेकाबू होने लगें। चित्रा जैसी खूबसूरत लड़की से शादी की बात तो वह केवल सपने में ही सोच सकता था। वह एकटक चित्रा को निहारे जा रहा था , उसे लगा संतोष ने शादी का प्रस्ताव रख कर उसे लाइसेंस दे दिया चित्रा को ताड़ने का। उसके इस व्यवहार से चित्रा बहुत असहज महसूस कर रही थी,उसका मन कर रहा था तुरंत कमरे से बाहर चली जाएं। संतोष ने अपनी शर्त भी रखी दी कि शादी के बाद हरिकिशन को इस घर में आकर रहना पड़ेगा चुंकि चित्रा उनकी इकलौती संतान है। उसे अपनी किस्मत पर रश्क होने लगा नौकरी तो मिली साथ में छोकरी और मकान भी मिल रहा था । जो कुछ संतोष मैडम का था वह सब बाद में उसका हो जाएगा। उसकी आंखों में वासना और लालच चित्रा को साफ दिख रहा था,जिस तरह वह बेमतलब हंस रहा था उससे खुशी संभाली नहीं जा रही थी। बार बार उसका हाथ किसी न किसी बहाने चित्रा के हाथ से टकरा जाता तो चित्रा के शरीर में सिहरन सी दौड़ जाती ,उसको लगता कोई कीड़ा रेंग गया हो उसके हाथ पर। हरिकिशन की आंखें उसकी देह का नापतौल ले रही थी,चित्रा ने किसी तरह उसके जाने तक सब्र किया फिर मां के सामने शादी से इंकार कर दिया।

चित्रा :” मां मैं यह शादी नहीं कर सकती , उसकी नजरें मुझे ठीक नहीं लग रही थी।”

संतोष :” तुम्हें वहम हुआ है , तुम उसे इतनी अच्छी लग रही थी इसलिए एकटक देखे जा रहा था। देखना शादी के बाद कितना प्यार करेगा लट्टू बनकर घूमेगा तुम्हारे चारों ओर। “

चित्रा आगे क्या बोलती जानती थी मां को समझाना बहुत मुश्किल काम था। अगले दिन आयुष्मान से मिली, पहले की तरह पढ़ने तो नहीं लेकिन उसके आफिस जाने से पहले  दोनों मिल अवश्य लेते थे। चित्रा की बात सुनकर आयुष्मान को बहुत गुस्सा आया ,ऐसी कैसी मां है जो पुत्री से पूछें बिना उसका विवाह तय कर रहीं हैं। हरिकिशन की हरकतों के बारे में सुन कर उसका खून खौल उठा। उसने तुरंत अपना निर्णय सुना दिया ” आज रात को मेरी मॉम तुम्हारी मॉम से बात करने जाएगी, अगर तुम्हारी माॅम मान गयी तो ठीक है वरना हम कोर्ट में शादी कर लेंगे।”

चित्रा को लगा कोर्ट की नौबत नहीं आएगी, आखिर आयुष्मान में कमी ही क्या है जो मां इस रिश्ते को ठुकरा दे। सुनंदा जब अपने पुत्र का रिश्ता लेकर संतोष के पास गयी तो संतोष ने साफ मना कर दिया। संतोष ने कई बार आयुष्मान को आते-जाते देखा था , आत्मविश्वास से भरा वह बंदा उसे क्रोधित स्वभाव का लगा था। कहीं भी उसे कोई बात ग़लत लगती वह भिड़ जाता, संतोष ने अक्सर उसे चौकीदार और दूसरे कर्मचारियों को लापरवाही के लिए टोकते देखा था। ऐसे बंदे के साथ संतोष जानती थी कि रहना थोड़ा मुश्किल हो सकता था ।

सुनंदा को उसके मना करने का कारण समझ नहीं आया तो उसने बच्चों की प्रसन्नता की खातिर संतोष को मनाते हुए कहा,” बहन जी बच्चों की खुशी भी इसमें है , दोनों एक दूसरे को बहुत चाहते हैं,हम बड़ों का आशीर्वाद भी मिल जाएगा तो सब काम आनंद से हो जाएगा।”

ये सुनना था कि बस संतोष का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया उसने सुनंदा को तो भला बुरा सुना कर भेज दिया ।बाद में चित्रा को भी बहुत गुस्सा किया। चित्रा की पहले भी मां के सामने आवाज नहीं निकलती थी , उस दिन भी चुपचाप सुनती रही और फिर रोते रोते सो गई।

अगले दिन संतोष आफिस जाते हुए चित्रा को सख्त हिदायत दे कर गयी कि अगर उसने सामने वाले फ्लैट में जाने की हिमाकत की या किसी से बात की तो उससे बुरा कोई नहीं होगा। चित्रा तो डर के मारे गयी नहीं लेकिन आयुष्मान थोड़ी देर इंतजार करने के बाद स्वयं उसके घर आ गया। दरवाजा खोलते ही चित्रा उससे लिपट कर बहुत रोई।

आयुष्मान :” तुम्हारी मॉम ने हमारे लिए कोई रास्ता नहीं छोड़ा , हमें जल्दी से कोर्ट में या मंदिर में जाकर शादी कर लेनी चाहिए। उनका कोई भरोसा नहीं वो कब तुम्हारी शादी उस बेवकुफ से कर दें।”

चित्रा :” लेकिन मां की इच्छा के बिना शादी कैसे कर सकती हूं। उन्हें बहुत धक्का लगेगा और पापा भी दुखी होंगे।”

आयुष्मान :” देखो वो तो यह शादी होने नहीं देंगी अगर तुम्हें मुझसे शादी करनी है तो थोड़ी हिम्मत करनी होगी। मैं पता करता हूं और दो-तीन दिन में हम शादी कर लेंगे।”

चित्रा दुखी होते हुए बोली :” यह उनके साथ ठीक नहीं होगा, मैं इतना बड़ा फैसला उनकी इच्छा के बिना कैसे ले सकती हूं।” आयुष्मान का धैर्य जवाब दे रहा था:” चित्रा यह बात तो तुम्हें तब सोचनी चाहिए थी जब तुम प्रेम की राह पर चलीं थी। तब उनकी आज्ञा क्यों नहीं ली थी। वैसे भी तुम हमारे घर छुप छुप कर आती थी तब क्यों नहीं सोचा तुम उनके दुख का कारण बन सकती हों। तुम्हें स्वयं निश्चय करना होगा तुम्हारी खुशी किसमें है ,इस तरह असमंजस में रहकर कोई निर्णय नहीं लिया जा सकता है ‌”

आयुष्मान का तेज स्वर सुनकर चित्रा घबरा गई और रूआंसी होकर बोली:” ठीक है आप जैसा कहेंगे मैं वैसा ही करुंगी।”

कहने को तो कह दिया लेकिन चित्रा बहुत परेशान थी मां पापा का उसके अलावा और कौन था । अपनी जिंदगी का इतना बड़ा फैसला उनकी इच्छा के विरुद्ध जाकर लेना उसे उचित नहीं लग रहा था और हरिकिशन के साथ जिंदगी बिताना भी बहुत मुश्किल काम था। अगले दिन आयुष्मान ने उसे बताया कि तीन दिन बाद यानी सोमवार की तिथि तय की है पंडित ने विवाह के लिए। चित्रा की बैचेनी और घबराहट बढ़ती जा रही थी ,कईं बार मन में आया मां से एक बार फिर बात करें लेकिन जानती थी कोई लाभ नहीं।

सोमवार को नियत समय पर आयुष्मान ने चित्रा से विवाह कर लिया। जब संतोष को शाम को घर आने पर पता चला तो वह बहुत आगबबूला हुईं , मिलने आए नव दंपती के मुंह पर धाड़ से दरवाजा बंद कर दिया। चित्रा बहुत दुखी हुईं , आयुष्मान और सुनंदा ने समझाया कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा तो वह किसी तरह संयत हुईं। अगले दिन आयुष्मान चित्रा के साथ शिमला चला गया पांच छः दिन के लिए।

सुनंदा को कुछ दिनों से महसूस हो रहा था वह बहुत जल्दी थक जाती है , सांस लेने में दिक्कत हो रही हैं। उसने सोचा एक बार बोड़ी चेकअप करवा लेना चाहिए। लेकिन पुत्र के विवाह में आ रही अड़चन के कारण वह चुप रही, सोचा आयुष्मान घूम कर आ जाएं तब पक्का उसके साथ डाक्टर को दिखाने जाएगी। अगले दिन कुछ सामान लेने नीचे उतरी तो लौटते समय पता चला लिफ्ट बंद हो गई है। पांचवीं मंजिल सामान के साथ सीढ़ियां चढ़ने में उसका दम फूल गया।उधर संतोष को बिल्कुल उम्मीद नहीं थी उसकी भोली भाली लड़की जिसकी उसके आगे जुबान नहीं खुलती इतना बड़ा कदम उठा लेंगी। उसके सारे मनसूबों पर पानी फिर गया।उसे पक्का यकीन था कि सामने वाले फ्लैट में रहने वाले मां बेटे ने उसे फुसला कर गुमराह कर दिया। अगले दिन जब सीढ़ियां चढ़ती सुनंदा उसके सामने पड़ी तो उसने  उसे उलटा सीधा बोलना शुरू कर दिया। उसने आसपास खड़े लोगों की परवाह नहीं की।

एक तो सुनंदा कोमल स्वभाव की औरत थी इस तरह के झगड़ो में वह बोल नहीं पातीं थी दूसरे उसकी सास इतनी फूल रही थी उसे चक्कर आ रहें थे। लोगों के सामने तमाशा बनता देख सुनंदा को बुरा लगा उसने संतोष को नम्रता से समझाने की कोशिश की लेकिन संतोष पर जैसे भूत सवार हो गया था। सुनंदा को इतनी शर्मिंदगी महसूस हुई वह किसी तरफ घर पहुंचीं। पसीने से लथपथ वह पानी पीकर लेटी तो उसे अपनी छाती में दर्द महसूस हुआ। उसने  अपनी बहन को फोन किया, उसकी बहन स्थिती की गंभीरता को समझते हुए तुरंत आईं और उसे अस्पताल में भर्ती करवा दिया। उसने आयुष्मान को भी सूचित कर दिया। आयुष्मान को मां की इतनी चिंता हुई कि जो पहली बस मिली वह उससे चित्रा के साथ वापस आ गया। अस्पताल में मां को देखकर बहुत दुखी हुआ , अचानक मां की हालत इतनी खराब कैसे हो गई। उसकी मासी कहने लगी :” बेटा तबीयत तो दीदी की कईं दिन से ढीली चल रही थी। मुझे फोन पर कहती थी। बस चाहती थी तुम दोनों की शादी किसी तरह हो जाएं , तुम्हारे शिमला से आने के बाद वह चेकअप के लिए डाक्टर के पास जाने वाली थी। लेकिन क्या पता था कि इसके पहले ही उन्हें अस्पताल आना पड़ जाएगा। ” आयुष्मान को अपने आप पर बहुत गुस्सा आ रहा था क्यों उसने मां की सेहत का ध्यान नहीं रखा। सुनंदा की हालत बिगड़ती गई और उसने देह त्याग दी।

किसी भी रस्म अदायगी में न संतोष आयी न पति को आने दिया। आसपास के लोगों में कानाफूसी होने लगी। धीरे धीरे आयुष्मान तक यह बात पहुंच गई कि संतोष ने उसकी मां को बुरा भला कहा था ,बस उसे यकीन हो गया कि उसकी मां की मृत्यु का कारण संतोष है। उसने कठोर स्वर में चित्रा को कह दिया कि अगर चित्रा को उसकी पत्नी के रुप में रहना है तो उसे अपने माता-पिता से सारे रिश्ते तोड़ने होंगे। चित्रा अपनी मां के व्यवहार से बहुत शर्मिन्दा थी , उसे डर लगा कहीं इस बात का बदला आयुष्मान उसके साथ दुर्व्यवहार करके न लें। अपने माता-पिता से रिश्ता तोड़ना भी उसे बहुत बड़ी सज़ा लगी खासतौर से पिता से । हमेशा की तरह वह मन मसोस कर चुप रह गई।

आयुष्मान ने चित्रा की नौकरी अपने ही आफिस में लगवा दी। अब वह उसे अपने ही साथ ले जाता और शाम को भी चित्रा उसके साथ लौटती। आयुष्मान के प्यार में कोई कमी नहीं थी लेकिन चित्रा को लगता एक कैदखाने से निकल कर दूसरे में आ गई। मां से तो नही  लेकिन पिता की सेहत के बारे में जानने और उनसे मिलने की इच्छा उसको बैचेन कर देती। कईं बार आफिस से लौटते समय जब मां पिताजी सामने पड़ते तो मां तो सीना तानकर आगे बढ़ जाती लेकिन पिता ठिठक कर रुक जाते और उनकी आंखों में पानी आ जाता। उन्हें देख कर चित्रा का मन करता गले लग कर पूछे कैसे हो , लेकिन पिता मां के कारण कुछ नहीं बोल पाते और चित्रा आयुष्मान के कारण।

, छः सात महीने हो गये थे , चित्रा अपने नये जीवन की अभ्यस्त हो गयी थी । आयुष्मान के साथ हंसने बोलने में समय कहां बीत जाता था पता ही नहीं चलता था। एक दिन उसने मां के फ्लैट में हलचल देखी, लगा दो बंदे व्हीलचैयर पर किसी को ला रहे हैं। दरवाजा खोलकर बाहर आयी तो देखा उसके पिता व्हिलचैयर पर बैठे हैं । उसने उनके लाने वाले अस्पताल के कर्मचारी से पूछा तो वह बोला :” दो हफ़्ते से अस्पताल में थे , इन्हें हार्ट अटैक पड़ा था। अब वैसे ठीक है दवाई और बेडरैस्ट की आवश्यकता है ।”

चित्रा का कलेजा कांप गया ,पिता इतने बीमार दो हफ़्ते से अस्पताल में भर्ती और मां ने उसे बताना भी जरूरी नहीं समझा। पलंग पर लेटे भारतेश का हाथ पकड़ कर वो वह रोने लगी ,पिता भी अपने आंसू रोक नहीं सकें। भारतेश अपनी मां के जाने के बाद अपनी पुत्री से ही मन की बात कर के दिल हल्का कर लेते थे। पत्नी के कठोर स्वभाव के कारण कभी खुल कर जी नहीं सकें , चित्रा की शादी के बाद घुटन महसूस करने लगे थे। तभी संतोष आ गई और चित्रा को बाहर धकेल कर बोली :” हमें बाहर वालों की सहानुभूति की  आवश्यकता नहीं है।”

घर आकर चित्रा बहुत रोई, आयुष्मान उसको सहलाता रहा, चुप कराने की कोशिश करता रहा। वह उसको दुखी और रोता हुआ नहीं देख सकता था लेकिन बेबस था इस स्थिति में कुछ कर नहीं सकता था

अब चित्रा जब तक घर में रहती उसका ध्यान सामने फ्लैट पर लगा रहता। काम करते करते भी खिड़की में से झांक लेती सामने क्या हो रहा है ,कौन आ रहा है। हमेशा दरवाजा बंद ही रहता , संतोष सुबह आफिस जाती नहीं दिखती तो वह समझ गई मां ने छुट्टी ली है। दो हफ़्ते बाद मां को आफिस के समय जाते देखा ,अब पिता घर में अकेले होंगे वह जान गई। उसने आयुष्मान से स्वयं के लिए आफिस से अवकाश लेने की बात कही। आयुष्मान मान गया वह चित्रा की छटपटाहट महसूस कर रहा था। उसके आफिस जाते ही चित्रा अपने पिता से मिलने चली गई। बाप बेटी एक दूसरे के गले लग कर खूब रोएं,एक दूसरे से मन की बात कही। भारतेश भावुक होकर बोला ,” तुझसे मिल लिया अब मुझे दवाई की आवश्यकता नहीं,तू ही मेरा टानिक है ।” संतोष कुछ खाने का बना कर रख गई थी कि गर्म करके खा लेना। चित्रा ने गर्मागर्म पोष्टिक आहार बनाकर खिलाया तो भारतेश ने मन‌ से खाया। चित्रा ने एक हफ्ते की छुट्टी ले ली और रोज मां के जाते ही पिता के साथ समय बिताने लगी।

अगले हफ्ते भी वह ऐसा ही करना चाहती थी लेकिन आयुष्मान को आपत्ति हो रही थी तो चित्रा बस एक दिन और कहकर रुक गई। संतोष उस दिन एक घंटा जल्दी आ गई ,चित्रा उसे देखकर सकपका गई और तुरन्त उठ कर जाने लगी तो संतोष बोली ,” रहने दो थोड़ी देर में चली जाना , मैं तो पहले दिन ही समझ गई थी कि मेरे पीछे से तुम आती हो। तुम्हारे पिता के चेहरे से अनुमान लगाना कोई कठिन काम नहीं था। इनकी सेहत में सुधार भी तुम्हारी वजह से हुआ है। अपना खून अपना ही होता है, तुम जब चाहो आ जाया करो लेकिन अपने उस पति को लाने की चेष्टा मत करना।” चित्रा को बहुत बुरा लगा,बुझे मन से घर पहुंची। आयुष्मान जब घर आया तो उसका उतरा चेहरा देखकर बोला :” क्या हुआ? लगता है तुम्हारी मॉम को तुम्हारे वहां जाने की बात पता चल गई।”

चित्रा :” हां, लेकिन उन्होंने कहा है कि मैं जब चाहूं वहां जा सकती हूं।”

आयुष्मान :” ठीक है तुम्हारा घर है जब चाहो चली जाना लेकिन मुझसे उम्मीद मत करना मैं वहां कभी जाऊंगा।”

चित्रा समझ गई उसकी मां और पति में कभी तालमेल नहीं बैठ सकता, उसने हालात को समय पर छोड़ दिया। समय तो उसके पास अधिक नहीं होता था पिता के पास जाने का। सारा दिन आफिस में और सुबह शाम आयुष्मान घर में होता तो उसे कहीं आने जाने नहीं देता। सप्ताहांत में कहीं न कहीं घूमने का कार्यक्रम बना लेता। लेकिन चित्रा फिर भी समय निकाल कर पिता से मिल आती, जो खाने में बनाती थोड़ा अधिक बना कर मां पिताजी को भी दे आती। संतोष ने चित्रा को घर आने की क्या इजाजत दी उसे लगा उसने चित्रा पर बहुत बड़ा एहसान कर दिया। अब जब मन आता फोन खटका देती लौटते समय बाजार से यह ले आना,आज यह खाने का मन कर रहा बना लेना। चित्रा ने मां और आयुष्मान दोनों को खुश करने के चक्कर में अपना फालूदा बना लिया लेकिन फिर भी दोनों को कुछ न कुछ शिकायत रहती। संतोष घर में कुछ मरम्मत करानी हो, भारतेश को अस्पताल ले जाना हो जैसे कामों के लिए हरिकिशन को घर बुला लेती ।उसे देखकर आयुष्मान और चिढ़ जाता , उसे लगता संतोष जानबूझ कर उसे गुस्सा दिलाने के लिए हरिकिशन को बुलाती है।

तीन चार दिन के लिए आयुष्मान काम से दूसरे शहर गया था जब आया तो दिन के दो बजे थे , जबरदस्त गर्मी से बौखला रहा था। शनिवार का दिन था चित्रा घर में ही थी। नहा-धोकर खाना खाकर वह कूलर के आगे पसर गया और चित्रा को भी बाहों में खींच लिया। उसे बहुत सुकून मिल रहा था ,इधर उधर की बातें करते करते वह उत्तेजित महसूस करने लगा। तभी घंटी बजने लगी, उसे बड़ा गुस्सा आया। चित्रा ने दरवाजा खोला तो हरिकिशन था कह रहा था :” संतोष मैडम, सर की दवाई का पर्चा ढूंढ रही हैं,मिल नहीं रहा है। आपके पास हो तो देदो, नहीं तो मैडम के घर चल कर ढुंढना दो ,हम अभी जाकर दवा ला देंगे।” चित्रा आयुष्मान से अभी आईं कह कर चली गई लेकिन आयुष्मान के तन बदन में आग लग गई।जब चित्रा वापस आयी तो उसका गुस्सा चरमोत्कर्ष पर था।वह लगभग चिल्लाते हुए बोला :” ऐसा आगे नहीं चल सकता, तुम्हें अपनी प्राथमिकता सुनिश्चित करनी होगी।अगर तुम्हें अपने माता-पिता की इतनी रहती है तो वहीं जाकर रहो। मेरी आवश्यकता को नजरंदाज करके तुम बार बार वहां नहीं भाग सकतीं। ‌तुम्हे चयन करना होगा तुम कौन सा रिश्ता निभाना चाहती हों।”

इस समय आयुष्मान का गुस्सा लाजमी था यह चित्रा समझ सकतीं थीं, लेकिन पुत्री और पत्नी के रिश्ते में एक का चयन करने की जिद कहां तक उचित थी। दोनों रिश्ते उसके लिए अहम थे और उसकी जिंदगी का हिस्सा थे। किसी एक को छोड़ कर रह कैसे खुश रह सकतीं थीं। चित्रा ने बात को संभालने के उद्देश्य से कहा,” आप प्लीज़ नाराज मत हो, आपको परेशानी हुई इसलिए गुस्सा आ रहा है। आगे मैं पूरी कोशिश करूंगी ऐसी स्थिति दुबारा न उत्पन्न हो।”

आयुष्मान :” तुम कितनी भी कोशिश कर लो तुम्हारी माॅम मुझे गुस्सा दिलाने का कोई मौका नहीं छोड़ेगी। अगले महीने कंपनी मुझे एक साल के लिए अमेरिका भेजा रहीं हैं तुम भी साथ चलों।कम से कम हम वहां एक दूसरे के साथ का आंनद तो इत्मिनान से ले सकेंगे।” मां और पति के बीच की रस्साकसी से चित्रा का मानसिक तनाव बढ़ता जा रहा था।वह अमेरिका जाने को तैयार हो गई। उसने मां को अभी से बताना उचित नहीं समझा और जाने की तैयारी में लग गयी। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था, चित्रा के अमेरिका जाने से एक हफ्ते पहले संतोष बाथरूम में फिसल गई ‌। उसके पैर की हड्डी टूट गई, प्लास्टर बांधना पड़ा और डाक्टर ने आराम करने का निर्देश दिया।

जब संतोष से चित्रा ने अपने अमेरिका जाने की बात बतायी, तो संतोष गुस्से से बोली :” तू मुझे इस हालत में छोड़ कर कैसे जा सकती है ‌।क्या तेरा कोई कर्त्तव्य नहीं अपने माता-पिता की तरफ। पाल पोस कर बड़ा किया सब कुछ किया तेरे लिए।” चित्रा बहुत परेशान थी क्या करें , मां को इस तरह छोड़ कर जाने को मन गवारा नहीं था और न जाने का मतलब आयुष्मान के गुस्से का सामना करना। चित्रा को चुप देख कर संतोष बोली :” आज अगर तेरी जगह बेटा होता तो ऐसा कभी नहीं करता ,किस्मत ही खराब थी जो ऊपर वाले ने एक ही औलाद दी वह भी बेटी। जा तू जाकर ऐश कर अपने उस पति के साथ , कर्मों की सजा तो मुझे भुगतनी है किसी तरह भुगत लुंगी।” और उसने विलाप करना शुरू कर दिया।

चित्रा के लिए यह स्थिति बड़ी दुविधा पूर्ण हो गयी ,अगर वह अमेरिका चली जाती है तो हर वक्त मां पिता की चिंता में परेशान रहेगी,आखिर उनका उसके अलावा था ही कौन। अगर नहीं जाती है तो आयुष्मान को समझना और मनाना टेढ़ी खीर है । पहले ही उनके रिश्ते में इतना खिंचाव रहने लगा है ,एक साल की दूरी तो बिल्कुल तोड़ने के कगार पर खड़ा कर देगी। लेकिन वह भी क्या करें दोनों ही समझना नहीं चाहते ,न कोई बीच का रास्ता निकालना चाहते हैं। आखिर दिल मजबूत कर उसने निर्णय लिया वह मां को इस हालत में छोड़ कर नहीं जाएगी। अमेरिका में उसकी चेतना उसे जीने नहीं देगी वह हर वक्त ग्लानी में डूबी रहेगी।

चित्रा ने जब अपना निर्णय आयुष्मान को सुनाया तो वह गुस्से से पागल हो गया। बहुत बुरा भला कहा फिर गुस्से में बाहर चला गया। चित्रा रोती रही ,वह आधी रात को पीकर आया ‌। चित्रा ने कईं बार अपनी बात समझाने की कोशिश की उसके आगे पीछे घूमती रहती लेकिन जाते हुए वह बोल गया,” अब इस रिश्ते को निभाना मुश्किल होता जा रहा है, लौट कर इस बारे में कोई निर्णय अवश्य लेना होगा।”

चित्रा बहुत दुखी हुईं खामोशी से अपने काम में लगी रहती। सारा दिन तो आफिस में निकल जाता , सुबह शाम मां और पिता की सेवा में लगी रहती। मां के घर में ही रहने लगी लेकिन सुबह शाम अपने घर अवश्य जाती। साफ-सफाई करती, भगवान के आगे अगरबत्ती जलाती और आयुष्मान की वस्तुओं को छूकर उसे याद करके रोती। जब नहीं सहा जाता तो फोन करती,कई दिनों तक उसने न फोन उठाया न उसके संदेशों का जवाब दिया। जब फोन उठाता तो हां नां में जवाब देता और काट देता।स्वयं तो कभी करता नहीं।

यह देखकर संतोष बड़बड़ाने लगती :” न जाने कैसा आदमी है किस बात की अकड़ दिखा रहा है। वह तेरे लायक था ही नहीं ,नहीं जाने क्या ज़िद थी उससे शादी करने की।” हरिकिशन का घर में आना जाना बढ़ गया , संतोष किसी न किसी बहाने उसे बुला लेती और वह भी कोई मौका नहीं छोड़ता घर में घुसने का।

आयुष्मान को गये एक साल होने को था , चित्रा के कईं बार पूछने के बाद भी उसने बताया नहीं वह किस तारीख को आएगा। कह देता ” जन कर क्या करोगी , किसी को लेने आने की जरूरत नहीं, मैं अपने आप टैक्सी कर के आ जाऊंगा।” सुबह सामने के फ्लैट में रोशनी जली देखी तो समझ गई आयुष्मान आ गया है। तुरंत मिलने गईं लेकिन आयुष्मान ने कुछ खास उत्साह नहीं दिखाया। चित्रा ने उसके लिए नाश्ता बनाया और अपनी तरफ से बात करने का प्रयास करती रही। वह बोली :” अगर पहले से पता होता आप आज आ रहें है तो मैं आपको इस घर में ही मिलती। कोई फर्क नहीं पड़ता कुछ रोज पहनने के कपड़े है बस मैं ले आती हूं। अब आप आ गए हो तो मैं यहीं रहने आ जाती हूं।”

आयुष्मान बिना उसकी तरफ देखे बोला :” कोई आवश्यकता नहीं है , जहां रह रही हों  वहीं रहती रहो दो चार दिन में वकील से बात करके मैं तलाक के कागजात तैयार करवा लूंगा।” चित्रा के आंखों में पानी आ गया लेकिन बिना कुछ बोले वह  आयुष्मान के कपड़े और सामान यथास्थान  रखने लगी।

अगले दिन जब दोनों आफिस पहुंचे तो वहां सब ने आयुष्मान का खुले दिल से स्वागत किया। लेकिन वह कुछ उखड़ा और अनमना सा रहा। बॉस तो उसे देखकर बहुत ही खुश हुआ, उनके दुसरे शहर की ब्रांच में कुछ परेशानी आ गई थी जिसके लिए एक अनुभवी बंदे की आवश्यकता थी। उसने आयुष्मान को निर्देश दिए अगले दिन वह कंपनी की गाड़ी से चला जाएं ,चार पांच घंटे का रास्ता था। आयुष्मान ने कुछ उत्साह नहीं दिखाया तो बॉस को  लगा वह अपनी पत्नी के साथ रहना चाहता होगा तो उसने चित्रा के जाने के निर्देश भी दे दिए।

गाड़ी में चित्रा खामोश रही और आयुष्मान सोता रहा । वहां जाकर पता चला एक ही कमरे में दोनों के रहने की व्यवस्था की गई है। चित्रा को अटपटा लग रहा था आयुष्मान ऐसे नजरें चुरा रहा था जैसे किसी अनजान के साथ कमरे में हों,बच बच कर ऐसे चल रहा था कि कहीं गलती से छू भी नहीं जाएं। चित्रा समझ गई मन में दूरी आ जाएं तो इतनी छोटी सी जगह में भी सैकड़ों गज़ के फासले नजर आने लगते हैं। आयुष्मान जल्दी से तैयार हो कर यह कहते हुए बाहर चला गया कि वह होटल की लॉबी में उसके इंतजार करेगा, आधे घंटे में आ जाएं।

रात को चित्रा को नींद नहीं आ रही थी, आयुष्मान सोफे पर सो रहा था। उस लगा आयुष्मान निंद में कराह रहा था।उसे सुबह से ही वह कुछ थका हुआ परेशान सा लग रहा था। कहीं बिमार तो नहीं ऐसा सोचकर वह उसके पास गई,हाथ लगाया तो बदन तप रहा था। वह अपने पर्स में हमेशा कुछ दवाएं रखतीं थी जैसे सिरदर्द  बदनदर्द बुखार आदि की , किसी को भी आवश्यकता हो तुरंत दे सकें। उसने बुखार की गोली निकल कर आयुष्मान को धीरे से उठा कर दे दी। फिर सिर पर ठंडे पानी की पट्टियां रखीं , आयुष्मान तब तक बहुत बैचेन रहा जब तक बुखार उतर नहीं गया। फ़िर थककर सो गया। चित्रा थोड़ी देर तक उसका सिर सहलाती रही,कब आंख लग गई पता नहीं चला।

नियत समय पर स्टाफ के लोग बुलाने आएं तो दोनों ऐसे बेसुध पड़े सो रहे थे कि दरवाजा खटखटाने की आवाज भी नहीं सुनी। वे कुछ और ही अनुमान लगाकर मुस्कुराते हुए चले गए। जब चित्रा की आंख खुली तो देखा आयुष्मान को फिर तेज बुखार है और बदन दर्द की वजह से बैचेनी बढ़ गई थी। उसने रिसेप्शन से डाक्टर का पता लिया और आयुष्मान को ले गई।स्थान परिवर्तन के कारण तबीयत खराब हो गई कहकर डॉक्टर ने दवा दे दी। चित्रा ने सारे दिन उसका ध्यान रखा, आयुष्मान  किसी तरह लैपटॉप पर काम करता रहा। अगले दिन भी यही स्थिति रही चित्रा उसको कुछ न कुछ खाने को देती तो कभी उसका सिर दबाती। आयुष्मान को इस समय उसका पास बैठना बहुत अच्छा लग रहा था। चार दिन में किसी तरह काम निपटा कर दोनों वापस आ गए। चित्रा ने निश्चय कर लिया था जब तक आयुष्मान स्वयं नहीं कहेगा वापस आने को वह नहीं जाएगी उसके साथ रहने के लिए।

संतोष को फिर ताने मारने का कारण मिल गया ” देखा कितना खुदगर्ज इंसान हैं ,चार दिन तुझसे सेवा करवा ली और फिर दूध में गिरी मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दिया। मेरी मान उससे तलाक ले ले, हरिकिशन से शादी कर ले और यहां आराम से रह । बिचारा अभी भी तेरा हाथ थामने को तैयार हैं।”

चित्रा को यह सुनकर बहुत बुरा लगा , दुखी हो कर बोली :” मां कभी तो दुसरो की खुशी के बारे में भी सोच लिया करो। हमेशा अपनी बात मनवाना चाहती हों। पापा को भी कभी खुलकर नहीं जीने दिया और अब मेरी जिन्दगी भी अपने हिसाब से चलाना चाहती हों। मैं आयुष्मान से इतना प्यार करती हूं अगर आपने थोड़ा साथ दिया होता तो हमारा रिश्ता इस तरह बिखरता नहीं। मैं रात दिन एक कर रही हूं किसी तरह दोनों रिश्ते बने रहे लेकिन आप किसी भी तरह का समझौता करने को तैयार नहीं हों।सारी उम्मीदें मुझसे करती हो,सारे फर्ज मेरे हैं,आप का कोई कर्त्तव्य नहीं।अगर मैं ने आयुष्मान को अपना पति मान लिया है तो क्याआप उन्हें दिल खोलकर स्वीकार नहीं कर सकती। खैर मैं सब की उम्मीदें पूरी करते करते थक गई हूं ।अब मैं ने निश्चय कर लिया है मैं उतना ही करुंगी सब के लिए जितना आवश्यक समझती हूं।”

चित्रा ने निश्चय किया अब अपनी जिंदगी के फैसले के लिए वह इंतजार में दिमाग खराब नहीं करेंगी, सीधे जाकर आयुष्मान से पूछेगी की वह क्या चाहता है। उसके अंदर अब सब के लिए इतना गुस्सा भर गया था कि लगता था दिमाग फट जाएगा।,हद है सब उससे उम्मीद करते हैं अपनी जिम्मेदारी का किसी को अहसास नहीं। वह तुरंत आयुष्मान के पास पहुंची,वह परेशान सिर पकड़ कर बैठा था।उसको इस हाल में देखकर उसका दिल पसीज ने लगा, चिंतित स्वर में पूछने ही वाली थी कि क्या हुआ,उसको अपना प्रण याद आ गया। तीखे स्वर में बोली ” आगे के लिए क्या सोचा है ,साफ साफ बता दो।इस तरह की असमंजस की स्थिति में रहने से कोई फायदा नहीं?”

पहली बार चित्रा को इतनी कड़क आवाज में बोलते सुन‌ आयुष्मान ने उसे आश्चर्य से देखा ।फिर बोला :”। चित्रा मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं, चाहता हूं ये जिंदगी तुम्हारे साथ सुकून से बिताना लेकिन तुम्हारी मॉम से मुझे परेशानी हैं। और तुम्हारा इस तरह दो नावों में सवार होकर चलना मुझे स्वीकार नहीं है। अब तुम्हें फैसला करना होगा तुम्हें किसका चुनाव करना है।”

चित्रा :” जीवन में ऐसा नहीं होता ,एक रिश्ते को निभाने के लिए दूसरे रिश्ते को तोड़ा नहीं जाता। हमें जिंदगी जितनी जिम्मेदारी सौंपती है सब में सामंजस्य बैठा कर अपना फर्ज़ निभाना होता है। ठीक है मेरी मां की कुछ आदतें ठीक नहीं है , लेकिन इस कारण में उनका ध्यान रखना छोड़ नहीं सकती । उनका मेरे अलावा कोई नहीं है। आपने भी तो आगे बढ़कर उनसे कभी प्रेम और आदर से बोलने की कोशिश नहीं की।बस मुझसे उम्मीद करते हो मैं आपकी सब बातें मानती रहूं।आप आगे बढ़ कर कहीं समझौता नहीं करेंगे। कल को अगर मैं मां बनती हूं तो फिर मुझे अपनी जिम्मेदारी बांटनी होंगी, किसी एक का चयन करना होगा।एक रिश्ते में सिमट कर तो  मैं जिंदगी नहीं काट  सकती। आपको मेरा स्वभाव अच्छा लगा था कि मैं सब से कितना मोह रखतीं हूं,सब के लिए कितना सोचती हूं।आज यही आदत हमारे बीच दीवार खड़ी कर रही है। खैर मैं अपने माता-पिता के प्रति अपनी जिम्मेदारी नहीं छोड़ सकतीं।अगर आपको मेरे साथ रहना हो तो यह बात समझनी होगी और मेरी जिम्मेदारी बांटने में मेरी मदद भी करनी होगी ‌|”

इतना कहकर चित्रा को रोना आ गया वह रोते हुए घर से बाहर निकल गई। उधर हरिकिशन संतोष के पास आया हुआ था। संतोष ने उसे साफ दिया चित्रा उससे शादी करने को तैयार नहीं है इसलिए वह उम्मीद छोड़ दें। हरिकिशन को बहुत गुस्सा आया, उसे लगा दूसरी बार उसकी उम्मीद बढ़ा कर उसे धोखा दिया जा रहा है ‌। जैसे ही वह संतोष के घर से बाहर निकला, सामने से चित्रा रोते हुए आती दिखाई दी। वह उसके सामने खड़ा हो गया, चित्रा उससे बच कर निकलने लगी तो उसने उसका हाथ पकड़ लिया और बोला :” क्यों उसके लिए अपने आंसू बहाती हों,जब वह तुम्हारी कद्र ही नहीं करता। आखिर मुझमें क्या कमी है जो मुझे बार बार नकार रही हों। तुम्हारे तन की आग तो मैं भी बुझा सकता हूं। “

हरिकिशन जबरदस्ती चित्रा के गले लगने की कोशिश करने लगा,तो चित्रा ने उसे धक्का देने का प्रयास किया ‌। लेकिन हरिकिशन की पकड़ मजबूत थी, चित्रा जोर से चिल्लाने लगी, हरिकिशन हंसते हुए बोला ,” किससे मदद की उम्मीद कर रही हों,वह जब तुमसे रिश्ता तोड़ रहा है तो तुम्हारी प्रवाह क्यों करेगा। उसकी बला से अब तुम्हारा कोई भी इस्तेमाल करें उसे क्या।”

लेकिन तभी हरिकिशन के मुंह पर इतने जोर का मुक्का पड़ा  कि उसका जबड़ा हिल गया। आयुष्मान गुस्से से उसपर ताबड़तोड़ मुक्के बरसा रहा था और चीख रहा था ,” तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरी पत्नी को हाथ लगाने की , उसकी तरफ आंख उठा कर देखने की।” शोर सुनकर संतोष और भारतेश भी बाहर आ गये , देखते ही माजरा समझ गये। इससे पहले कि आयुष्मान हरिकिशन को और अधिक क्षति पहुंचाता उन दोनों को अलग किया। हरिकिशन तो छूटते ही सिर पर पैर रख कर भागा। संतोष शर्मींदगी के साथ बोली ,” गलती मेरी थी मैं ही उसे बढ़ावा देती रही।”

आयुष्मान चित्रा को थामते हुए बोला :* तुम ठीक हो न ,मैं समझ गया हूं तुम्हारे बिना मेरा जीवन अधुरा है , मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता।हम कोई ऐसा रास्ता निकालेंगे जिसमें सभी की खुशियां शामिल होंगी ।” चित्रा की आंखों में खुशी के आंसू थे।

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