ये कैसा प्रेम

Ye Kaisa Prem

जब से हरिहर को हार्ट अटैक पड़ा था अपनी तीनों बेटियों के भविष्य को लेकर बहुत चिंतित रहता था। सबसे बड़ी बेटी मंजुला की शादी तो उसने  छः महीने पहले कर दी थी लेकिन दूसरी पुत्री देविका के लिए वह वर तलाश रहा था। साधारण शक्ल सूरत की देविका ने पढ़ाई में भी ऐसा कुछ नहीं किया की कहीं अच्छी नौकरी मिल जाती। घर संभालने और गृह कार्य में बहुत निपुण थी लेकिन यह गुण वर्तमान में विवाह कराने के लिए प्रर्याप्त नहीं है। हरिहर के किसी परिचित ने एक रिश्ता बताया,लड़का इंजीनियर था , किसी कंपनी में अच्छी नौकरी पर लगा था,अपना मकान था। लड़के की मां का देहांत बहुत पहले हो गया था , परिवार के नाम पर बस बाप बेटे थे।

हरिहर ने इसके पहले भी दो तीन बार देविका के रिश्ते की बात चलाई थी , जो असफल रही थी। उसे इस रिश्ते से भी कोई उम्मीद नहीं थी लेकिन परिचित के बहुत जोर देने पर उसने शिखर और उसके पिता लोकेश को घर पर आमंत्रित कर लिया। शिखर को देखकर हरिहर की रही-सही आशा भी टूट गई, इतना सुन्दर और राजकुमार सा दिखने वाला लड़का भला देविका का हाथ क्यों थामेगा।

लेकिन दोनों बाप बेटे बहुत सभ्य और शालीन निकले ,एक सरसरी निगाह देविका पर डाली और रिश्ते के लिए हां कर दी ,कोई उल्टा-सीधा सवाल नहीं किया।

हरिहर ने जब लोकेश से पूछा उनकी कोई खास डिमांड या रिति-रिवाज हो तो लोकेश सकुचाते हुए बोला ,” जी डिमांड तो हमारी कुछ नहीं है और हमारे यहां कोई अनुभवी स्त्रि नहीं है जो  रिति-रिवाज के बारे में बता सकें।आप को जो उचित लगे वैसा कर लें।हरिहर ने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी और धूमधाम से विवाह संपन्न हो गया ।

देविका को अपनी किस्मत पर विश्वास नहीं हो रहा था,शिखर से कोई बात तो नहीं हुई थी लेकिन एक जुड़ाव सा महसूस हो रहा था। शादी में रिश्तेदारों की बातें सुनकर कुछ शंका भी उत्पन्न हुई। चाची कह रही थी ,” पता नहीं भाई साहब को ऐसा देवदूत सा लड़का कहां से मिला,हमें तो दाल में कुछ काला लग  रहा है।देख बन्नो ध्यान से रहियो , कभी घर के काम करवाने के लिए तुझसे शादी कर रहा हो और ऐश करने के लिए किसी और को पकड़ रखा हों।”

पांच छः दिन के हनीमून पर देविका को ऐसा कुछ नजर नहीं आया। शिखर उससे बहुत प्रेम और मान से पेश आता हर कार्यक्रम और बात के लिए उससे सहमति अवश्य लेता , उसकी हर इच्छा को ध्यान में रखता। वह बहुत संतुष्ट और प्रसन्न होकर लौटीं हनीमून से।

घर में सब कामों के लिए काम वाली रखीं हुईं थीं। देविका को खाना बनाने का बहुत शौक था उसने सोचा खाना बनाने वाली और कपड़े धोने वाली हटा देनी चाहिए। आखिर सारा दिन घर में खाली  रहकर वह भी क्या करेगी।जब उसने इस बारे में शिखर से बात की तो उसने कहा :” तुम्हें जैसा अच्छा लगे वैसा करो ,बस यह न हो उनको हटा कर तुम पर काम का बोझ अधिक हो जाएं।” देविका ने एक बार ससुर से भी इस बारे में बात करना उचित समझा लेकिन उनकी प्रतिक्रिया भी यही थी :” बेटा जी यह आप का घर है जैसा चाहे करो ।”

रसोई की सारी जिम्मेदारी उसने अपने ऊपर ले ली,वह जो भी बनाती दोनों बाप बेटे बड़े चाव से खाते और तारीफ भी करते। लेकिन जल्दी उसका इस बात पर भी ध्यान गया कि खानें में कोई कमी रह जाती तो दोनों टोकते  नहीं थे चुपचाप खा लेते थे। एक बार सब्ज़ी में नमक अधिक था लेकिन दोनों ने एक शब्द नहीं कहा। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ अगर बता देते नमक अधिक है तो वह उबला आलू डालकर सब्ज़ी में नमक को संतुलित कर देती। ऐसे ही एक दिन शिखर के आफिस जाने के बाद लोकेश हंसते हुए बोले :” कल तो कमाल हो गया शिखर को बैंगन बिल्कुल पसंद नहीं फिर भी रात खाने में उसने चुपचाप खा लिए।” देविका को अजीब लगा ,जब शिखर को बैंगन पसंद नहीं था तो खानें से मना क्यों नहीं किया। उसने जबरदस्ती दूसरी बार शिखर की थाली में परोस दिया और उसने खामोशी से का लिया।

देविका को यह बात समझ नहीं आयी उसनेे बनायी इसलिए जो सब्ज़ी पसंद नहीं वह जबरदस्ती खाने की ऐसी क्या मजबूरी। अगर उसको अपनी पसंद बता दें तो उसको तो खाना बनाना ही है , पसंद का बनाने में अधिक आनंद आएगा। लेकिन पूछने पर भी शिखर मुस्करा कर बस यही कह देता,” तुम जो भी बनाती हो टेस्टी लगता है ,जो तुम्हें अच्छा लगे वहीं बनाया करो।” ससुर का भी अक्सर ऐसा ही जवाब होता।

शादी को दो महीने हो गए थे ,देविका के पास शादी में खरीदें हुए महंगें और रेशमी कपड़े ही थे , जिसके कारण रोज़ घर में पहनने के लिए कपड़ों को लेकर परेशानी हो रही थी। मायके भी जाना नहीं हुआ, वहीं से पुराने रोज़ में पहनने वाले कपड़े ले आती‌।सात आठ घंटे का रास्ता था अब इस काम के लिए क्या  जाती। शिखर अक्सर हर इतवार को उससे पूछ लेता था कुछ चाहिए तो नहीं ,वह उसे बाजार लेजाकर सामान दिलवाने को तत्पर रहता। देविका ने सोचा इस बार जब कहेगा तो तीन चार सूती कुर्तियां खरीद लेगी।

शिखर ने रविवार को देविका के पसंद के कपड़े दिलवा दिये,फिर दोनों माॅल में चहलकदमी करने लगे। आइसक्रीम खाते हुए देविका दुकानों की खिड़कियों में लगे सामान को बड़े ध्यान से देख रही थी। ऐसे ही जब गहनों की दुकान सामने आई तो एक हीरे की अंगूठी को देखकर वह ठिठक कर रुक गई।शिखर ने पूछा :” क्या हुआ, अच्छी लग रही है?”

देविका :” हां अंगुठी तो सुंदर है , लेकिन सॉलिटेयर है बहुत महंगी होगी। क्या करना ऐसी चीजों का।” देविका को गहनों का इतना शौक नहीं था , शुरू से किफायत में रहने की आदत थी तो इस तरह के खर्चें फिजूल लगते थे।

पांच दिन बाद अपने जन्मदिन पर उस अंगुठी को  शिखर की तरफ से तोहफे में देखकर अचंभित रह गई। मान भी हुआ शिखर कितना चाहते हैं उसकी पसंद को ध्यान में रखकर इतना महंगा तोहफा बिना मांगे उसके लिए लेकर आए। उस दिन शिखर ने छुट्टी ली ,सारा दिन उसे घुमाया और खाना भी बाहर खिलाया। देविका बहुत खुश थी,मायके से भी फोन आये सब ने बधाई दी। बड़ी बहन ने छेड़ते हुए कहा :” क्या बात है इतनी व्यस्त रहती है फोन भी नहीं करतीं?”

देविका :” नहीं ऐसी कोई बात नहीं है थोड़ा घर व्यवस्थित करने में ही समय निकल जाता है। वैसे तो पापाजी बहुत सलीके से घर मैनेज करते थे लेकिन औरत के हाथ की बात अलग होती है।”

मंजुला :” हां यह तो है, और बता पति के साथ कैसी कटी रही है , कहा सुनी तो नहीं होती?”

देविका :” नहीं बिल्कुल भी नहीं ,हर बात एक दम मान जाते हैं , फिर लड़ाई झगडे की नौबत ही क्यों आएगी।”

मंजुला :” रहने दें ,ऐसा भी कभी होता है , पति-पत्नी में कहा सुनी नहीं हो , मैं मान ही नहीं सकती ‌हमारे बीच ही देखना रोज़ किसी न किसी बात को लेकर बहस हो जाती है। और फिर जब बिना बोले रहा नहीं जाता तो मनाने लग जाते हैं। खैर तू नहीं बताना चाहती न सही, लेकिन यह रूठने मनाने का मजा भी कुछ और है।”

फोन पर बात करके देविका के मन में उथल-पुथल हो रही थी‌। अपने माता-पिता के बीच भी उसने बहस होती देखी थी लेकिन शिखर के साथ ऐसा एक बार भी कोई मौका नहीं आया। शायद शिखर इतने गंभीर और समझदार है ऐसी नौबत आने ही नहीं देना चाहते।

एक दिन बाजार से देविका कुछ सामान लेने गई,शाम हो रही थी बहुत भीड़ थी ,उसे देर हो गई।घर के बाहर गाड़ी खड़ी देख समझ गई शिखर आफिस से आ गये है। जैसे ही अंदर पहुंचीं देखा शिखर बदहवास सा फोन हाथ में लिए इधर उधर घूम रहे थे।उसे देखते ही लपकर उसके पास आया और बोला :” कहां चली गई थी फोन भी नहीं मिल रहा था।” शिखर के इस तरह परेशान होने का कारण वह नहीं समझ सकीं ‌‌। कोई छोटी बच्ची थोड़ी न थी वह और इतनी देर भी नहीं हूई थी जो वह इतनी चिंता कर रहा था।देविका : ” वह भीड़ इतनी थी कि , सब्ज़ी छांटने में समय लग गया और फोन की बैटरी खत्म हो गई थी।” शिखर अपनी आवाज को संयत करते हुए बोला :” कोई बात नहीं,बस थोड़ी चिंता हो गई थी। सब्ज़ी जो भी चाहिए मेरे साथ चलकर ले लिया करो,बेकार रिक्शे में धक्के खाती हो।” देविका को कुछ अटपटा लगा, चिंता करता है वो ठीक है लेकिन इतनी चिंता की पसीना पसीना हो गया।

हफ्ते दो हफ़्ते में देविका की मंजुला से फोन पर बात हो जाती थी। उसकी अपनी गृहस्थी और पति से संबंधित बातें ही नहीं खत्म होती थी और देविका को कुरेदती रहती थी उसकी बातें जानने के लिए। जब जन्मदिन के तोहफे के बारे में सुना तो मंजुला एकदम से खुश हो कर बोली,” वाह तू तो बड़ी किस्तम वाली निकली, जन्मदिन पर इतना महंगा और सुंदर तोहफा मिला । वाकई शिखर जी तुझको बहुत प्यार  करते हैं।”

देविका इस अंगूठी को प्रेम का मापदंड मानने को तैयार नहीं थी , मतलब अगर नहीं दी होती तो प्रेम नहीं करते। लेकिन प्रसन्न अवश्य थी ,जब भी अपनी उंगली में उस हीरे को चमकता देखती ।शिखर अब देर से घर आने लगे थे जिस कारण देविका को उसकी सेहत की चिंता रहने लगी थी। पहले समय से आ जाते ,वह कुछ हल्का नाश्ता बनाकर रखती । फिर एक घंटे बाद खाना खाकर कुछ देर टहल कर , टीवी देखकर सो जाते। लेकिन अब ठीक खाने के समय तक आता और थका इतना होता की खाना खाते  ही सो जाता ‌।

देविका को बड़ी चिंता रहती , पूछतीं तो कह देता आफिस में काम अधिक था। लेकिन उसको शीघ्र इस देरी का पता चल गया ।एक दिन शिखर का कोई दोस्त मिलने आया , उसने ही बातों बातों में बता दिया कि शिखर ने कोई अंगुठी खरीदने के लिए उधार लिया था और उसे चुकाने के लिए दो घंटे का कोई और काम पकड़ा है। देविका को सुनकर बहुत धक्का लगा,यह तो वह जानती थी कि शिखर ने गाड़ी के लिए लोन ले रखा है ‌। अंगुठी उसने सोचा था शायद बचत के पैसे से ली होगी। अंगुठी लेने की ऐसी क्या आफ़त आ गई थी।रात को जब शिखर को पस्त देखती तो उसे वह हीरे की अंगूठी बोझ लगती ,हीरा नहीं पत्थर नजर आता। शिखर से बोला तो हंस कर टाल दिया ,” तुम्हारी खुशी से बढ़ कर कुछ नहीं।”

हरिहर ने अपनी तीसरी लड़की वत्सला के लिए भी वर देखना प्रारंभ कर दिया । वत्सला पढ़ाई पूरी कर नौकरी करने लगी थी , वहीं उसकी दोस्ती अमन नाम के लड़के से हो गई जो प्रेम में बदल गई। पिता को जब लड़का तलाश करते देखा तो अपने मन की बात बता दी। हरिहर संकीर्ण मानसिकता का नहीं था , उसे इस रिश्ते में कोई बुराई नजर नहीं आयी ,बस लड़के की जाती अलग होने के कारण उसे लगा भविष्य में वत्सला को अलग परिवेश में सामंजस्य बैठाने में परेशानी न हो। उसने सोचा अपनी दोनों लड़कियों को बुलाकर परामर्श करके निर्णय लिया जाएं तो ठीक रहेगा। दामादों को अभी इस बात में शामिल करना उसे उचित नहीं लगा। देविका के पास जब फोन आया तो वह सहर्ष तैयार हो गई , शादी के बाद वह मायके गई भी नहीं थे।

उसने शिखर से पूछा, उसने भी कोई आपत्ती नही जतायी । देविका को बस दोनों के खाने की फ़िक्र थी तो तीन दिन के हिसाब से तीन सब्जियां बनाकर फ्रिजर में रख दीं और कुछ रोटी परांठे भी अधिक सैंक कर रख दिये। कुछ बाजार से ऐसे पैकेट लाकर रख दिए जो गर्म करके खा सकें। लोकेश ने कहा भी ,” इतनी चिंता मत करो पहले भी तो खाना खाते थे।” लेकिन देविका को लगा तब शांता बाई बना जाती थी अब कैसे मैनेज करेंगे। उसने ससुर से कहा :” पहले कैसे भी काम चलाते हों अब मैं आ गई हूं ,अब मेरी जिम्मेदारी है आपको कोई तकलीफ़ न हो। ”

मायके में समय का पता नहीं चला कैसे बीत गए। अमन से मिलकर सब को अच्छा लगा और हरिहर ने निश्चय किया दो महीने बाद सगाई और शादी दो दिन के अंतराल के बाद कर देंगे। अगले दिन जाने के लिए देविका सामान लगाने लगी तो उसकी मां बोली :” दो दिन और रूक जाती ,मन नहीं भरा। फिर थोड़ी शादी की तैयारी के बारे में भी योजना बना लेंगे, कहां से क्या लेना है। बड़ी से बोलने का कोई फायदा नहीं,हर दो घंटे में दामाद जी का फोन आ जाता है उसका भी ध्यान वहीं रहता है।”

देविका का मन रुकने का नहीं था , उसे शिखर और ससुर जी के खाने की चिंता हो रही थी लेकिन अपने मुंह से क्या मना करती। उसने सोचा शिखर से फोन पर पूछ लेती हूं अगर शिखर ने मना कर दिया तो उसकी मजबूरी हो जाएगी। लेकिन शिखर तुरंत मान गया ,” कोई बात नहीं तुम्हारा जब तक मन हो रुक जाओ। आखिर इतने समय बाद अपने घर वालों से मिली हों।” उसे बड़ी निराशा हुई ,वह चाहती थी शिखर अधिकार जताएं , अपने मन की बात कहें। दो दिन और मायके में रही अवश्य लेकिन मन बोझिल रहा।

शिखर उसको लेने स्टेशन पर आया,उसका चेहरा और आंखें बयान कर रही थी वह उसके लौटने से कितना खुश हैं। ऐसा नहीं था वह उसका साथ नहीं चाहता था, लेकिन जो बात उसकी आंखें बयान करती थी वह उसके होंठों पर क्यों पहुंच नहीं पाती । क्यों अपने मन की बात वह उससे खुलकर  नहीं करता।

छोटी बहन की शादी के लिए शिखर ने देविका से कईं बार कहा वह जो कपड़े ले ने चाहे लेले। लेकिन देविका का एक ही उत्तर था ,” अभी तो अपनी शादी की बहुत सी साड़ियां मैं ने एक बार भी नहीं पहनी ,उन में से कोई पहन लूंगी।” उसका मन नहीं करता शिखर पर अतिरिक्त बोझ डालने का । हर वक्त इस उधेड़बुन में लगी रहती वह  यह बनाए और उसे अच्छा लगता है कि नहीं , कहीं उसका मन रखने के लिए जबरदस्ती तो नहीं खा रहा। कहीं यह बात उसे बुरी तो नहीं लग रही , कहीं उसके द्वारा किया गये किसी कार्य से उसे परेशानी तो नहीं हो रही। कईं बार उसके इतना धैर्यवान होने पर उसे झुंझलाहट भी होने लगी। वह जानबूझकर कुछ नुकसान कर देती की शायद वह कुछ प्रतिक्रिया देगा लेकिन वह ‘ कोई बात नहीं ‘ कहकर टाल देता। फिर स्वयं अफसोस होता बेकार नुकसान कर दिया।

ऐसे ही उसने एक बार सुबह समय पर नाश्ता नहीं बनाया, तो शिखर बिना कुछ खाए चला गया। और शाम को ऐसे व्यवहार किया जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो। देविका को लगा उसके पिता हंसमुख स्वभाव और धैर्य वान इंसान थे लेकिन ऐसी स्थिति में थोड़ा बहुत कहना सुनना मां से अवश्य हो जाता था। देविका यह बिल्कुल  नहीं चाहती थी ऐसी बातों पर झगड़ा हो लेकिन शिखर अपना समझ कर इतना हक तो रखें कि गलत या नापसंद बातों पर मन के भाव होंठों पर तो लाएं।

शादी की तैयारी के लिए देविका और मंजुला को हरिहर ने तीन दिन पहले बुला लिया। दोनों दामाद सगाई से एक दिन पहले आने वाले थे। देविका को कमजोर और परेशान देखकर हरिहर और उसकी पत्नी को बड़ा आश्चर्य हुआ।जब कारण पूछा तो देविका रोते हुए बोली :” मुझसे और बर्दाश्त नहीं होता ,हर वक्त यह चिंता लगी रहती है कि मेरे कारण उनको कोई कष्ट तो नहीं हो रहा है ‌। मैं पागल हो जाऊंगी….।” इसके पहले वह अपनी बात विस्तार में कहती मंजुला बोल पड़ी :” तेरा तो दिमाग खराब हो गया है,लोग इसलिए परेशान रहते हैं कि कोई उनकी बात मानता नहीं,रात दिन इसी बात का झगड़ा रहता है । और यहां वह कहे अनुसार चलता है तो इसे यह भी रास नहीं आ रहा।”

मां बोली :” तेरी तो बचपन की आदत है जहां कोई परेशानी नहीं हो वहां भी दिक्कत ढूंढ कर रोना शुरू कर देगी। बेवकूफ कहीं की।”

हरिहर की अनुभवी आंखें पुत्री के दुख को समझ रही थी ,कड़क आवाज में बोलें :” चुप रहो तुम दोनों ,चल बेटा मेरे साथ कमरे में चल और बता क्या परेशानी है ।”

देविका :”पापा आपको भी लग रहा है मैं बिना बात का बतंगड़ बना रही हूं, मुझे कोई समस्या नहीं है ।”

हरिहर :” समस्या की कोई परिभाषा तो है नहीं ,जो बात मन को व्यथित करें,या तन को कष्ट दे,वह समस्या ही है।चाहे वह कितनी भी छोटी क्यों न हो अगर तेरे मन को कुछ कचोट रहा है तो वह परेशानी है और तू बता बात क्या है?”

देविका :” पापा शिखर इतने भोले और सीधे इंसान हैं कि मैं उन्हें किसी कष्ट में नहीं देख सकती।हर वक्त इस मानसिक संताप में जीती  हूं कि मेरे कारण उन्हें कोई तकलीफ़ होगी भी तो वह बताएंगे नहीं । इसका मतलब वो हर बात मुझसे शेयर नहीं करते , मुझे कुछ बुरा न लगे इस बात की फ़िक्र रहती है। लेकिन स्वयं पर क्या बीत रही है यह पता नहीं लगने देते।ऐसा कब तक चलेगा , मुझसे यह स्थिति और नहीं झेली जा रही है। ”

हरिहर ने ऐसी समस्या अपने जीवन काल में आज तक नहीं सुनी थी, लेकिन पुत्री इतनी परेशानी में हैं तो समाधान तो खोजना पड़ेगा ही। कुछ देर सोचने के बाद बोले :” तेरी ससुराल से वत्सला की शादी में न्यौता देने के लिए केवल तेरे ससुर ने अपनी बहन का पता ही दिया है। लोकेश जी अपनी बहन के बहुत करीब लगते हैं और तो कोई रिश्तेदारी तेरी ससुराल वालों की लगती नहीं।ऐसा कर एक बार उनसे मिल कर आ ,हो सकता है शिखर के जीवन में बचपन में कोई ऐसी घटनाएं घटी हो जिसके कारण वह इतना संकुचित व्यवहार करता हों। तुझे पता लगाना चाहिए,इस तरह हार मानने से काम नहीं चलेगा।”

देविका :” हां शिखर जी एक ही बुआ है और दोनों परिवार निकट है। उनके बच्चे हमारी शादी में आएं थे और वत्सला की शादी में भी वे आएंगे। बुआजी से चला नहीं जाता , हमारी शादी से एक महिने पहले वो सीढ़ी से गिर गई थी तब से कहीं आना-जाना बंद हैं।”

हरिहर :” तो ठीक है शादी के बाद तू दो तीन दिन और रूक जाना और उनसे मिलने चली जाना । हो सकता है बातों बातों में कुछ पता चल जाए। एक बात और मेरी समझ नहीं आई ,शिखर जी की माताजी का देहान्त कैसे हुआ था । शादी से पहले मैंने एक बार लोकेश जी से पूछा था तो उन्होंने बिमार थी कहकर टाल दिया । मैंने पूछा भी कौन सी बिमारी थी जो इतनी कम उम्र में चली गई तो कुछ स्पष्ट उत्तर नहीं दिया , गोलमोल कर गए।”

शिखर ने विवाह के कार्यो में पूरा सहयोग दिया और सब कार्यकर्मों में प्रसन्नता पूर्वक भाग लिया। देविका की मां और बहनों ने शिखर के स्वभाव के कारण उसकी तारीफों के पुल बांध दिया। विवाह संपन्न हो गया तो हरिहर ने पुत्री के दो दिन और रूकने की मोहलत मांगी शिखर से। शिखर बिना देविका को लिए ही चला गया। हरिहर ने अगले दिन एक गाड़ी का इंतजाम कर दिया देविका के लिए जिससे वह बुआसास के यहां जा सकें।

दो ढाई घंटे का रास्ता था , रास्ते भर दिमाग में यही उथल-पुथल चलती रही कहीं लता बुआ सनकी या गुस्से वाली हुई तो कैसे पूछेगी। उनके घर पहुंची तो उनके पोते पोतियों और बहुओं ने घेर लिया। सब हंसी मजाक करते रहे , देविका को अकुलाहट हो रही थी कहीं सारा दिन ऐसे ही न बीत जाएं। थोड़ी देर बाद बुआ बोली ,” चलो सब अपना अपना काम करो ,देविका को थोड़ी देर आराम करने दो ।” फिर देविका को कमरे में ले जाकर बोली ,” बोल बहू क्या पूछना चाहती हैं?”

देविका सकपका गई :” नहीं पूछना क्या है ,वो तो शिखर जी आपकी इतनी बातें करते हैं , तो सोचा एक बार आपसे मिल लूं , मायके आई थी तो। ससुराल से आपका घर काफी दूर पड़ जाता है ।”

लता ,” वो तो बेटा तूने बहुत अच्छा किया, तेरी शादी में जरूर आती लेकिन यह शरीर ही दुश्मन बन गया , कहीं आने जाने लायक नहीं रही।फिर भी कुछ संशय हो मन में तो पूछ ले। ”

लता :” बुआजी मैं मम्मी जी के बारे में जानना चाहती थी ।उनकी मृत्यु कैसे हुई?”

लता :” क्या बात है शिखर के बरताव में कुछ फर्क है क्या ? कोई परेशानी है क्या ?”

देविका :” नहीं नहीं ऐसी कोई बात नहीं है , मैं ऐसे ही जानना चाहती थी जिससे मैं शिखर जी को और अच्छे से समझ सकूं।”

लता :” शिखर को अपनी मां की मृत्यु का बड़ा सदमा लगा था। इतने साल हो गए है वह अभी भी उभरा नहीं है। वह शादी तक नहीं करना चाहता था , मैं ने उसे बहुत समझाया था। और देख उसकी शादी में ही नहीं जा सकीं। शिखर की मां कौशल्या तीन भाईयों की इकलौती बहन थी , कुछ अधिक लाड़-प्यार के कारण ज़िद्दी हो गई थी। लोकेश से विवाह के बाद भी मायके का मोह नहीं छोड़ सकीं ,बात बात पर मायके जा बैठती थी। लोकेश बहुत धैर्य रखता , उसकी सब इच्छाएं पूरी करता। ऐसा नहीं था कौशल्या अपने परिवार को प्यार नहीं करती थी ,शिखर पर तो जान छिड़कती थी। लेकिन उसमें अधीरता बहुत थी ,बचपन से इतना हाथों पर रही थी कि ना सुनना बर्दाश्त नहीं था। लोकेश उसे खुश रखने में कोई कसर नहीं छोडता |

लेकिन उसकी कमाई सीमित थी और मां पिताजी की भी देखभाल की जिम्मेदारी उस पर थी। कौशल्या को हर समय सबके ध्यान का केंद्र बने रहने का शौक था। उन्हीं दिनों लोकेश को व्यपार में नुकसान हुआ तो वह अपने काम में अधिक व्यस्त हो गया। कौशल्या की फरमाइशें खत्म नहीं होती , लोकेश को ससुराल से सहायता लेना स्वीकार्य नहीं था,बस दोनों में झगड़ा रहने लगा ।शिखर पर इसका बहुत बुरा असर पड़ रहा था ,वह घबराया सा  दोनों के आगे पीछे घूमता, चुप रहने की विनती करता रहता। ऐसे ही किसी दिन की कहासुनी के बाद कौशल्या ने भावेश में आकर आत्महत्या कर ली। लोकेश की मुश्किल और बढ़ गई,इधर मां पिताजी और पुत्र की देखभाल करें,काम संभाले,उधर कौशल्या के भाईयों ने झूठा आरोप लगा दिया। बहुत परेशान रहा ,कईं महिने अपने बच्चों को लेकर मैं वहीं पड़ी रही। आखिर लोकेश के ससुर ने स्थिती संभाली,आरोप वापस लिया,कोर्ट में स्वीकार किया , कौशल्या मानसिक रूप से अपरिपक्व थी ,विवाह की जिम्मेदारी संभालने के लिए तैयार नहीं थी। कोर्ट कचहरी से छुटकारा मिला काम भी धीरे-धीरे संभल गया, लेकिन शिखर पर इन बातों का बहुत गहरा असर पड़ा। बिल्कुल गुमसुम और अकेला बैठा रहता , मां पिताजी भी ज्यादा दिन जिंदा नहीं रहें। मेरी भी गृहस्थी थी , जाती थी उसको अपने साथ यहां ले आती थी लेकिन उसके मन में जो सूनापन आ गया था वह मैं कभी भर नहीं सकीं। लता की बात सुनकर देविका की आंखों में आंसू बहने लगे। लता :” क्या हुआ बेटा शिखर का व्यवहार ठीक नहीं है क्या ?” देविका सुबकी लेकर जोर से रोने लगी तो लता ने उठ कर दरवाजा बंद कर दिया। बेकार बहुओं को बात पता चल गई तो सारे जग में फैल जाएगी।

देविका :” मैं नहीं जानती थी वो इतना दर्द अपने अंदर समेटे हुए है। उन्हें शायद  हर समय डर लगा रहता होगा कि मैं भी उन्हें छोड़कर न चलीं जाऊं। दिमाग में कितनी परेशानी लेकर घूम रहे हैं।”

लता :” शिखर समझ नहीं सका कि अचानक मां ने ऐसा कदम क्यों उठाया। पिता को दोषी मानता रहा ,शायद उनके चिल्लाने के कारण मां ने ऐसा किया होगा। लेकिन जब नाना ने कोर्ट में माना कि लोकेश की इसमें कोई गलती नहीं थी तब वह अपने पिता से सामान्य हुआ। देख बेटा मेरे बच्चे ने बहुत तकलीफ़ सहन की है अगर उसकी किसी बात से तुझे परेशानी होती हो तो थोड़ा धैर्य रख ।”

देविका :” नहीं बुआजी मुझे उनसे कोई परेशानी नहीं बल्कि अनजाने में मैं उन्हें बहुत बड़ा कष्ट देने वाली थी। मैंने निश्चय किया था मैं अब वापस नहीं जाउंगी,मेरा धैर्य खत्म हो रहा था। ”

लता दुखी स्वर में :” तू ऐसा करके पुनः उसे पंद्रह साल पहले वाले मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती। वह समझ ही नहीं पाता इतना सब करने के बाद भी तू उसे क्यों छोड़ कर चली गई। बेटा तू उसे बता तू उसे कितना प्रेम करती है, जिससे वह तेरे साथ सामान्य व्यवहार कर सकें। वह हर समय सतर्क रहता है कि तुझे कोई बात बुरी न लग जाए। उसके अपने रिश्ते की गहराई का विश्वास दिला। बेटा इस समय तेरी समझदारी की आवश्यकता है ।”

शिखर से देविका ने दो दिन बाद आने का कहा था लेकिन उससे अगले दिन रुका नहीं गया। वह घर पहुंची तो देखा शिखर आफिस नहीं गया था,पलंग पर लेटा हुआ था। देविका को देखते ही उसकी आंखों में प्रसन्नता और आश्चर्य के भाव उभरे , इसके पहले वह कुछ पूछती शिखर संयत स्वर में बोला ,” देविका तुम ,तुम तो कल आने वाली थी ?”

देविका :” नहीं रहा जाता एक दिन भी आपके बिना,मन नहीं लग रहा था तो आ गई। नहीं आना चाहिए था क्या ?”

शिखर :” नहीं मेरा मतलब यह नहीं था ,वो तुम्हारे पापा कह रहे थे न दो तीन दिन तुम्हें रोकना चाहा रहे थे । कहीं उनको बुरा न लगे।”

देविका :” उन्हें बल्कि अच्छा लगा मुझे मायके से अधिक ससुराल की चिंता रहती है। मेरी पहली प्राथमिकता आप हैं ,अब आप से मेरी दुनिया शुरू होती है और आप पर खत्म होती है।”

तभी लोकेश एक कटोरी में खिचड़ी लेकर दाखिल हुआ तब देविका का ध्यान गया शिखर पलंग पर लेटा है और आफिस भी नहीं गया। जब उसने पूछा , तो लोकेश बोला :” विवाह में न जाने कौन सी चीज नुकसान कर गयी ,उल्टी दस्त लग गये है। इसलिए आज छुट्टी की है।”

देविका :” तो मुझे क्यों नहीं बताया, मैं कल ही आ जाती।”

लोकेश यह कहते हुए कमरे से खिसक लिया कि , मैं ने तो कहा था शिखर नहीं माना।

शिखर :” मैं तुम्हें बता कर परेशान नहीं करना चाहता था  , मेरी कारण तुम्हें कोई कष्ट हो यह मैं बिल्कुल नहीं चाहता।”

देविका :” लेकिन जब आप अपनी परेशानी नहीं बताते मुझे तब अधिक कष्ट होता है। आपको मुझसे वादा करना होगा कि आप अपनी मन की अच्छी बुरी सब बातें मुझसे शेयर करेंगे।”

शिखर :” एक शर्त पर ,तुम भी मुझसे वादा करों कि मेरी कोई भी बात बुरी लगें , मेरे कारण कोई भी कष्ट हों तो कोई कदम उठाने से पहले मुझसे एक बार बात जरूर करोगी।”

देविका अब शिखर की बातों का मर्म समझ रहीं थीं,शिखर की आंखों में उसे बैचेनी और उम्मीद का संगम नज़र आ रहा था। इतने बड़े लम्बे चौड़े पुरुष के याचना भरें स्वर से देविका का मन और पिघलता जा रहा था। वह उसके और करीब खिसकते हुए उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए बोली ,” मैं वादा करती हूं हमारे बीच में कितना भी मनमुटाव हो जाए,, मुझे आपकी कोई भी बात छोटी या बड़ी अच्छी नहीं लगेगी,तब भी मैं आपको छोड़कर नहीं जाऊंगी। आपसे बात करके ही कोई निर्णय लूंगी।”

शिखर के चेहरे पर संतुष्टि का भाव था,देविका उसके कंधे पर सिर रखते हुए बोली ,” चिंता मत करो इस जन्म में क्या , अगले सात जन्मों तक पीछा नहीं छोडूंगी।”

शिखर हंसते हुए ,” मुझे कोई आपत्ती नही ।”

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